जाने से पहले
Updated: 10 hours ago
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
महेश ने जब पहली बार शहर छोड़कर गाँव लौटने की बात कही, तो रेवती को लगा जैसे उसने कोई बहुत बड़ा और अव्यावहारिक निर्णय ले लिया हो। शहर में रहते हुए उन्हें वर्षों हो चुके थे। भले ही जिंदगी बहुत आरामदायक नहीं थी, फिर भी एक निश्चित ढर्रे पर चल रही थी। महेश एक निजी संस्थान में काम करता था। नौकरी स्थायी नहीं थी, लेकिन घर का खर्च किसी तरह चल जाता था। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे और रेवती भी शहर की जिंदगी की अभ्यस्त हो चुकी थी।
ऐसे में अचानक सब कुछ छोड़कर गाँव लौटने की बात उसके लिए स्वीकार करना आसान नहीं था। उसके मन में सबसे बड़ी चिंता बच्चों की पढ़ाई को लेकर थी। उसे लगता था कि गाँव जाकर बच्चों को वैसी शिक्षा और सुविधाएँ नहीं मिल पाएँगी जैसी शहर में मिल रही थीं। फिर खेती-बाड़ी के सहारे भविष्य बनाने का विचार भी उसे पीछे लौटने जैसा लगता था।
उसने महेश को समझाने की बहुत कोशिश की। कभी तर्क दिया, कभी नाराज हुई और कभी यहाँ तक कह दिया कि शायद उसकी अक्ल ही उसका साथ छोड़ चुकी है, जो वह वर्षों से बनाई हुई जिंदगी को अचानक समेटकर गाँव जाने की सोच रहा है। लेकिन इस बार महेश का निर्णय अटल था। उसने शनिवार तक शहर छोड़ने का निश्चय कर लिया था। केवल जरूरी सामान साथ ले जाना था और बाकी घरेलू चीजें बेच देनी थीं।
रेवती उसकी जिद से भीतर तक आहत थी। उसे सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का था कि हमेशा परिवार के छोटे-बड़े निर्णय उससे विचार-विमर्श करके लेने वाला महेश इस बार उसकी कोई बात सुनने को तैयार नहीं था। वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि महेश को अचानक शहर से इतनी विरक्ति हो गई।
पिछले कुछ महीनों से वह इतना अवश्य देख रही थी कि महेश का स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं रहा था। कभी थकान की शिकायत करता, कभी पेट में दर्द की, तो कभी बिना कारण चेहरा पीला पड़ जाता। कई बार अस्पताल भी गया था, लेकिन रेवती के पूछने पर हर बार सामान्य कमजोरी बताकर बात टाल देता।
रेवती ने इसे काम के तनाव और अनियमित दिनचर्या का परिणाम मान लिया था। उसे क्या पता था कि महेश उससे एक ऐसा सच छिपा रहा है, जिसे जानने के बाद शायद उसकी पूरी दुनिया उसी दिन बिखर जाती।
शनिवार आया और वर्षों से बसे उस छोटे-से घर का सामान सिमट गया। कुछ सामान बिक गया, कुछ परिचितों में बाँट दिया गया और आवश्यक चीजें एक वाहन में रख दी गईं। जब रेवती ने आखिरी बार उस घर का दरवाजा बंद किया, तो उसके भीतर एक अजीब-सी टीस उठी। बच्चे गाँव जाने को लेकर उत्साहित थे। उनके लिए यह एक नई जगह और नया अनुभव था। लेकिन रेवती के मन में केवल शिकायतें थीं।
महेश पूरे रास्ते शांत रहा। कभी बच्चों को देखता, कभी खिड़की से बाहर और कभी चुपके से रेवती की ओर। रेवती उससे नाराज थी, इसलिए अधिकांश समय दूसरी ओर मुँह किए बैठी रही। महेश शायद उससे बहुत कुछ कहना चाहता था, लेकिन हर बार कुछ कहने से पहले ही रुक जाता। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कह देने के बाद जीवन पहले जैसा नहीं रहता। महेश शायद उस अंतिम सामान्यता को कुछ दिन और बचाए रखना चाहता था।
गाँव पहुँचते ही महेश के माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वृद्ध पिता ने पोते-पोतियों को सीने से लगा लिया। माँ कभी बच्चों को देखतीं, कभी बेटे को और कभी बहू के सिर पर हाथ फेरतीं। बरसों बाद उनका सूना-सा घर बच्चों की आवाजों से भर गया था। रेवती ने उनका स्नेह देखा, लेकिन उसके भीतर की नाराजगी अभी समाप्त नहीं हुई थी।
शुरू के कुछ दिन उसे गाँव की हर चीज असुविधा लगती। कभी बिजली का चले जाना, कभी बाजार की दूरी, कभी शहर जैसी सुविधाओं का अभाव। उसे बार-बार अपना पुराना घर और शहर की जिंदगी याद आती। महेश उसकी मनःस्थिति समझता था। उसने कभी उसे समझाने के लिए दबाव नहीं डाला। इसके बजाय वह धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियाँ बनाने लगा जिनसे रेवती अपने सास-ससुर के निकट आ सके।
