मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की
- 5 days ago
- 1 min read
वर्षा श्रीवास्तव
कितनी और परीक्षा लोगे, नेह समर्पण सबूरी की,
हे!राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मैं भीलनी कलयुग की राघव,
सदा प्रतीक्षा करूँ तुम्हारी।
मुझको तो ऐसा लगता है,
मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।।
कलयुगी बेर सभी खट्टे हैं,
सभी विषैले, सब जूठे हैं।
दूषित बेर खिलाकर कैसे,
अवमान करूँ करूणाकर की।
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मुझको तो ऐसा लगता है, मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।।
आवभगत दृग की कुटिया पर,
सो जाना मन की मचिया पर।
पाँव दबाकर चँवर डोलाऊँ
आस यही मुझ पगली की
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मुझको तो ऐसा लगता है, मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।।
रामचरितमानस के नायक,
हे! रामायण के परिणायक।
वास तुम्हारा हो जिस घर में,
मैं कंकड़ उस देहरी की।
हे! राम करो कल्याण मेरा, मैं धूल अयोध्या नगरी की।
मुझको तो ऐसा लगता है, मैं पुनर्जन्म हूँ शबरी की।।
*******



Comments