चुन लिया आकाश
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
रक्षा लेखा नियंत्रक कार्यालय में कार्यभार संभाले सुनंदा को अभी एक महीना ही हुआ था। इतने कम समय में भी उसके अनुशासन, कार्यकुशलता और निर्णय लेने की क्षमता की चर्चा पूरे कार्यालय में होने लगी थी। वह अपने पद की गरिमा को समझती थी और काम में किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं करती थी।
उस सुबह कार्यालय पहुंचते ही उसने लंबित फाइलों की सूची देखी। एक महत्त्वपूर्ण वित्तीय परामर्श रिपोर्ट अब तक मुख्यालय नहीं भेजी गई थी, जबकि उसकी अंतिम तिथि बीत चुकी थी। उसने घंटी बजाकर कार्यालय सहायक को बुलाया।
“सुरेश, ए.एन.-4 अनुभाग के लेखाधिकारी को मेरे कक्ष में भेजिए।”
“जी मैडम।”
सुरेश के जाने के बाद सुनंदा फाइल पढ़ने लगी। कुछ ही मिनटों में दरवाजे पर दस्तक हुई।
“मे आई कम इन, मैडम?”
“यस, कम इन।”
सुनंदा ने जैसे ही सिर उठाया, सामने खड़ा व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसके चेहरे का रंग पलभर में बदल गया।
“सुनंदा... तुम?”
वह नाम सुनते ही सुनंदा की उंगलियां फाइल के पन्ने पर ठहर गईं। वर्षों पहले जिस अतीत को वह पीछे छोड़ चुकी थी, वह अचानक उसके सामने जीवित खड़ा था। किंतु अगले ही क्षण उसने स्वयं को संभाल लिया। उसकी आवाज में अधिकारी की दृढ़ता लौट आई।
“क्षमा कीजिए, आपका नाम?” आगंतुक समझ गया कि यह कोई व्यक्तिगत मुलाकात नहीं थी। उसने झेंपते हुए कहा—“पवन गुप्ता।”
“मिस्टर पवन गुप्ता, कार्यालय में किसी वरिष्ठ अधिकारी को उसके नाम से नहीं, पद अथवा ‘मैडम’ कहकर संबोधित किया जाता है।” पवन की दृष्टि झुक गई।
“आई एम सॉरी, मैडम।”
सुनंदा ने सामने रखी फाइल उसकी ओर बढ़ाई।
“मुख्यालय से वित्तीय परामर्श रिपोर्ट के संबंध में अनुस्मारक आया है। इसे भेजने की अंतिम तिथि निकल चुकी है। रिपोर्ट तैयार कर भेजने का दायित्व आपके अनुभाग का था। विलंब क्यों हुआ?”
पवन कुछ असहज होकर बोला—“मैडम, पिछले महीने मेरी दूसरी बेटी हुई है। घर में कुछ परेशानियां चल रही हैं। पत्नी की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। इस कारण मुझे कई बार छुट्टी लेनी पड़ी और रिपोर्ट समय पर पूरी नहीं हो सकी।”
‘दूसरी बेटी’ कहते समय उसके स्वर में खुशी से अधिक निराशा थी। सुनंदा ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा। वर्षों पहले की एक बातचीत उसके भीतर फिर गूंज उठी—तुम दो बहनें हो... तुम्हारा कोई भाई नहीं है... मैं दो परिवारों का दायित्व नहीं उठा सकता।
क्षणभर के लिए उसके मन में पुराना आक्रोश जागा, लेकिन उसने उसे अपने निर्णय पर हावी नहीं होने दिया। वह अब केवल अपने अतीत की आहत लड़की नहीं, एक उत्तरदायी अधिकारी थी।
उसने संतुलित स्वर में कहा—“परिवार में नवजात शिशु का आगमन अपने साथ कई जिम्मेदारियां लाता है। आवश्यकता हो तो नियमानुसार अवकाश लीजिए, लेकिन महत्त्वपूर्ण कार्यालयी कार्य को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के लंबित छोड़ना उचित नहीं है। अपने अनुभाग के दो अन्य कर्मचारियों की सहायता लीजिए और दो दिन के भीतर रिपोर्ट मेरी मेज पर रखिए।”
“जी मैडम।”
पवन जाने के लिए मुड़ा ही था कि सुनंदा ने कहा—“और हां, बेटी का जन्म कोई समस्या नहीं, प्रसन्नता का अवसर होता है। अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों का ध्यान रखिए।”


