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संतोष का फल

रंजना द्विवेदी

विलायत में अकाल पड़ गया। लोग भूखे मरने लगे। एक छोटे नगर में एक धनी दयालु पुरुष थे। उन्होंने सब छोटे लड़कों को प्रतिदिन एक रोटी देने की घोषणा कर दी। दूसरे दिन सबेरे एक बगीचे में सब लड़के इकट्ठे हुए। उन्हें रोटियाँ बँटने लगीं।
रोटियाँ छोटी-बड़ी थीं। सब बच्चे एक-दूसरे को धक्का देकर बड़ी रोटी पाने का प्रयत्न कर रहे थे। केवल एक छोटी लड़की एक ओर चुपचाप खड़ी थी। वह सबके अन्त में आगे बढ़ी। टोकरे में सबसे छोटी अन्तिम रोटी बची थी। उसने उसे प्रसन्नता से ले लिया और वह घर चली आयी।
दूसरे दिन फिर रोटियाँ बाँटी गयीं। उस बेचारी लड़की को आज भी सबसे छोटी रोटी मिली। लड़की ने जब घर लौटकर रोटी तोड़ी तो रोटी में से एक मुहर निकली। उसकी माता ने कहा कि – ‘मुहर उस धनी को दे आओ।’ लड़की दौड़ी गयी मुहर देने।
धनी ने उसे देखकर पूछा – ‘तुम क्यों आयी हो?’
लड़की ने कहा – ‘मेरी रोटी में यह मुहर निकली है। आटे में गिर गयी होगी। देने आयी हूँ। तुम अपनी मुहर ले लो।’
धनी ने कहा – ‘नहीं बेटी! यह तुम्हारे संतोष का पुरस्कार है।’
लड़की ने सिर हिलाकर कहा – ‘पर मेरे संतोष का फल तो मुझे तभी मिल गया था। मुझे धक्के नहीं खाने पड़े।’
धनी बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उसे अपनी धर्म पुत्री बना लिया और उसकी माता के लिये मासिक वेतन निश्चित कर दिया। वही लड़की उस धनी की उत्तराधिकारिणी हुई।

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