एक पुरुष
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साची सेठ
बांधता समाज को, सूत्र एक में,
बांटता है घर में, खुशी हर एक में।
समाज में सम्मान है, घर की जो आन है
पत्थर है नींव का, इमारत आलीशान है।
रखता है मन में मन के दुखों को छुपाकर
परिवार की खुशी को रहे सावधान है।
ममता को रखता छिपा कर ही मन में
है पूरा घर खड़ा रहा उसके सम्मान में।
प्रधानता की प्राप्ति को लुटाना भी पड़ता है
मन की इच्छाओं को, छुपाना भी पड़ता है।
विष को जो पी जाये, शंभू नीलकंठ सा
पुरुष बनने के लिए, मरना जीना भी पड़ता है।
लज्जा संभालता पगड़ी की गांठ में
लुट जाता मिट जाता घर की वो शान में।
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