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अनपढ़ व्यापारी

  • 1 day ago
  • 2 min read

राम प्रकाश वर्मा

एक छोटे से शहर के एक प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में एक आदमी काम करता था। उसका काम बड़ा साधारण था—पीरियड शुरू होने और छुट्टी होने की घंटी बजाना। दिन में कई बार स्कूल की शांत फिज़ा में उसकी आवाज़ गूंजती— “टन… टन… टन… टन… टन…”

बच्चों के लिए वह आवाज़ आज़ादी का संकेत थी, शिक्षकों के लिए अनुशासन का, और उसके लिए… बस रोज़ी-रोटी का साधन। वह आदमी सीधा-सादा था, कम बोलने वाला, और अपना काम ईमानदारी से करने वाला। उसे न किसी से शिकायत थी, न किसी से अपेक्षा। एक दिन स्कूल में नए प्रिंसिपल आए। सख्त स्वभाव के, नियम-कानून के पक्के। निरीक्षण करते-करते उनकी नज़र उस पर पड़ी।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“जी… रामू।”

“कितनी पढ़ाई की है?”

रामू ने सिर झुका लिया।

“साहब… पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।”

प्रिंसिपल चौंक पड़े।

“क्या? इतने बड़े स्कूल में एक अनपढ़ कर्मचारी? यह तो नियमों के खिलाफ है!”

और बस… एक आदेश ने वर्षों की नौकरी समाप्त कर दी।

रामू के हाथ से घंटी छूट गई।

अब उसके जीवन में सन्नाटा था—न “टन-टन” की आवाज़, न रोज़ की दिनचर्या।

कुछ दिन जैसे-तैसे गुज़रे। घर में राशन खत्म होने लगा। बच्चों की आंखों में सवाल थे। पत्नी के चेहरे पर चिंता।

तभी किसी ने सलाह दी—“अरे, स्कूल के सामने वाली सड़क पर समोसे बेच लो। बच्चों की भीड़ रहती है, कुछ न कुछ कमाई हो जाएगी।”

रामू के पास खोने को कुछ था ही नहीं। उसने उधार लेकर एक छोटा-सा ठेला लगाया। पहले दिन दस समोसे बिके। दूसरे दिन पंद्रह। तीसरे दिन बीस।

उसने मेहनत बढ़ा दी। समोसे गरम, कुरकुरे और स्वादिष्ट बनाने लगा।

धीरे-धीरे उसकी पहचान बनने लगी—

“अरे, स्कूल वाले रामू के समोसे खाए क्या?”

खोमचा गुमटी बना, गुमटी दुकान बनी। दुकान शहर की सबसे मशहूर दुकान बन गई।

अब वह सिर्फ समोसे ही नहीं, कचौरी, जलेबी, चाय—सब बेचने लगा।

समय बदला। उसने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और उन्हें व्यापार में लगाया। एक दुकान से तीन दुकानें, फिर होटल, फिर मिठाई का बड़ा प्रतिष्ठान।

कुछ ही वर्षों में वही “घंटी बजाने वाला रामू” शहर का प्रसिद्ध सेठ रामप्रसाद बन गया।

एक दिन एक पत्रकार उसका इंटरव्यू लेने आया। कैमरे, माइक और फ्लैश लाइट के बीच पत्रकार ने पूछा—“सेठ जी, आपकी सफलता की कहानी अद्भुत है। आप कहाँ तक पढ़े हैं?”

सेठ रामप्रसाद मुस्कुराए।

“मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ।”

पत्रकार हैरान रह गया।

“आप अनपढ़ होकर इतने बड़े व्यापारी बन गए! अगर आप पढ़े-लिखे होते तो आज कहाँ होते?”

सेठ ने हल्की हँसी के साथ जवाब दिया—“अगर पढ़ा-लिखा होता… तो शायद आज भी किसी स्कूल में घंटी ही बजा रहा होता।”

कमरे में सन्नाटा छा गया, फिर सब हंस पड़े। लेकिन उस हँसी के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी थी। डिग्री जरूरी है, पर उससे भी अधिक जरूरी है साहस। शिक्षा महत्वपूर्ण है, पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है परिश्रम। और सबसे ऊपर है—कर्म। किस्मत दरवाज़ा खटखटाती जरूर है, लेकिन दरवाज़ा खोलने का काम मेहनत करती है।

तो दोस्तों, यह कहानी मज़ाक में कही गई लग सकती है, पर संदेश स्पष्ट है—परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यदि मन में लगन और हाथों में मेहनत हो, तो घंटी बजाने वाला भी एक दिन सफलता की गूंज बन सकता है।

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