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मां के पैर

धीरज झा

सुबह ही सोचा था ऑफिस के रास्ते में जो भी कंजक मिलेगी उसके पैर छू लूंगा लेकिन हड़बड़ी में राइड बुक की, और निकल गया। सारा दिन काम किया और दिमाग से निकल गया कि सुबह क्या सोच कर निकला था।
खैर, फर्क भी क्या पड़ता है, क्या एक मेरे कंजक ना खिलाने से माता को भोग नहीं लगेगा क्या? ये जो मैं कह रहा हूं ऐसा सोच भी नहीं रहा था लेकिन शायद बाद में ऐसा ही सोचता। मन में मलाल रह जाए तो ढीठ लोग ऐसा ही कुछ सोचते हैं।
आज वैसे भी राइड वाले ने 2 किमी पहले ही उतार दिया। नई जगह थी पता नहीं लगा मुझे और मुझे 2.5 किमी चलना पड़ा। क्योंकि मुझे जहां उतारते हैं वहां से आधा किमी चलना पड़ता है। खैर, मैं अपने रूम के पास पहुंच चुका था। रास्ते में कुछ खाने को दिखा तो सोचा ले लेता हूं। वो बना रहा था, मैं पास खड़ा कुछ ऐसे ही सोच रहा था। तभी एक बच्ची आई, उम्र 8 से 9 साल। उस खुली सड़क पर मुझ जैसे कई लोग थे, कई खाने के ठेले थे लेकिन वो लड़की मेरे पास आई।
बोली, कुछ खिला दो। मैंने पूछा, ये खायेगी? बोली हां, मैंने पूछा कितना, बोली एक प्लेट। मैंने कहा ठीक है और बनाने वाले को एक प्लेट बनाने के लिए बोल दिया। मेरा ही ऑर्डर बन रहा था, उसका बनने में समय लगता तो मैंने पूछ लिया ये खाओगी या पैसे लोगी? ऐसा मैंने इसलिए पूछा क्योंकि मुझे लगा पता नहीं उसे ये अच्छा लगे या ना लगे क्योंकि जिस तरह वो सवाल पूछ रही थी, मैं समझ गया था उसने ये कुछ पहले महीन खाया।
उसने कहा, पैसे दे दो। जो उसे दे रहा था वो 30 का था मैंने 100 रुपए उसे दिए और उसके पैर छू लिए। उसने भी बड़े प्यार से मुझे आशीर्वाद देने के लिए मेरे सिर पर हाथ फेर दिया। ये वो पल था जब लगा कि आज पता नहीं कितनी बड़ी दौलत मिल गई मुझे। वो पैसे उतने ज़्यादा नहीं थे लेकिन वो समय बहुत बड़ा था।
शायद मैं सोचता माता को फर्क नहीं पड़ता कि एक बंदे ने उनके लिए आज नवरात्री समापन पर कुछ किया या नहीं किया लेकिन मैं गलत था उसे जिससे लेना होता है वो ले लेती हैं। और अपना आशीर्वाद दे जाती हैं। हैरान करने वाली बात थी कि वो बच्ची कपड़ों से ऐसी बिलकुल नहीं लग रही थी कि वो अक्सर मांगती हो।
खैर मैं खुश हूं मां के पैर छू लिए नहीं तो एक बच्ची को मुस्कान दी। बड़ी बात ये है कि इससे पहले भी मेरे साथ ऐसा हो चुका है। यही चाहूंगा ऐसा होता रहे।

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