लोभ का अथाह कुआँ
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
राजा भोज के दरबार में उस दिन विद्वानों की सभा सजी हुई थी। राज्य के प्रतिष्ठित पंडित, ज्ञानी और विचारक अपने-अपने स्थानों पर विराजमान थे। धर्म, नीति और जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर चर्चा चल रही थी। तभी एक ऐसा प्रश्न उठा जिसने पूरी सभा को मौन कर दिया।
“संसार में ऐसा कौन-सा कुआँ है जिसमें गिरने के बाद मनुष्य बाहर नहीं निकल पाता?”
प्रश्न सुनते ही दरबार में विचार-विमर्श शुरू हो गया। किसी ने गहरे कुएँ की कल्पना की, किसी ने अँधेरी खाई की। कुछ विद्वानों ने शास्त्रों के उदाहरण दिए, तो कुछ ने अपने तर्क प्रस्तुत किए। लेकिन कोई भी उत्तर राजा भोज को संतुष्ट नहीं कर सका। राजा ने अंततः अपने राजपंडित की ओर देखा।
राजपंडित को अपने ज्ञान और विद्वत्ता पर बड़ा गर्व था। राजदरबार में उनका विशेष सम्मान था। राजा समय-समय पर उन्हें धन, वस्त्र और बहुमूल्य उपहारों से सम्मानित करते रहते थे। राजा भोज ने उन्हें इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए सात दिन का समय दिया। साथ ही यह भी कह दिया कि यदि वे निर्धारित समय में उत्तर नहीं दे सके, तो उन्हें प्राप्त राजकीय पुरस्कार लौटाने होंगे और नगर भी छोड़ना पड़ेगा। राजपंडित के चेहरे का रंग उड़ गया।
जिस सम्मान को वह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि समझते थे, आज उसी के छिन जाने का भय उन्हें सताने लगा। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि चाहे जो हो जाए, प्रश्न का उत्तर खोजकर ही रहेंगे।
राजपंडित ने अपने ग्रंथों के पन्ने पलट डाले। उन्होंने पुराने शास्त्रों का अध्ययन किया, विद्वानों से परामर्श लिया और अनेक दृष्टांतों पर विचार किया। दिन बीतते गए, लेकिन प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
पहला दिन बीता। फिर दूसरा, तीसरा और चौथा भी निकल गया। छठे दिन तक पहुँचते-पहुँचते उनकी चिंता निराशा में बदल चुकी थी। अब केवल एक दिन शेष था। उन्हें बार-बार राजा की चेतावनी याद आती। नगर छोड़ने की कल्पना मात्र से उनका मन काँप उठता। उन्हें अपने धन, प्रतिष्ठा और वर्षों से प्राप्त सम्मान के खो जाने का भय सताने लगा।
उसी बेचैनी में वह नगर से बाहर निकल गए। चलते-चलते उनके कदम जंगल की ओर बढ़ गए। चारों ओर पेड़ों की छाया थी। कहीं पक्षियों का कलरव सुनाई देता, तो कहीं चरती हुई भेड़ों की घंटियाँ बज उठतीं। लेकिन प्रकृति की उस शांति का उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।
उनके विचार केवल एक ही प्रश्न के आसपास घूम रहे थे—आखिर वह कौन-सा कुआँ है जिससे मनुष्य बाहर नहीं निकल पाता? कुछ दूर जाने पर उन्हें एक गड़रिया दिखाई दिया। वह पेड़ के नीचे बैठा अपनी भेड़ों की रखवाली कर रहा था। उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन चेहरे पर संतोष और सहज प्रसन्नता थी।
गड़रिए ने राजपंडित को पहचान लिया। उसने आदरपूर्वक प्रणाम किया और उनके उदास चेहरे को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। राजपंडित ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोले। उनके मन में विचार आया कि जिस प्रश्न का उत्तर राज्य के बड़े-बड़े विद्वान नहीं खोज सके, उसका समाधान यह साधारण गड़रिया भला क्या बताएगा! गड़रिए ने फिर विनम्रता से उनकी चिंता का कारण पूछा।
उसने बताया कि वह भी संतों की संगति में बैठता है और उनसे जीवन की बातें सुनता रहता है। संभव है, वह उनकी समस्या समझने में कुछ सहायता कर सके। राजपंडित पहले तो चुप रहे, लेकिन फिर सोचा कि अब बताने में हानि ही क्या है। उन्होंने राजा भोज का प्रश्न और सात दिनों की समय-सीमा के बारे में बता दिया। यह सुनकर गड़रिया कुछ देर विचार करता रहा। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान उभर आई।
गड़रिए ने राजपंडित से कहा कि उसके पास एक अद्भुत पारस पत्थर है। ऐसा पारस, जिसके स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है। यह सुनते ही राजपंडित चौंक पड़े। क्षण भर पहले तक उनके मन में केवल प्रश्न का उत्तर खोजने की चिंता थी। अब अचानक उनकी कल्पना में सोने के ढेर चमकने लगे। यदि सचमुच पारस मिल जाए तो?
