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अकेलेपन के उस पार

1 day ago
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लावण्या नायडू

सुधा माई की छोटी-सी खोली से उस दोपहर मसालों की खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। रसोई में बैठी वह बड़ी तल्लीनता से मसाले पीस रही थीं। उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी, लेकिन चेहरे पर थकान की अपेक्षा आत्मविश्वास अधिक दिखाई देता था। मोहल्ले में आए उन्हें दो वर्ष ही हुए थे। जब आई थीं, तब पति साथ थे। बच्चे कहाँ थे, कितने थे या उनसे संबंध कैसे थे—यह कोई ठीक से नहीं जानता था। किसी ने पूछने की कोशिश की भी तो सुधा माई मुस्कराकर बात बदल देतीं।

कुछ महीनों बाद पति भी चल बसे। उस दिन पूरे मोहल्ले ने सुधा माई का एक अलग रूप देखा था। भीतर से टूट जाने के बावजूद उन्होंने पति की अंतिम यात्रा से लेकर सभी आवश्यक कार्यों को बड़ी दृढ़ता से पूरा किया। उसके बाद वह किसी पर बोझ बनकर नहीं रहीं। पति के जीवनकाल में शुरू की गई छोटी-सी टिफिन सेवा को ही उन्होंने अपनी आजीविका बना लिया।

धीरे-धीरे उनके हाथ के खाने की चर्चा आसपास फैल गई। वैसे तो उनके बनाए हर व्यंजन में घर का स्वाद होता था, लेकिन उनकी कोफ्ता-करी की बात ही अलग थी। मोहल्ले में जब भी किसी विशेष अवसर पर खाने की चर्चा होती, सुधा माई की कोफ्ता-करी का नाम अवश्य आता।

उस दिन सुमित्रा उनसे मिलने पहुँची थी। वह मोहल्ले की उन चंद महिलाओं में थी जिन्हें सुधा माई अपने बहुत करीब मानती थीं। बातों-बातों में सुमित्रा ने बताया कि रविवार को स्कूल के कर्मचारियों की पिकनिक है और सभी ने सुधा माई की प्रसिद्ध कोफ्ता-करी बनवाने की इच्छा जताई है। सुधा माई के चेहरे पर संतोष उतर आया। यही लोग तो अब उनका परिवार थे। पति के जाने के बाद इसी मोहल्ले ने उनके टिफिन के लिए ग्राहक खोजे थे। किसी ने राशन पहुँचाया, किसी ने जरूरत के समय सहायता की और किसी ने बस दो पल बैठकर उनका हाल पूछ लिया।

सुमित्रा ने हँसते हुए उनकी कोफ्ता-करी की तारीफ की तो सुधा माई की निगाह सामने रखी पति की तस्वीर पर टिक गई। उनके पति भी अक्सर कहा करते थे कि सुधा की कोफ्ता-करी में इतना स्वाद है कि वह किसी पत्थर दिल को भी पिघला सकती है। पति की याद आते ही उनकी आँखों में नमी उतर आई। और शायद उसी क्षण सुमित्रा को सामने वाली खोली में रहने वाले रघु काका की याद आ गई।

रघु काका पूरे मोहल्ले में अपने रूखे और एकाकी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। किसी से बहुत बातचीत नहीं करते। कुछ समय पहले कमजोरी के कारण अस्पताल तक जाना पड़ा था। सुधा माई ही उनका टिफिन पहुँचाती थीं, लेकिन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं होती थी। माई खाना उनके दरवाजे के बाहर रख आतीं और महीने के अंत में टिफिन के भीतर पैसे मिल जाते। एक विचित्र बात यह थी कि रघु काका ने साफ कह रखा था कि उनके खाने में कोफ्ता-करी न भेजी जाए।

एक बार सुधा माई ने भेज भी दी थी, लेकिन डिब्बा बिना छुए वापस आ गया। तब से उन्होंने कभी नहीं भेजी। सुमित्रा को यह बात हमेशा अजीब लगती थी। जिस कोफ्ता-करी को पूरा मोहल्ला इतने चाव से खाता था, उससे रघु काका को आखिर इतनी आपत्ति क्यों थी? उत्तर उस समय किसी के पास नहीं था।