कभी माँ के हाथ के खाने की प्रशंसा करता, कभी बच्चों को दादा-दादी के पास बैठाकर पुरानी कहानियाँ सुनने को कहता। कभी खेती से संबंधित किसी काम में रेवती की राय माँगता और फिर पिता के सामने उसकी समझदारी की तारीफ कर देता। मानो वह परिवार के बीच वर्षों से बनी अदृश्य दूरियों को धीरे-धीरे मिटा रहा था। रेवती कई बार उसकी इन कोशिशों को देखकर झुँझला जाती। उसे लगता कि महेश जान-बूझकर उसे इस वातावरण का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहा है। और सच भी यही था। बस उसका कारण वह नहीं जानती थी।
महेश ने बच्चों का दाखिला पास के एक अच्छे विद्यालय में करा दिया। उनकी किताबें, यूनिफॉर्म और आने-जाने की व्यवस्था स्वयं देखी। उसने बच्चों को भी धीरे-धीरे गाँव की जिंदगी से परिचित कराना शुरू किया। शाम को उन्हें खेतों पर ले जाता, फसलों के बारे में बताता और कभी अपने पिता के साथ उन्हें बाजार ले जाता। बच्चों को नई जिंदगी पसंद आने लगी थी।
उधर महेश भी पिता के साथ खेती के काम में हाथ बँटाने लगा। वृद्ध पिता बेटे को अपने पास पाकर प्रसन्न थे। उन्हें लगता था कि वर्षों बाद उनका परिवार फिर एक छत के नीचे आ गया है। लेकिन एक बात उन्हें परेशान करती थी।
महेश दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा था। कुछ ही महीनों में उसका वजन काफी कम हो गया। थोड़ी देर खेत में काम करने के बाद वह थककर बैठ जाता। कभी अचानक साँस फूलने लगती तो कभी चेहरे पर असहनीय पीड़ा की लकीरें दिखाई देने लगतीं। पिता कई बार उसे डॉक्टर के पास चलने के लिए कहते, लेकिन वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर बात टाल देता। वास्तव में डॉक्टर के पास जाकर वह ऐसा कुछ नया सुनने वाला नहीं था जिसे वह पहले से न जानता हो।
शहर में ही अस्पताल के चक्कर लगाते समय उसे अपनी गंभीर बीमारी के बारे में पता चल चुका था। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया था कि बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी है। उपचार संभव था, लेकिन स्वस्थ हो जाने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी थी। उस दिन अस्पताल से बाहर निकलते समय महेश काफी देर तक सड़क किनारे एक बेंच पर बैठा रहा था।
उसे अपनी मृत्यु से उतना भय नहीं लगा था, जितना अपने पीछे छूट जाने वाले परिवार की कल्पना से। उसके बाद रेवती का क्या होगा? बच्चों की पढ़ाई कौन देखेगा? उसकी निजी नौकरी में न पेंशन थी, न इतनी बचत कि परिवार वर्षों तक उसके सहारे रह सके। रेवती के मायके की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि वे तीन लोगों की जिम्मेदारी उठा सकें।
उस रात उसने शायद जीवन का सबसे कठिन निर्णय लिया था। यदि वह शहर में ही रहता और वहीं उसकी मृत्यु हो जाती, तो रेवती बच्चों के साथ बिल्कुल अकेली पड़ जाती। लेकिन गाँव में उसके माता-पिता थे। पुश्तैनी घर था। खेती थी। परिवार की जड़ें थीं और सबसे बढ़कर दो ऐसे बुजुर्ग थे जो उसके बच्चों को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे।
उसे केवल गाँव वापस नहीं जाना था। उसे अपनी मृत्यु से पहले अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित आश्रय तैयार करना था। इसीलिए उसने रेवती की नाराजगी स्वीकार कर ली थी। उसके कठोर शब्द भी सह लिए थे। यहाँ तक कि उसकी नजरों में गलत बन जाना भी उसे मंजूर था। बस अपने जाने से पहले वह इतना सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि उसके बाद रेवती और बच्चे अकेले न रहें।
गाँव आए लगभग पाँच महीने बीत चुके थे। अब घर का वातावरण काफी बदल गया था। रेवती पहले की तरह हर बात पर नाराज नहीं होती थी। सास के साथ रसोई में उसका समय बीतने लगा था। कभी दोनों साथ बैठकर सब्जियाँ साफ करतीं, कभी बच्चों के बारे में बातें करतीं। ससुर भी घर के छोटे-बड़े फैसलों में उससे सलाह लेने लगे थे।
बच्चे दादा-दादी से इतने घुल-मिल गए थे कि छुट्टी के दिन अधिकांश समय उन्हीं के आसपास घूमते रहते। महेश यह सब देखता तो उसके चेहरे पर एक संतोष दिखाई देता। मानो कोई अधूरा काम धीरे-धीरे पूरा हो रहा हो। लेकिन उसका शरीर अब तेजी से जवाब दे रहा था। एक दिन खेत से लौटते समय अचानक उसे चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ा।
