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मिठाई के लिए

तपेश भौमिक

सौम्य प्रायः मिठाई दुकान के सामने शो-केस में सजी मिठाइयों में से एक विशेष मिठाई को कुछ देर तक निहारता, फिर जो भी चीजें उसे खरीदने के लिए भेजा जाता वह उन चीजों को लेकर उसकी याद दिल में संजोए लौट जाता। उस विशेष मिठाई का स्वाद उसे एक बार मिल चुका था इसलिए उस पर उसकी दीवानगी अपनी हद से आगे बढ़ गई थी। शो-केस में सजी प्रत्येक मिठाई पर कीमतों के ‘टैग’ होते थे, इसलिए अलग से उनकी कीमत पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी। केवल उसे लेने के लिए अपनी जेब की औकात होनी चाहिए थी।
‘जेब को औकात नहीं तो जीभ को सौगात नहीं।’ यही मन ही मन सोचता हुआ लौट जाता। उस मिठाई की कीमत महज़ तीन रुपये ही थी जबकि कुल जमा पूंजी तीन रुपए जेब में कभी हुए ही नहीं। सौम्य के साथ यही विडम्बना थी। अगर कभी हुई भी तो किसी जरूरी खर्चे की नौबत आ गयी। फिर वही ‘ढाक के तीन पात’ वाली बात आ जाती। उस विशेष मिठाई का सपना अधूरा रह जाता। मन को यह कह कर सांत्वना देता कि ‘जब कमाऊँगा तब खाऊँगा। लेकिन कमाने के दिन कब आएंगे?’ यह सवाल भी परीक्षा के प्रश्नपत्रों में छपे सवालों से कहीं अधिक पेचीदा था। कई बार चवन्नी-अठन्नी के सिक्कों को उछाल-उछाल कर पैसे जोड़े भी गए पर न जाने कैसे वे सिक्के किसी दूसरी उछाल के लिए तैयार होकर बिदक गए।
सवाल तीन रुपए का था और जवाब तीन का न आता था। यह तीन का तड़का ही बेमानी-सी थी, उसके लिए। अगर अन्य मिठाइयों की भांति उसकी कीमत दो रुपए होती तो वह जरूर एक दिन खरीद लेता और राह चलते मुंह के हवाले कर देता। दो रुपए तक जोड़ पाना सौम्य के लिए कोई ज्यादा भारी काम नहीं रहा, कई बार उसने जोड़े, पर तीन की पहेली कभी न सुलझी। वह एक अजीब व्ययामोह की स्थिति से गुज़र रहा था। वह अपने मन को यह कह कर ढाढ़स बंधाता कि “आज तीन के लिए तरस हो रही है तो क्या? कल छह से छक कर खाएँगे।” कभी उस विशेष मिठाई का शो-केस में न होने से सोचता कि क्या उसकी खपत कम हो गई है? खुद ही जवाब देता, ‘मेरी बला से। इस दुकान में नहीं मिलेगी तो दूसरी दुकान में ढूंढ लूँगा। ‘मन ही मन उसका नाम जपता हुआ वह आगे बढ़ जाता।
सौम्य दर्जा-दर-दर्जा अच्छे अंकों से पास होता गया। कुछ खाने-पीने के बारे में कभी अपने माँ-बाप के सामने उसने जिद्द किया हो, उसे पता नहीं। अपने परिवार की गिरते माली हालात से वह वाकिफ़ था। एक अरसा बीत गया था कि वह कभी किसी झिझक के कारण उस मिठाई को खरीद नहीं पाया था।
अब तो वह दसवीं भी अच्छे अंकों से पास हो गया था। पढ़ाई में उसने ऐसी डुबकी लगाई थी कि मिठाई की बात ही वह भूल चुका था। अब तो उन दिनों की गई बातों को सोचकर उसे हँसी आने लगी थी।
उसे झिझक होने लगी कि भला उस विशेष मिठाई के लिए उस दुकान तक वह जाएगा। नहीं, यह तो बड़ी हास्यस्पद बात होगी। एक दिन दुकानदार उसकी दृष्टि को ताड़ गया था कि उसे कुछ लेना-देना नहीं है, यों ही घूर रहा है। उसने एकबार सौम्य से यह भी पूछा था कि कुछ और लेना है क्या? कुछ लेना हो तो जल्दी ले लो, दूसरे ग्राहक भी तो हैं। ले लो, नहीं तो चलते बनो।
उन दिनों वह अपने माँ-बाप के साथ किराए के मकान में रहता था। व्यापार में भारी नुकसान के कारण बाप ने मकान बेच कर महाजन का ऋण चुकता कर दिया था, जिसके कारण उसका परिवार किराए के सस्ते मकान में रहने लगा था। उस आँगन में और कई किराएदार रहा करते थे, जिन्हें घर पर किसी अतिथि के आने पर सौम्य को ही मिठाई दुकान भेज कर मिठाई मंगवाना सुविधाजनक लगता था। वह दौड़ कर मांग के अनुसार मिठाई, समोसे आदि ला देता तो उसके एवज में उसे कभी एक जलेबी तो कभी एक समोसा मिल जाया करता थी। कक्षा नौ तक आते-आते उसका पढ़ाकू व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा बन गया था कि लोग उसे मिठाई दुकान भेजने में या तो हिचकिचाने लगे थे नहीं तो उन्हें उसकी माँ ने ही मना कर दिया था।