उन्हें लगा कि राजा भोज के पुरस्कार लौटाने की चिंता ही समाप्त हो जाएगी। पारस के सहारे वह इतना धन प्राप्त कर सकते हैं कि किसी राजा के आश्रय की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। उनके मन में एक नया विचार जन्म लेने लगा। जिस प्रतिष्ठा के छिन जाने से मैं इतना भयभीत हूँ, उससे कहीं अधिक प्रतिष्ठा तो अपार धन से प्राप्त की जा सकती है। गड़रिए ने उनकी आँखों में उभरती चमक देख ली। उसने कहा कि पारस देने से पहले उसकी एक शर्त स्वीकार करनी होगी।
राजपंडित उत्सुक हो उठे। गड़रिए ने शांत स्वर में कहा, “आपको मेरा शिष्य बनना पड़ेगा।” यह सुनते ही राजपंडित का अहंकार जाग उठा। मैं, राजा भोज का राजपंडित। इस साधारण गड़रिए का शिष्य बनूँ? उनके मन में विरोध उठा। वह स्वयं को उससे कहीं अधिक ज्ञानी और सम्मानित समझते थे। लेकिन अगले ही क्षण पारस पत्थर की कल्पना ने उनके अभिमान को दबा दिया। उन्होंने सोचा कि शिष्य बनने से क्या बिगड़ जाएगा। पारस हाथ में आते ही वह अपने भाग्य के स्वामी बन जाएँगे। अंततः उन्होंने गड़रिए की शर्त स्वीकार कर ली। गड़रिया मुस्कराया। उसे अब अपनी बात आगे बढ़ाने का अवसर मिल गया था।
गड़रिए ने पास चरती हुई एक भेड़ की ओर संकेत किया। उसने कहा कि शिष्य बनने से पहले राजपंडित को भेड़ का दूध पीना होगा। राजपंडित के चेहरे पर असहमति उभर आई। उनकी अपनी आहार-संबंधी मान्यताएँ थीं। उन्होंने तुरंत दूध पीने से इनकार कर दिया। गड़रिए ने सहज भाव से कहा कि यदि उन्हें शर्त स्वीकार नहीं है, तो वह पारस नहीं दे सकता। राजपंडित के मन में फिर संघर्ष शुरू हो गया। एक ओर उनकी मान्यताएँ थीं, दूसरी ओर पारस पाने की तीव्र इच्छा।
कुछ देर तक वह चुप रहे। फिर उन्होंने स्वयं को समझाया कि इतना बड़ा लाभ प्राप्त करने के लिए इतनी छोटी-सी बात पर अड़ना उचित नहीं होगा। उन्होंने दूध पीने की सहमति दे दी। गड़रिए ने उन्हें ध्यान से देखा। अब उसकी अगली शर्त सामने आई।
गड़रिए ने कहा कि वह पहले स्वयं उस दूध को पीएगा और फिर उसी पात्र में बचा दूध राजपंडित को पीना होगा। यह सुनते ही राजपंडित का चेहरा तमतमा उठा। उनकी सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किसी दूसरे का जूठा दूध पीना उन्हें स्वीकार नहीं था। उन्होंने कड़े स्वर में आपत्ति की। गड़रिया फिर शांत रहा। उसने स्पष्ट कर दिया कि पारस प्राप्त करने के लिए यह शर्त माननी ही पड़ेगी। राजपंडित असमंजस में पड़ गए।
अब तक वह एक शर्त स्वीकार कर चुके थे। उन्हें लग रहा था कि यदि इस समय पीछे हट गए, तो पारस पाने का अवसर हमेशा के लिए खो देंगे। उनके मन में धन की कल्पना और प्रबल हो गई। उन्हें लगा कि पारस मिलने के बाद वह किसी भी प्रकार की असुविधा की भरपाई कर सकते हैं। अंततः उन्होंने दूसरी शर्त भी स्वीकार कर ली। गड़रिए ने उनकी ओर देखा। इस बार उसकी मुस्कान कुछ गहरी थी। मानो वह राजपंडित के भीतर चल रहे संघर्ष को स्पष्ट रूप से देख रहा हो। लेकिन उसकी परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
गड़रिए ने सामने पड़ी एक मानव खोपड़ी की ओर संकेत किया। उसने कहा कि अब वह भेड़ का दूध उसी खोपड़ी में दुहेगा। फिर स्वयं उसे जूठा करेगा, उसके बाद कुत्ते को चटवाएगा और अंत में वही दूध राजपंडित को पीना होगा। यह सुनकर राजपंडित सन्न रह गए। उनके भीतर घृणा और आक्रोश की लहर दौड़ गई। यह शर्त उनकी कल्पना से भी परे थी। वह गड़रिए को घूरने लगे। उन्हें लगा कि वह जानबूझकर उनका अपमान कर रहा है।
