संतों के प्रति आदर-भाव
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मुकेश ‘नादान’
नरेंद्र को बचपन से ही साधु-संतों का सत्कार, उनका आदर करने में परम-आनंद मिलता था। उन्हें जब भी अवसर मिलता, साधु-संतों को कुछ-न-कुछ दान कर देते थे। उनकी इस प्रवृत्ति से घर के सभी सदस्य परेशान थे, परंतु नरेंद्र पर तो जैसे किसी बात का असर ही नहीं होता था।
एक दिन नरेंद्र नई धोती पहनकर साथियों के साथ खेल रहे थे, तभी दरवाजे पर आवाज हुई, "नारायण हरि!" तुरंत नरेंद्र वहाँ आ पहुँचे। आगंतुक ने कपड़े की माँग की। बिना किसी हिचकिचाहट के उसी क्षण नरेंद्र ने नए वत्र उतारकर उसके हाथ में दे दिए। किंतु वह छोटी धोती तो कमर में लपेटने के लिए काफी नहीं थी, अतः उसने उसे पगड़ी की तरह सिर में लपेटकर बालक को आशीर्वाद देते-देते हर्ष के साथ विदा ली। उन दिनों दत्तगृह में अकसर वाचकगण आते रहते थे। अतएव इसके बाद इस तरह किसी के आने पर नरेंद्र को किसी दूसरी जगह पर बंद करके रख दिया जाता। नरेंद्र इससे भी हतोत्साहित नहीं होते। अवसर पाते ही दूसरों को खिड़की से विविध वस्तुएँ राह चलते साधू या भिखारी के हाथों में डाल देते और आनंद से उत्फुल्ल हो जाते।
दोनों बड़ी बहनें भी उनके उत्पात से उद्विग्न हो जातीं। कभी बहनों के खदेड़कर पकड़ने जाने पर वे दौड़कर कूड़े-कचरे के ढेर पर चले जाते और वहीं से तरह-तरह के मुँह विचकाते-विचकाते मधुर हास्य के साथ कहते, "पकड़ो न, पकड़ो न!"
पालतू जीव-जंतुओं के साथ खेलना उन्हें अच्छा लगता था। उनके खेल के साथी थे, विलायती चूहा, बंदर, बकरा, काकातूआ (बड़ा तोता) और कबूतर। इनके अतिरिक्त घर की गाय उनकी परमप्रिय थी। उसके गले में माला पहनाकर, माथे में सिंदूर लगाकर और शरीर पर हाथ फेरकर वे उसके साथ कितनी ही मीठी बातें किया करते थे।
घर के नौकरों में घोड़े के सईस के साथ उनकी सबसे अधिक आत्मीयता थी और बचपन में उनकी सबसे बड़ी लालसा बड़ा होने पर सईस या कोचवान बनने की थी। सिर पर पगड़ी बाँधकर, गाड़ी के आगे ऊँचे आसन पर बैठकर, चाबुक घुमाते हुए चंचल-चंचल घोड़े को नगर के जाने-अनजाने विभिन्न स्थानों में चलाने में सचमुच एक पुरुषोचित गरिमा थी। दत्त-परिवार के लोग एक गाड़ी में घूमने बाहर निकले हैं। माँ की गोद में बैठे हुए नरेंद्रनाथ कई विषयों पर कितने ही प्रश्न करते चलते हैं, उनकी उत्सुकता की सीमा नहीं रहती। इसी बीच पिता ने उनसे पूछा, "विले, बड़े होने पर तुम क्या बनोगे, कहो तो?" नरेंद्र को सोचने की जरूरत नहीं थी, झट से उत्तर दिया, "सईस वा कोचवान।"
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