इंसान का व्यक्तित्व उसके कामों से ऊँचा उठता जाता है। ऐसे व्यक्ति को कोई कुछ कहने से पहले दो बार सोचता है या उससे कुछ कहते नहीं बनता। सौम्य के परीक्षा फल ही ऐसे आते थे जिनसे उसके परिवार के प्रति सबका एक आदर भाव बनता जा रहा था, नहीं तो एक अच्छे खाते-पीते परिवार का अचानक समाज के हाशिये पर आ जाने से लोग उनका तमाशा ही देखते हैं और उनकी मज़ाक बनाने से पीछे नहीं हटते। एक मात्र सौम्य का परीक्षा फल ही था जिसके बदौलत उनकी साख अब भी समाज में कायम थी।
आज वह आई॰टी इंजीनियर है और प्रथम तनख़ाह के पैसे भी जेब में है। अब वह इस उधेड़बुन में पड़ गया कि पहले वह मिठाई दुकान जाएगा या माँ के सामने सारे पैसे रख देगा? पैसे उसके परिवार के लिए ज़रूरत थी न कि गुलछर्रे उड़ाने के लिए। उसके दिमाग में यह भावना भी आई कि अगर वह उस दुकान के सामने जाएगा और उस विशेष मिठाई को डब्बा भर कर खरीदेगा तो हो सकता है कि दुकानदार उसे ताड़ जाए। ऐसी हालात में कुछ सवाल ऐसे भी उसके मन में आ-जा रहे थे। जिसे सुलझाने में वह लगभग नाकाम साबित हो रहा था।
अब तक बहुत साहस जूटा कर उसने लगभग अपने आप को उस मिठाई दुकान तक धक्के मारता हुआ ले गया था। वह चिर-परिचित मिठाई ट्रे में सजी दिख गई। शो-केस के अंदर भरपूर सुंदरता के साथ वह अपने को फ़ोकस करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही थी; मानो कह रही हो कि ‘आज इतने दिनों बाद मेरी सुध ली है तुमने मेरे भाई? मैं तो कब से बाट जोह रही हूँ।’
मिठाई अब तीन रुपए की न होकर पाँच रुपए की हो गई थी, लेकिन इस बढ़ोत्तरी से उसका कोई लेना-देना न था। पाँच क्या दस का हो जाए, वह ट्रे में सजी सारी मिठाइयों को खरीदने की औकात रखता हैं आज। वह पहले तो उस विशेष मिठाई का नाम ही भूल चुका था। क्या वह ‘शो केस’ के सीसे पर उंगुली दिखा कर कहेगा कि अमुक मिठाई पचास या सौ रुपए के, डिब्बे में पैक कर दें। पहले तो वह हकला गया, फिर अपने को तटस्थ करता हुआ एकबार पीछे मुड़ कर देखा, शायद कोई कुछ कह रहा हो। एक गरीब बच्चा हाथ पसारे पैसा या मिठाई कुछ मांग रहा हो। माँ ने तो कहा था कि पहली तंख्वाह के पैसे से पहले ठाकुरजी के मंदिर में भेंट चढ़ाएगी। सौम्य को इस बात से चिढ़ थी कि उसके कमाए पैसे का पहला आस्वादन मंदिर का पुरोहित क्यों करेगा? उसे चढ़ावे इत्यादि से काफी चिढ़ है, फिर माँ कहती है तो उनका मन रखने के लिए वह मान लेगा। नहीं तो पहले वह अपनी मर्जी के अनुसार जितना मन होगा पहले खा लेगा, फिर कोई दूसरी बात होगी।
सौम्य ने अपने दिमाग पर बल डाला पर उस विशेष मिठाई का नाम याद न कर पाया। इतने बड़े-बड़े गणनांक वह याद रखता है और आज इस साधारण मिठाई के नाम को वह यदि स्मरण नहीं कर पा रहा हो तो यह भी उसकी बदकिस्मती है। वह उंगली दिखा कर कुछ कहता कि उससे पहले ही दुकानदार ने उसे आश्वस्त करते हुए सवाल किया।
”आपको ‘मंडा-मिठाई’ कितने दूँ?” इतना सुनते ही उसे मानो बिजली का शॉक-सा लग गया हो। उसके दिमाग में तुरत यह नाम क्रौंध गया। कहीं दुकानदार उसकी उस दृष्टि को स्मरण न करा रहा हों। उसने कुछ अन्यमनस्क-सा कह दिया,
“जी हाँ’ बीस दे दीजिए।”
तभी दो-चार और घुमक्कड़ बच्चे वहाँ आ गए तो दुकानदार ने डांट कर भगाने की कोशिश की। सौम्य ने उन्हें मना कर दिया। उसने डिब्बे को खोल कर उन सारे बच्चों को मिठाई बाँट दी और खाली हाथ यह सोचने लगा कि अब माँ को सारे पैसे दे देगा। उसे इसकी कोई परवाह नहीं कि माँ के हाथ रुपए सौंपने से पहले उन बच्चों को उसने कुछ पैसों के मिठाई भी खिला दी थी। उन मिठाई खाते बच्चों के चेहरो को देख कर उसे उस मिठाई का पूरा स्वाद मिल चुका था। उसके मन से उस विशेष मिठाई को खाने की मनसा जाती रही।
वह दुकानदर को पैसे देकर उल्टे पाव लौटने को पीछे मुड़ा कि दुकानदार ने सवाल किया, “आपको मिठाई लेनी थी न?”
“हाँ, लेनी थी, शाम को माँ के साथ आकर ले लूँगा, अभी याद नहीं आ रही कि कौन-सी किस्म कितनी लूँ।” उसने अनमने भाव से जवाब दिया और उन बच्चों के मिठाई खाते चेहरों को मन में आँकता हुआ लौट चला। वह अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा खुशकिस्मत मान कर चलता हुआ कब घर की देहरी पर पहुँच चुका था, उसे पता ही न चला।
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