समर्पण
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साची सेठ
न तुम माने न हम जाने, कहो कैसी तुम्हारी ज़िद ?
समर्पण भाव फिर कैसे, बदलते भाव मन के फिर ?
समर्पित जब किया खुद को
बना आराध्य भावों का,
रही फिर भी क्यों ज़िद बांकी
बनी कारण नुमाइश का।
बनी लकड़ी वो सूखी सी, न जलती थी, न मुड़ती थी
मुरब्बत थी नहीं दिल में, खुदा खुद को समझती थी।
कभी आशायें थीं मन में
विलंबित ख्याल जैसीं थीं
रहा करतीं थीं उलझन जो
मिरे कमज़ोर मन की थीं।
न दिल का चैन बांकी है, न रंजो ग़म रहा है अब
न समझी ही गई फितरत, तमाशे भी हैं बांकी अब।
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