उसी शहर के एक दूसरे हिस्से में उस रात एक और कहानी टूटने वाली थी। कोमल ने अपने घर को बहुत सुंदर ढंग से सजाया था। आज कुशाल का जन्मदिन था। कुशाल उसका मित्र भी था और कभी उसका शिक्षक भी रह चुका था। समय के साथ दोनों की निकटता प्रेम में बदल गई थी—कम-से-कम कोमल अब तक यही मानती आई थी। उसने घर पर ही कैंडल लाइट डिनर तैयार किया था। सात बजे का वादा था। सात से आठ हुए। आठ से नौ। फिर दस। मोमबत्तियाँ धीरे-धीरे छोटी होती गईं और कोमल की प्रतीक्षा लंबी। फोन का कोई उत्तर नहीं था। यह पहली बार नहीं था जब कुशाल ने उसे प्रतीक्षा कराई हो। लेकिन आज उसके जन्मदिन पर कोमल ने हर छोटी बात का ध्यान रखा था। इसलिए प्रतीक्षा के साथ उसके भीतर उपेक्षा का दर्द भी बढ़ता जा रहा था। आखिर उसने मेज पर रखी मोमबत्ती बुझा दी।

उसी समय दरवाजा खुला। कुशाल के पास घर की दूसरी चाबी थी। वह हमेशा की तरह सहज भाव से भीतर आया और कोमल के करीब आने लगा, लेकिन आज उसके शरीर से आती किसी स्त्री के परफ्यूम की गंध और गर्दन पर उभरा एक निशान कोमल की नजरों से नहीं बच सका।

कुछ ही क्षणों में वह सच सामने आ गया जिसे कोमल शायद लंबे समय से देखना नहीं चाहती थी। कुशाल की सगाई हो चुकी थी। जिस अंगूठी को उसने कभी रिश्तेदार का उपहार बताया था, वह वास्तव में उसकी सगाई की अंगूठी थी। कोमल के भीतर कुछ टूट गया। उससे भी अधिक पीड़ादायक यह था कि कुशाल को अपने छल पर कोई विशेष पछतावा नहीं था। उसके लिए कोमल कोई जीवनसंगिनी नहीं, केवल उसकी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम थी।

उस रात कोमल को पहली बार समझ में आया कि जिसे वह प्रेम समझ रही थी, वहाँ उसके आत्मसम्मान के लिए कोई स्थान ही नहीं था। उसने कुशाल से अपने घर की चाबी वापस ली और उसे बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया। दरवाजा बंद होते ही उसका वर्षों से सँजोया भ्रम भी जैसे उसी दरवाजे के दूसरी ओर छूट गया। वह बहुत रोई।

लेकिन कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि कुशाल के चले जाने से घर जितना खाली नहीं हुआ था, उससे कहीं अधिक खाली वह स्वयं भीतर से हो चुकी थी। चारों दीवारें उसे बीते दिनों की याद दिला रही थीं। उसने अचानक कुछ कपड़े बैग में डाले और कैब बुला ली। कहाँ जाना है, इसका कोई निर्णय नहीं था। बस इतना तय था कि उस रात उसे उस घर में नहीं रहना था। उसने रेलवे स्टेशन जाने के लिए कैब में बैठते हुए शायद यह नहीं सोचा था कि नियति उसे स्टेशन नहीं, किसी और ही मोड़ पर ले जाने वाली है।

कैब अभी कुछ ही दूर पहुँची थी कि सड़क किनारे उसे कुछ लोग परेशान अवस्था में दिखाई दिए। उनमें सुरेश भी था, जिसे कोमल पहचानती थी। कैब रुकवाई तो पता चला कि सुधा माई की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है। एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी और उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना आवश्यक था। कोमल ने बिना देर किए अपनी कैब उन्हें देने का निर्णय लिया।

