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नैतिकता का पाठ
यह जानकर कि वे ब्राह्मण के सिवा किसी दूसरे वर्ग के मनुष्य के हाथ का पकाया हुआ अन्न नहीं खाते हैं, मैं उनके लिए मंदिर का प्रसादी अन्न मैगवाने का ग्रंथ कर रहा था, किंतु मुझे मना करते हुए उन्होंने कहा, "तेरे जैसे शुद्ध सत्त्वगुणी के हाथ का अन्न खाने से कोई दोष नहीं होगा।" बार-बार मेरे आपत्ति करने पर भी उन्होंने मेरी बात को न माना और मेरे हाथ का पकाया हुआ अन्न उस दिन ग्रहण किया था।"
मुकेश ‘नादान’
May 294 min read
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