आरज़ू का सफ़र
नीलिमा त्रिपाठी
कभी मिलो तो तुमको बताएँ हम,
कि दिल की दुनिया कैसे जलाएँ हम।
चाँदनी रातों की नर्म आहट की तरह,
तुम्हारे ख़्वाबों में उतर जाएँ हम।
जो ग़ज़लें लिखी थीं चाहत में,
उन लफ़्ज़ों को क्यूँ न जलाएँ हम।
जैसे ख़ुशबू महके दरिया के संग,
तुम्हारी रूह तक बह जाएँ हम।
तुम्हारा इश्क़ तुमसे ही चुरा कर,
तुम्हारे ख़्वाबों को तोड़ आएँ हम।
सुब्ह के मोती से लिपटे किरन ज्यूँ,
तुम्हारी पलकों पे यूँ झिलमिलाएँ हम।
कभी धूप बन के झुलसा दें तुमको,
कभी छाँव बन के खुद बचाएँ हम।
बहारों की शफ़्फ़ाफ़ ख़ुशबू बन,
तुम्हारी साँसों में उतर जाएँ हम।
तुम्हारी नींदों में ऐसा ख़्वाब रख दें,
कि जागो तुम और सो न पाएँ हम।
सितारों की लोरी बनकर रात भर,
तुम्हारी आँखों में चमक जाएँ हम।
तुम्हारी चाहत से दूर भी रहें,
तुम्हारी रूह में भी समा जाएँ हम।
कभी बारिश की कोमल फुहार बनें,
कभी तूफ़ानों से भी टकराएं हम।
जो तुम रूठ जाओ तो हाल पूछें,
मुस्कराओ तो ग़ज़ल बन जाएँ हम।
जो तुम रो पड़ो तो अश्क़ बनें,
जो सोचो तो ख़याल बन जाएँ हम।
कभी चुपके से आ तुम्हारी आँखों में,
कभी ओस बनके गिर जाएँ हम।
कभी बर्फ़ सी ठंडी हवा बनकर,
कभी शोला बन पिघल जाएँ हम।
तुम्हारी रूह का आईना बन सकें,
तुम्हारी साँसों में घर बनाएँ हम।
कभी मीठे गीतों की तान बनें,
कभी यादों में बिखर जाएँ हम।
इश्क़ को इस तरह निभाएँ हम,
कि सदियों तलक गुनगुनाएँ हम।
तुम्हारी चाहत में मिट भी जाएँ,
तो फिर जनम ले के आएँ हम।
कसम से इतना तुम्हें चाहें हम,
हो कसम झूठी तो मर जायें हम।
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