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हनुमान की खोज

  • Mar 2
  • 1 min read

मुकेश ‘नादान’

बचपन में माँ की गोद में बैठकर उन्होंने रामायण की जो अपूर्व हृदयाकर्षक कहानी सुनी थी, वह दांपत्य जीवन के दुखमव अनुभव से व्यक्ति सईस की तिक वाणी से अचानक मलिन हो जाने पर भी कभी भी हृदय से मिट नहीं सकी, बल्कि पश्चिमी जीवन के आदर्श के संघर्ष में वह और अधिक स्पष्ट हो गई थी। खासकर रामायण के हनुमान का चरित्र उन्हें बाल्यकाल में बहुत ही आकृष्ट करता था। महावीर हनुमान का आदर्श उनके हृदय में सदैव देदीप्यमान रहता तथा रामायण-गान का समाचार पाते ही वे उसे सुनने दौड़ पड़ते थे।

एक दिन वे किसी कथावाचक से रामायण की कथा सुन रहे थे। कथावाचक ने जब कहा, "हनुमान केले के वन में रहते हैं।" तब महावीर का दर्शन करने को उत्सुक धीरेश्वर उनसे पूछ बैठे, "वहाँ जाने पर क्या उनको देखा जा सकता है?"

बालक के उत्सुकता भरे प्रश्न के उत्तर में कथावाचक ने उपहास करते हुए कहा, "हाँ जी, जाकर ही देख लो वीरेश्वर के घर के बगल में ही केले की एक झाड़ी थी। कथा समाप्त होने पर रात में घर लौटने के मार्ग में धीरेश्वर उसी झाड़ी में जाकर केले के पेड़ के नीचे बैठकर हनुमान के आने की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु जब काफी देर बाद भी दर्शन नहीं हुए, तब व्यथित मन से घर लौटकर उन्होंने सबको यह बात बताई। तब बड़े-बूढ़ों ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "अरे विले, लगता है आज भगवान् के कार्य से हनुमान कहीं दूसरी जगह गए हैं, इसी से उन्हें तू देख नहीं पाया।" इससे वे बहुत आश्वस्त हुए।

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