लेकिन जब गाड़ी सुधा माई की खोली तक पहुँची, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सुधा माई जा चुकी थीं। छोटी-सी खोली में सुमित्रा और मोहल्ले की दूसरी महिलाओं के रोने की आवाज गूँज रही थी। कोमल सुधा माई से व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं मिली थी, लेकिन सुमित्रा से उनके बारे में इतना सुन चुकी थी कि सामने शांत पड़ी उस स्त्री को देखकर उसकी आँखें भी भर आईं। उसने स्टेशन जाने का विचार छोड़ दिया और वहीं सुमित्रा के पास बैठ गई।

शायद उस समय उसे स्वयं भी किसी ऐसे स्थान की आवश्यकता थी जहाँ उसका अपना दुख कुछ देर के लिए किसी दूसरे के दुख में विलीन हो सके। तभी सामने वाले घर से छड़ी की तेज आवाज सुनाई दी।

रघु काका घबराए हुए चले आ रहे थे। मोहल्ले वालों के लिए यह दृश्य आश्चर्यजनक था। जो व्यक्ति किसी से ठीक से बात तक नहीं करता था, वह सुधा माई का समाचार सुनकर इतना विचलित क्यों था? जैसे ही उनकी निगाह जमीन पर शांत पड़ी सुधा पर पड़ी, उनके पैर जवाब दे गए। वह वहीं लड़खड़ाकर गिर पड़े। लोगों ने उन्हें संभाला और उनकी बिगड़ती हालत देखकर घर पहुँचाया। कुछ देर बाद कमरे में केवल रघु काका, सुमित्रा और कोमल रह गए। और तब एक ऐसा अतीत सामने आया जिसने दोनों स्त्रियों को स्तब्ध कर दिया।

सुधा माई और रघुनाथ बचपन के साथी थे। साथ स्कूल जाना, खेलना, रूठना और फिर कुछ देर बाद मान जाना—बचपन कब किशोरावस्था में बदल गया और दोस्ती कब एक अनकहे प्रेम में, दोनों शायद स्वयं भी नहीं समझ पाए थे। दोनों एक-दूसरे को चाहते थे, लेकिन उस दौर में मन की बात कह देना इतना सहज नहीं था। फिर एक दिन सुधा के घरवालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी। रघुनाथ को लगा कि सुधा ने उसे छोड़ दिया है। वह नाराज हो गया।

सुधा विवाह करके चली गई और समय दोनों को अलग-अलग दिशाओं में बहाकर ले गया। दशक गुजर गए। फिर अचानक दो वर्ष पहले सुधा अपने पति के साथ उसी मोहल्ले में आकर रहने लगी—ठीक रघुनाथ के घर के सामने। बचपन का प्रेम वापस नहीं आया था; वह शायद कभी गया ही नहीं था। लेकिन उसके ऊपर वर्षों का अहंकार, शिकायत और अधूरी अपेक्षाएँ जम चुकी थीं। रघुनाथ ने सुधा से बात नहीं की। सुधा ने भी उसके मौन को स्वीकार कर लिया।

लेकिन कहानी इतनी सरल नहीं थी। सुधा के पति को उसके अतीत के बारे में सब पता था। सुधा ने विवाह के बाद उनसे कुछ छिपाया नहीं था। और शायद इसी विश्वास ने उस व्यक्ति के प्रेम को असाधारण बना दिया था।

अपनी गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद उन्हें सबसे बड़ी चिंता अपनी पत्नी की हुई। अपने बच्चों से अपेक्षित सहारा उन्हें नहीं मिला। बीमारी का पता चलते ही जिन बच्चों से वृद्धावस्था में आश्रय की आशा थी, उन्होंने वृद्धाश्रम का विकल्प सुझा दिया। तब सुधा के पति ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसे सुनकर वर्षों बाद भी रघु काका की आँखें भर आईं।

