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अकेलेपन के उस पार
शायद सुधा माई जाते-जाते उसे यही सिखा गई थीं। और शायद रघु काका की तैंतालीस वर्षों की प्रतीक्षा भी यही कह रही थी—रिश्तों में प्रेम हो तो उसे कहने में देर मत कीजिए, दूरी हो तो उसे मिटाने में अहंकार मत लाइए, और अकेलापन हो तो उससे भागने के बजाय सबसे पहले अपने भीतर लौटना सीखिए। क्योंकि कभी-कभी जिस साथी को हम पूरी दुनिया में खोजते रहते हैं, उससे हमारी पहली मुलाकात—अपने ही भीतर होनी बाकी होती है।
लावण्या नायडू
1 day ago12 min read
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