रिश्तों की गर्माहट
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प्रेमलता
दिसंबर की वह सुबह असाधारण रूप से ठंडी थी। रातभर चली बर्फीली हवा ने पूरे शहर को कंपकंपा दिया था। घना कोहरा इस तरह छाया था कि सामने वाले मकान की छत भी ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी। घड़ी में सात बजने वाले थे और मैं रसोई में चाय के लिए पानी चढ़ा रही थी। ठीक सात बजे दरवाजे की घंटी बजी। मैं समझ गई—कमली आ गई है। दरवाजा खोलते ही ठंडी हवा का तेज झोंका भीतर आया। उसके साथ कमली भी घर में दाखिल हुई। उसने शरीर पर एक पतली, पुरानी और कई जगह से उधड़ी शॉल लपेट रखी थी। ठंड के कारण उसके होंठ कांप रहे थे और उंगलियां सुन्न होकर लाल पड़ गई थीं।
“अरे कमली! इतनी ठंड में भी समय पर आ गई? कोहरा बहुत है, थोड़ी देर से आती तो क्या हो जाता?” मैंने दरवाजा बंद करते हुए कहा। कमली ने अपनी चप्पल उतारी और दोनों हथेलियां रगड़ते हुए बोली—“देर कैसे करती, दीदी? आपके घर का काम निपटाकर दो और घरों में भी जाना है। वहां देर हुई तो सब कहेंगे—ठंड केवल कमली को लगती है, हमें नहीं!” इतना कहकर वह मुस्करा दी, किंतु उसकी मुस्कान के पीछे ठंड और थकान साफ दिखाई दे रही थी।
चाहे बरसात का महीना हो, चिलचिलाती धूप हो या कंपा देने वाली सर्दी—कमली समय की बहुत पाबंद थी। वह पिछले सात वर्षों से हमारे घर में काम कर रही थी। ऐसा नहीं था कि उसने कभी छुट्टी नहीं ली, लेकिन जब भी उसे कहीं जाना होता, वह पहले ही बता देती। किसी आकस्मिक कारण से न आ पाती तो किसी पड़ोसी, परिचित अथवा अपने बेटे के हाथ संदेश अवश्य भिजवा देती। उसकी यही जिम्मेदारी और विश्वसनीयता उसे दूसरों से अलग बनाती थी।
मेरे लिए कमली केवल घर का काम करने वाली महिला नहीं थी। इतने वर्षों में वह धीरे-धीरे हमारे परिवार के सुख-दुख की सहभागी बन गई थी। घर में किसे कैसी चाय पसंद है, किस दिन अम्माजी को कौन-सी दवा देनी है और बेटे की कौन-सी चीज कहां रखी है—उसे सब याद रहता। हालांकि मेरे ये विचार पूरी तरह मेरे अपने थे। मेरी सास, जिन्हें हम सब अम्माजी कहते थे, कमली को केवल एक कामगार की दृष्टि से देखती थीं। उनका स्पष्ट मत था—“हम उसे वेतन देते हैं और वह उसके बदले काम करती है। इसमें रिश्तेदारी कैसी?”


