नैतिकता का पाठ
- May 29
- 4 min read
मुकेश ‘नादान’
एक दिन मास्टर साहब के साथ विद्यालय के छात्रों की नैतिकता के संबंध में आलोचना करने के समय नरेंद्रनाथ तत्कालीन छात्रों की अनैतिकता के प्रति असंतोष प्रकट कर रहे थे। श्रीरामकृष्णदेव ने उन लोगों की बातों को सुनकर कहा, "ऐसी बातें अच्छी नहीं। ईश्वर की बातों को छोड़ दूसरी बातें अच्छी नहीं होती। वे अपनी संतानों का मन भद्रता की ओर ही आकृष्ट किया करते। अशुभ-अभद्र की चर्चा में समय व्यतीत करना उन्हें पसंद नहीं था।
पुण्य का अनुसरण करने से पाप खुद ही खत्म हो जाता है और पाप के चिंतन से पाप की वृद्धि होती है-इस स्वाभाविक रीति से ही उनकी शिक्षा प्रणाली निर्धारित होती थी।
प्रेमाकर्षण और सदुपदेश प्रदान करने की तीव्र इच्छा से रामकृष्ण बीच-बीच में रामतनु वसु लेन में स्थित नरेंद्रनाथ के कमरे में आकर नरेंद्र का संगीत सुनते, साधना आदि के संबंध में उपदेश देते तथा अखंड ब्रह्मचर्य पालन के लिए उनको प्रोत्साहित किया करते। रामकृष्ण को इस बात का भय था कि बाद में चलकर आत्मीय स्वजनों के अनुरोध से नरेंद्र अनिच्छा होने पर भी कहीं विवाह न कर ले। वे कहते, "बारह वर्ष अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने पर मनुष्य की मेधानाही खुल जाती है। तब उसकी बुद्दिध अत्यंत तीक्ष्ण, कुशाग्र तथा अति सूक्ष्म तत्त्वों को भी धारण करने में समर्थ हो जाती है। इस प्रकार की सूक्ष्म बुद्धि के दुवारा ही ईश्वर के दर्शन होते हैं। वे केवल उसी प्रकार की शुद्ध बुद्धि के गोचर हैं।"
श्रीरामकृष्ण की उपदेश-विषयक अन्य बातों के संबंध में हमने नरेंद्रनाथ के श्रीमुख से ही प्रस्तुत किया है, "ठाकुर के संग किस प्रकार आनंद से दिन बीतते थे, दूसरों को समझाना कठिन है। खेल, हँसी, विनोद आदि साधारण विषयों द्वारा उन्होंने किस तरह उस संबंध में शिक्षा देकर अनजाने में हमारे आध्यात्मिक जीवन के गठन में सहायता दी थी, उस संबंध में आज सोचने पर बहुत आश्चर्य होता है। बालक को सिखाते समय शक्तिशाली पहलवान जिस प्रकार अपने को संवत रखकर बालक के अनुरूप शक्ति प्रदर्शित कर कभी उसे बहुत प्रयत्न के ट्वारा हराकर और कभी उससे स्वर्ष हारकर उसके मन में आत्मविश्वास उत्पन्न कर देता है, हमारे साथ व्यवहार करते हुए ठाकुर भी प्रायः वैसे ही भाव का अवलंबन करते थे। वे बिंदु के भीतर सदा सिंधु का दर्शन करते थे, उसी प्रकार हम लोगों के अंतर्निहित आध्यात्मिक भाव का बीज फल-फूलों के रूप में परिणत होगा, इस बात को उसी समय वे 'भावमुख' में प्रत्यक्ष कर, सदा हमारी प्रशंसा किया करते थे, उत्साह देते थे और किसी खास चासना में फैसकर हम जीवन की उस महान् सफलता को कहीं खो न बैठें, इसलिए विशेष सावधानी के साथ हमारे प्रत्येक व्यवहार पर ध्यान रखकर अनेक उपदेश देते हुए हमें संयत रखते थे; परंतु इस बात की हम उस समय विलकुल ही समझ नहीं सकते थे। वहीं उनके शिक्षा-प्रदान कर जीवन गठन करने का अपूर्व कौशल था।"
ध्यान-धारणा करते समय कुछ दूर अग्रसर हो मन जब अधिक एकाय होने का अवलंबन नहीं पाता था तो उनसे पूछने पर वैसी स्थिति में उन्होंने स्वयं क्या किया था, हमें बताकर अनेक उपयुक्त उपाय कह देते थे। मुझे स्मरण है, किसी रात को ध्यान में बैठने पर आलंबाजार स्थित जूट मिल के भोंपू की आवाज से मन विचलित हो जाता था।
उनसे इस बात को कहने पर उन्होंने उसी भोंपू की आवाज में मन को एकाग्र करने के लिए हमें आदेश दिया और हमने वैसा करके विशेष फल भी प्राप्त किया था। एक दूसरे अवसर पर ध्यान करते समय शरीर को भूलकर मन को लक्ष्य में समाहित करने में विशेष बाधा का अनुभव करके उनके पास में उपस्थित हुआ। उन्होंने स्वयं के वेदांत के समाधि-साधन काल में श्रीमत् तोतापुरी से भूमध्य में मन की एकाग्र रखने के लिए जिस प्रकार का आदेश पाया था, उस बात का उल्लेख करके अपने नखाय को मेरे भूमध्य में जोर से गड़ाकर उन्होंने कहा था, "इस वेदना पर मन की एकाग्र करो।" फलस्वरूप मैंने देखा था कि उस आघातजनित वेदना के अनुभव को जब तक चाहें मन में धारण किए रहा जा सकता है और उस समय शरीर के किसी दूसरे भाग पर मन के विचलित होने की बात दूर रही, उन अंगों के अस्तित्व का ज्ञान तक नहीं रहता था।
ठाकुर की साधना का स्थल निर्जन पंचवटी के नीचे हमारी ध्यान-धारणा करने का विशेष उपयोगी स्थान था। और केवल ध्यान-धारणा ही नहीं, खेल-मनोरंजन में भी हम वहाँ कुछ समय बिताया करते थे। उस समय भी वे हमारे साथ सहयोग देकर हमारा आनंदवर्धन किया करते थे। हम वहाँ दौड़ते थे, पेड़ पर चढ़ते थे, मजबूत रस्सी के समान लटकती हुई माधवी-लता के घेरे में बैठकर झूलते थे, फिर कभी वहाँ स्वयं पकाकर चन-भोजन करते थे। उस वन-भोजन के प्रथम दिन मैंने अपने हाथ से पकाया है, देखकर ठाकुर ने स्वयं भी भोजन ग्रहण किया था। यह जानकर कि वे ब्राह्मण के सिवा किसी दूसरे वर्ग के मनुष्य के हाथ का पकाया हुआ अन्न नहीं खाते हैं, मैं उनके लिए मंदिर का प्रसादी अन्न मैगवाने का ग्रंथ कर रहा था, किंतु मुझे मना करते हुए उन्होंने कहा, "तेरे जैसे शुद्ध सत्त्वगुणी के हाथ का अन्न खाने से कोई दोष नहीं होगा।" बार-बार मेरे आपत्ति करने पर भी उन्होंने मेरी बात को न माना और मेरे हाथ का पकाया हुआ अन्न उस दिन ग्रहण किया था।"
******



Comments