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मोहब्बत

Sep 6
1 min read

मधु मधुमन

 

यूँ तो हर चीज़ उसने दी मुझको

फिर भी लगती है कुछ कमी मुझको

नाम जिस चीज़ का मोहब्बत है

सिर्फ़ वो ही नहीं मिली मुझको

कल जो सबसे क़रीब थे मेरे

आज लगते हैं अजनबी मुझको

वार दी जिनपे हर ख़ुशी अपनी

ज़ख़्म देते हैं अब वही मुझको

उसको ख़ुशबाश देख कर यूँ लगे

मिल गई जैसे हर ख़ुशी मुझको

और भी ज़ख़्म दे गई या रब

चार दिन की ये चाँदनी मुझको

आज लगती हूँ बावली मैं उसे

कल समझता था जो *वली मुझको

जाने क्यूं उम्र भर न मिल पायी

मेरे हिस्से की रौशनी मुझको

मौत से मुझको डर नहीं लगता

ख़ौफ़ देती है ज़िंदगी मुझको

संग सा ही बना के छोड़ेगी

ज़िन्दगी की ये *बे-हिसी मुझको

बस बहुत काट ली सज़ा “मधुमन “

अब तो कर दे कोई बरी मुझको

वली-संरक्षक , सहायक

बे-हिसी-संवेदनहीनता

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