मोहब्बत
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मधु मधुमन
यूँ तो हर चीज़ उसने दी मुझको
फिर भी लगती है कुछ कमी मुझको
नाम जिस चीज़ का मोहब्बत है
सिर्फ़ वो ही नहीं मिली मुझको
कल जो सबसे क़रीब थे मेरे
आज लगते हैं अजनबी मुझको
वार दी जिनपे हर ख़ुशी अपनी
ज़ख़्म देते हैं अब वही मुझको
उसको ख़ुशबाश देख कर यूँ लगे
मिल गई जैसे हर ख़ुशी मुझको
और भी ज़ख़्म दे गई या रब
चार दिन की ये चाँदनी मुझको
आज लगती हूँ बावली मैं उसे
कल समझता था जो *वली मुझको
जाने क्यूं उम्र भर न मिल पायी
मेरे हिस्से की रौशनी मुझको
मौत से मुझको डर नहीं लगता
ख़ौफ़ देती है ज़िंदगी मुझको
संग सा ही बना के छोड़ेगी
ज़िन्दगी की ये *बे-हिसी मुझको
बस बहुत काट ली सज़ा “मधुमन “
अब तो कर दे कोई बरी मुझको
वली-संरक्षक , सहायक
बे-हिसी-संवेदनहीनता
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