उन्होंने सुधा को आत्मनिर्भर बनाने के लिए टिफिन सेवा शुरू करवाई और उसे उसी मोहल्ले में ले आए जहाँ रघुनाथ रहता था। फिर एक दिन वह स्वयं रघुनाथ से मिलने पहुँचे। दो पुरुष—जिनमें से एक सुधा का वर्तमान था और दूसरा उसका कभी न कहा गया अतीत। लेकिन उस मुलाकात में न ईर्ष्या थी, न प्रतिस्पर्धा। केवल एक व्यक्ति की अपनी पत्नी के भविष्य को लेकर चिंता थी। सुधा के पति जानते थे कि उनके पास बहुत कम समय है। उन्हें यह भी विश्वास था कि रघुनाथ चाहे सुधा से कितना ही नाराज क्यों न हो, आवश्यकता पड़ने पर उसे असहाय नहीं छोड़ेगा।

उन्होंने अपनी पत्नी की देखभाल की जिम्मेदारी किसी औपचारिक वचन की तरह नहीं, बल्कि एक पुराने मित्र के विश्वास के रूप में रघुनाथ के सामने रख दी। दो दिन बाद वह संसार छोड़ गए। रघुनाथ ने उनका विश्वास तो निभाया, लेकिन अपने तरीके से। उसने सुधा की टिफिन सेवा के लिए ग्राहक खोजे। जरूरत का सामान उसके घर पहुँचता रहे, इसकी व्यवस्था की। बीमारी या परेशानी में दूर से उसका ध्यान रखा।

बस एक काम नहीं कर सका—सुधा से बात। उसका अहंकार उसके प्रेम से बड़ा बना रहा। इसीलिए वह सुधा की कोफ्ता-करी भी नहीं खाता था। वह स्वाद उसे सीधे उस समय में ले जाता था जब दोनों बच्चे थे और सुधा अपने घर से कुछ बनाकर उसके लिए लाती थी। लेकिन पिछली शाम कुछ बदल गया था। वर्षों की प्रतीक्षा के बाद सुधा स्वयं उसके घर पहुँची थी। शिकायत करने। लड़ने। या शायद केवल यह पूछने कि आखिर कब तक?

लेकिन सामने पहुँचते ही शब्द उसका साथ छोड़ गए थे। वह केवल रोती रही। और रघुनाथ को उस साठ वर्ष की स्त्री में अचानक वही दो चोटियों वाली छोटी सुधा दिखाई देने लगी थी, जो कभी स्कूल में डाँट पड़ने के डर से उसके सामने रोया करती थी। उस एक क्षण में चार दशकों से जमा अहंकार पिघल गया। रघुनाथ ने उसे पानी दिया। दोनों ने वर्षों बाद एक-दूसरे से बात की। समय शायद उन्हें फिर से वहीं ले आया था जहाँ से वे बिछड़े थे। घर लौटते समय सुधा ने कहा था कि वह उसके लिए कोफ्ता-करी बनाएगी।

रघुनाथ तैंतालीस वर्षों बाद उसके हाथ की कोफ्ता-करी खाने वाला था। लेकिन वह स्वाद उसकी प्रतीक्षा में ही रह गया। सुधा कोफ्ता-करी बनाने घर गई—और अगली सुबह देखने के लिए जीवित नहीं रही।

उस रात रघु काका बहुत रोए। लेकिन उनके आँसुओं में केवल सुधा को खो देने का दुख नहीं था। उनमें उन तैंतालीस वर्षों का पछतावा भी था जिन्हें दो लोगों ने केवल इसलिए खो दिया क्योंकि कोई पहले अपने अहंकार से बाहर नहीं आ सका। सुमित्रा ने उन्हें आराम करने के लिए कहा। वह और कोमल सुधा माई की अंतिम विदाई की तैयारियों में लग गईं।