कुछ क्षणों के लिए उनके मन में आया कि अभी लौट जाएँ और इस विचित्र व्यक्ति से कोई संबंध न रखें। लेकिन जैसे ही उन्होंने लौटने की कल्पना की, पारस पत्थर फिर उनकी आँखों के सामने चमक उठा। बस एक शर्त और! इतना सह लिया है तो थोड़ा और सही! पारस मिलते ही सब कुछ बदल जाएगा! वह अपने ही मन को समझाने लगे।
उनके भीतर की विवेकपूर्ण आवाज उन्हें रोक रही थी, लेकिन लाभ की आशा हर आपत्ति पर भारी पड़ रही थी। लंबे विचार के बाद उन्होंने सिर झुका दिया। वह तीसरी शर्त मानने के लिए भी तैयार हो गए। गड़रिया कुछ क्षण उन्हें देखता रहा। फिर अचानक हँस पड़ा। राजपंडित को उसका हँसना अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि वह उनका उपहास कर रहा है। लेकिन गड़रिए ने इस बार पारस की कोई बात नहीं की।
उसने राजपंडित से कहा कि राजा भोज के प्रश्न का उत्तर मिल चुका है। राजपंडित विस्मित रह गए। “उत्तर? कहाँ है उत्तर?” गड़रिए ने उनकी ओर देखते हुए कहा—“महाराज, वह कुआँ है—लोभ का कुआँ!”
राजपंडित कुछ समझ नहीं पाए। गड़रिए ने उन्हें अपनी पूरी बातचीत याद दिलाई। पहले वह उसका शिष्य बनने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें अपने ज्ञान और पद का अभिमान था। लेकिन पारस पाने की इच्छा ने उनका अहंकार दबा दिया। फिर उन्होंने भेड़ का दूध पीने से इनकार किया, पर पारस के आकर्षण में वह शर्त भी मान ली। दूसरी शर्त उन्हें और अधिक अनुचित लगी, फिर भी वह पीछे नहीं हटे। तीसरी शर्त सुनकर उनका मन विद्रोह कर उठा, लेकिन तब तक पारस पाने की इच्छा इतनी प्रबल हो चुकी थी कि वह अपनी ही सीमाओं को एक-एक करके छोड़ते चले गए। गड़रिए ने समझाया कि यही लोभ की प्रकृति है।
वह मनुष्य को एक ही बार में गहराई तक नहीं ले जाता। पहले वह एक छोटे-से समझौते के लिए तैयार करता है। फिर दूसरे के लिए। फिर तीसरे के लिए। हर बार मनुष्य स्वयं को समझाता है कि बस यह अंतिम बार है। इसके बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इच्छाओं की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। एक इच्छा पूरी होने से पहले दूसरी जन्म ले लेती है। और मनुष्य यह समझ ही नहीं पाता कि वह कब अपने विवेक से दूर होता चला गया।
गड़रिए ने कहा, “आप राजा के प्रश्न का उत्तर खोजने निकले थे, लेकिन पारस की बात सुनते ही अपना मूल उद्देश्य भूल गए। अब आपकी सारी चिंता केवल उसे पाने की थी। यही तो लोभ का कुआँ है। इसमें गिरने वाला व्यक्ति जितना नीचे जाता है, उतना ही उसे लगता है कि बस थोड़ी और गहराई में उसका मनचाहा धन छिपा है।”
राजपंडित स्तब्ध खड़े रहे। उन्हें अपनी स्थिति पर विश्वास नहीं हो रहा था। कुछ देर पहले तक वह स्वयं को बड़ा विद्वान समझ रहे थे। लेकिन एक साधारण गड़रिए ने उन्हें उनके अपने व्यवहार के माध्यम से ऐसा सत्य दिखा दिया था जिसे वह अनेक ग्रंथ पढ़कर भी नहीं समझ सके थे। उनका सिर झुक गया। अब उन्हें पारस पत्थर की इच्छा नहीं रही।