इसी बीच सुमित्रा का पति भी वहाँ पहुँच गया। पत्नी की रोती हुई आवाज उसने फोन पर सुनी थी और दूर रहकर चैन से बैठना उसके लिए संभव नहीं हुआ। सुमित्रा उसे देखकर उसके गले लग गई। कोमल यह सब देख रही थी। एक ओर सुधा और रघुनाथ का प्रेम था, जो तैंतालीस वर्षों के मौन के बावजूद समाप्त नहीं हुआ। दूसरी ओर सुधा का पति था, जिसने अपनी पत्नी के अतीत से ईर्ष्या करने के बजाय उसके भविष्य की सुरक्षा के बारे में सोचा। और तीसरी ओर सुमित्रा का पति था, जो उसकी आवाज में दर्द सुनकर सब छोड़कर चला आया था। अचानक उसे कुशाल याद आया। वह व्यक्ति जिसके साथ रहते हुए भी वह वर्षों से अकेली थी।

थकी हुई कोमल अपने घर वापस लौट आई। जिस घर से कुछ घंटे पहले वह हमेशा के लिए भाग जाना चाहती थी, उसी घर में लौटकर उसने अपना बैग एक ओर रखा और बिस्तर पर गिर पड़ी। रात भर की घटनाओं ने उसे भीतर तक थका दिया था। जब आँख खुली तो शाम के पाँच बज चुके थे। दरवाजे की घंटी बज रही थी। बाहर सुमित्रा खड़ी थी। कोमल अपना पर्स पिछली रात सुधा माई के घर भूल आई थी। वह वही लौटाने आई थी। कोमल ने सुधा माई के अंतिम संस्कार के बारे में पूछा।

सुमित्रा की आँखें फिर भर आईं। उसके बाद जो उसने बताया, उसे सुनकर कोमल कुछ क्षण बोल नहीं सकी। सुबह सुरेश चाय लेकर रघु काका के घर गया था। रघु काका अपने बिस्तर पर शांत पड़े थे। वह भी नींद में ही चले गए थे। शायद तैंतालीस वर्षों की प्रतीक्षा का अंत उसी रात हो गया था। शायद सुधा के बिना जागने वाली सुबह उन्हें स्वीकार नहीं थी। या शायद जीवन ने दोनों की कहानी को उसी जगह विराम देना उचित समझा जहाँ अहंकार समाप्त हुआ और प्रेम फिर से बोलना सीख पाया।

सुमित्रा जाने लगी तो कोमल ने उसे कुछ दिन अपने पास रहने के लिए कहा। उसे लग रहा था कि किसी के साथ रहने से उसका अकेलापन कम हो जाएगा। लेकिन सुमित्रा ने उसकी आँखों में कुछ ऐसा देख लिया था जिसे कोमल स्वयं वर्षों से देखने से बचती रही थी। उसने कोमल को एहसास कराया कि तन्हाई और अकेलापन एक नहीं होते।*

सुधा माई पति के जाने के बाद अकेली रहती थीं, फिर भी उनके चेहरे पर जीवन था। वह काम करती थीं, लोगों से जुड़ी थीं, अपने अस्तित्व का अर्थ जानती थीं। और कोमल? उसके जीवन में कुशाल आता-जाता रहा, फिर भी उसकी आँखों में हमेशा एक खालीपन था। किसी दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति शरीर की तन्हाई दूर कर सकती है, लेकिन भीतर का अकेलापन नहीं। उस अकेलेपन से बाहर निकलने का रास्ता स्वयं अपने भीतर से शुरू होता है। जब तक मनुष्य स्वयं के साथ सहज नहीं होता, अपने आत्मसम्मान को नहीं पहचानता और अपने भीतर शांति नहीं खोजता, तब तक कोई दूसरा व्यक्ति उसके जीवन का खालीपन स्थायी रूप से नहीं भर सकता।

सुमित्रा चली गई। और पहली बार कोमल अपने घर में सचमुच अकेली रह गई—लेकिन शायद पहली बार स्वयं के साथ। उसने खिड़की खोली। बाहर शाम उतर रही थी। कल तक उसे लगता था कि कुशाल के बिना जीवन खाली हो जाएगा। आज उसे महसूस हुआ कि खालीपन उसके जाने से पैदा नहीं हुआ था। वह तो बहुत पहले से उसके भीतर था। कुशाल ने केवल उस पर पड़ा पर्दा हटा दिया था।