उन्होंने गड़रिए से पूछा कि क्या उसके पास सचमुच कोई पारस था। गड़रिया मुस्कराया। उसने बताया कि पारस की बात तो केवल उनके सामने लोभ का वास्तविक स्वरूप प्रकट करने का एक उपाय थी। राजपंडित को पहली बार अनुभव हुआ कि ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं होता। कभी-कभी जीवन की सबसे गहरी शिक्षा किसी ऐसे व्यक्ति से मिलती है जिसे हम अपने अहंकार के कारण साधारण समझकर अनदेखा कर देते हैं। उन्होंने गड़रिए के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और नगर की ओर लौट पड़े।
अगले दिन राजा भोज का दरबार फिर सजा। राजपंडित निर्धारित समय पर उपस्थित हुए। राजा ने उनसे वही प्रश्न पूछा। इस बार उनके चेहरे पर न भय था, न असमंजस।
उन्होंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया—“महाराज, वह कुआँ लोभ का है। मनुष्य जब उसमें गिरता है, तो उसकी इच्छाएँ बढ़ती चली जाती हैं। वह एक लाभ के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता करता है, फिर दूसरे लाभ के लिए और नीचे उतरता है। अंततः उसे यह भी याद नहीं रहता कि वह किस उद्देश्य से चला था।” राजा भोज ध्यानपूर्वक सुनते रहे।
राजपंडित ने जंगल में गड़रिए से हुई अपनी भेंट और उसके द्वारा ली गई परीक्षा का पूरा वृत्तांत सुनाया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यदि गड़रिया उन्हें उनके भीतर छिपे लोभ का परिचय न कराता, तो संभवतः वह आज भी उत्तर खोज रहे होते। राजा ने उनकी बात सुनी और संतोष व्यक्त किया।
लेकिन राजपंडित के लिए उस दिन सबसे बड़ी उपलब्धि राजा की प्रसन्नता नहीं थी। वह अपने भीतर एक परिवर्तन अनुभव कर रहे थे। जिस व्यक्ति को वह पहले तुच्छ समझ रहे थे, उसी ने उन्हें विनम्रता और आत्मचिंतन का पाठ पढ़ाया था। अब वह जान चुके थे कि विद्वत्ता का वास्तविक अर्थ केवल प्रश्नों के उत्तर देना नहीं, बल्कि अपने मन की दुर्बलताओं को पहचानना भी है। राजदरबार से लौटते समय उनके कदम हल्के थे। वह अपना पद और सम्मान बचाकर लौट रहे थे, लेकिन उससे भी अधिक मूल्यवान कुछ प्राप्त कर चुके थे—अपने भीतर के लोभ को पहचानने की दृष्टि।
जीवन-संदेश : लोभ का सबसे बड़ा छल यह है कि वह कभी स्वयं को लोभ के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। वह कभी आवश्यकता बनकर आता है, कभी अवसर बनकर और कभी उज्ज्वल भविष्य का वादा करके।
मनुष्य सोचता है कि थोड़ा और धन, थोड़ा और सम्मान या थोड़ी और सुविधा मिल जाए, तो वह संतुष्ट हो जाएगा। लेकिन यदि इच्छाओं पर विवेक का नियंत्रण न हो, तो प्रत्येक उपलब्धि के बाद एक नई चाह सामने खड़ी हो जाती है।
इस कथा का राजपंडित पारस पाने की आशा में एक-एक करके अपनी ही मान्यताओं से समझौता करने को तैयार हो जाता है। गड़रिया उसे उपदेश देकर नहीं, बल्कि उसके व्यवहार का दर्पण दिखाकर समझाता है कि लोभ मनुष्य को किस प्रकार अपने मूल उद्देश्य से भटका सकता है।
आवश्यकताओं की पूर्ति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन अधिक पाने की इच्छा जब विवेक, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों पर हावी होने लगे, तब वही इच्छा बंधन बन जाती है। संतोष का अर्थ प्रयास छोड़ देना नहीं है। उसका अर्थ है—प्रयास करते हुए भी यह पहचान बनाए रखना कि किस उपलब्धि के लिए हमें क्या मूल्य चुकाना पड़ रहा है। क्योंकि लोभ के कुएँ से बाहर निकलने की पहली सीढ़ी है, यह स्वीकार करना कि हम उसमें उतर रहे हैं।
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