बस अड्डे पर सुमित्रा अपने पति को विदा करने पहुँची। बस चलने वाली थी। पति को विदा करते हुए उसके मन में सुधा माई और रघु काका की पूरी कहानी घूम रही थी। तैंतालीस वर्ष। इतना लंबा समय केवल इसलिए बीत गया क्योंकि दो लोग अपने मन की दूरी समय रहते मिटा नहीं सके। उसने अपने पति का हाथ कसकर पकड़ लिया। आज उसे पहली बार बड़े शहर में नौकरी करने गए पति की अनुपस्थिति कुछ अधिक भारी लगी। उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह अपने जीवन को केवल प्रतीक्षा में नहीं बदलने देगी।

कुछ दूरियाँ रोजी-रोटी के लिए आवश्यक होती हैं, लेकिन यदि वही दूरियाँ रिश्तों को भीतर से खाली करने लगें तो उन्हें समय रहते पहचानना भी जरूरी है। उसका पति भी शायद यही अनुभव कर रहा था। महानगर में लाखों-करोड़ों लोगों के बीच रहते हुए भी वह अकेला था। बस का हॉर्न बजा। सुमित्रा ने धीरे-धीरे उसका हाथ छोड़ दिया। बस आगे बढ़ गई। वह सड़क पर खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। लेकिन आज उसके भीतर केवल प्रतीक्षा नहीं थी। एक उम्मीद भी थी— बहुत जल्द यह दूरी समाप्त होगी।

रात में कोमल अपनी बालकनी में अकेली बैठी थी। शहर की हजारों खिड़कियों में रोशनी थी। सड़कों पर भीड़ थी। गाड़ियाँ दौड़ रही थीं। आसपास अनगिनत लोग थे। फिर भी उसने सोचा—भीड़ अकेलेपन का इलाज क्यों नहीं बन पाती?

शायद इसलिए कि अकेलापन लोगों की संख्या से तय नहीं होता।

कभी कोई सुधा माई की तरह एक कमरे में अकेला रहकर भी जीवन से भरा होता है। कभी कोई रघु काका की तरह सामने रहने वाले अपने सबसे प्रिय व्यक्ति से केवल कुछ कदम दूर होकर भी तैंतालीस वर्ष अकेला रह जाता है। कभी कोई सुमित्रा और उसके पति की तरह सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर भी एक-दूसरे के हृदय में उपस्थित रहता है। और कभी कोई कोमल की तरह किसी के बहुत निकट रहकर भी भीतर से बिल्कुल अकेला होता है। उस रात कोमल ने पहली बार अपने अकेलेपन से भागने का विचार छोड़ दिया। उसने रेलवे स्टेशन जाने के लिए बाँधा हुआ बैग खोल दिया। कपड़े वापस अलमारी में रख दिए। घर वही था। कमरा वही था। पर आज वह स्वयं पहले जैसी नहीं थी।

उसे समझ में आ गया था कि नया शहर खोजने से पहले उसे अपने भीतर एक नया स्थान बनाना होगा—जहाँ आत्मसम्मान हो, स्वयं के लिए प्रेम हो और किसी दूसरे की उपस्थिति पर निर्भर न रहने वाला सुकून हो।

शायद सुधा माई जाते-जाते उसे यही सिखा गई थीं। और शायद रघु काका की तैंतालीस वर्षों की प्रतीक्षा भी यही कह रही थी—रिश्तों में प्रेम हो तो उसे कहने में देर मत कीजिए, दूरी हो तो उसे मिटाने में अहंकार मत लाइए, और अकेलापन हो तो उससे भागने के बजाय सबसे पहले अपने भीतर लौटना सीखिए। क्योंकि कभी-कभी जिस साथी को हम पूरी दुनिया में खोजते रहते हैं, उससे हमारी पहली मुलाकात—अपने ही भीतर होनी बाकी होती है।

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