पिता घबरा गए। किसी तरह उसे घर लाया गया। उन्होंने शहर चलकर किसी बड़े डॉक्टर को दिखाने की जिद की, लेकिन महेश ने फिर बात टाल दी। उस रात रेवती पहली बार सचमुच डर गई। उसने महसूस किया कि जिस कमजोरी को वह सामान्य समझती रही थी, वह शायद सामान्य नहीं थी। उसने महेश से कई प्रश्न किए, लेकिन उसने उस समय भी केवल इतना कहा कि वह बहुत थक गया है और आराम करना चाहता है। कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें मनुष्य अंतिम क्षण तक अपने प्रियजनों से बचाए रखना चाहता है। लेकिन अब समय बहुत कम रह गया था।
कुछ दिनों बाद एक रात घर में सभी जल्दी सो गए। बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। बच्चे पास के कमरे में दादा-दादी के साथ सो चुके थे।
महेश बिस्तर पर लेटा छत की ओर देख रहा था। रेवती ने महसूस किया कि वह आज कुछ अधिक ही शांत है। काफी देर बाद महेश ने उसे अपने पास बैठने का संकेत किया। उस रात पहली बार उसने वह सच कह दिया जिसे वह महीनों से अकेला ढो रहा था। उसने बताया कि शहर में रहते हुए ही उसे अपनी गंभीर बीमारी के बारे में पता चल गया था। डॉक्टरों की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि उसके पास बहुत अधिक समय नहीं है। रेवती कुछ क्षण समझ ही नहीं पाई कि वह क्या सुन रही है।
महेश धीरे-धीरे उसे अपने निर्णय के पीछे छिपी पूरी कहानी समझाता रहा। शहर छोड़ना उसकी सनक नहीं थी। नौकरी छोड़ना कोई भावुक निर्णय नहीं था। गाँव लौटने की उसकी जिद भी अचानक पैदा नहीं हुई थी। वह जानता था कि उसके जाने के बाद शहर में रेवती और बच्चे अकेले रह जाएँगे। उसकी नौकरी स्थायी नहीं थी। बचत बहुत कम थी और रेवती के मायके की परिस्थितियाँ भी कठिन थीं। इसलिए वह अपने जीवन के बचे हुए समय में एक ही काम करना चाहता था—रेवती और बच्चों को ऐसे लोगों के बीच पहुँचा देना जो उसके न रहने पर भी उन्हें अपना समझें।
इसीलिए पिछले पाँच महीनों से वह रेवती और अपने माता-पिता के बीच की दूरी मिटाने में लगा था। इसीलिए उसने बच्चों को गाँव के विद्यालय में दाखिला दिलाया था। इसीलिए वह पिता के साथ खेती में जुटा था, ताकि रेवती भी धीरे-धीरे समझ सके कि परिवार की आजीविका आगे कैसे चल सकती है। वह अपने जाने की तैयारी नहीं कर रहा था।
वह अपने पीछे रह जाने वालों के जीवन की तैयारी कर रहा था। रेवती के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई।
उसे वे सारे अवसर याद आने लगे जब उसने महेश को कठोर बातें कही थीं। वह दिन भी याद आया जब उसने क्रोध में कह दिया था कि उसकी अक्ल चरने चली गई है। आज उसे समझ में आ रहा था कि जिस निर्णय को वह मूर्खता समझती रही, उसके पीछे कितनी दूरदर्शिता और कितना गहरा प्रेम छिपा था। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह महेश को आश्वस्त करती रही कि उसे कुछ नहीं होगा। सुबह होते ही वे डॉक्टर के पास जाएँगे। जरूरत पड़ी तो बड़े शहर जाएँगे। इलाज करवाएँगे। लेकिन महेश के चेहरे पर उस रात एक अलग ही शांति थी। मानो वह अपनी सबसे बड़ी चिंता से मुक्त हो चुका हो। उसने केवल इतना चाहा कि उसके बाद रेवती इस घर को छोड़कर न जाए। उसके माता-पिता को अपने माता-पिता समझे और बच्चों को उनके स्नेह से वंचित न करे। रेवती ने रोते हुए उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया। शायद यही आश्वासन महेश इतने महीनों से सुनना चाहता था। उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान उभरी।
उस रात बहुत दिनों बाद वह गहरी नींद सोया। लेकिन अगली सुबह सूरज की किरणें जब खिड़की से भीतर आईं, तो महेश उन्हें देखने के लिए नहीं जागा।
घर में जैसे समय ठहर गया। रेवती को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि पिछली रात तक उसके पास लेटा व्यक्ति अब केवल स्मृतियों में रह गया है। माँ बेटे के सिरहाने बैठी रो रही थीं। वृद्ध पिता की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे बच्चों के सामने स्वयं को संभालने की कोशिश कर रहे थे। रेवती स्तब्ध बैठी महेश का शांत चेहरा देखती रही। उसके कानों में महीनों पहले कहे अपने ही शब्द गूँज रहे थे—तुम्हारी अक्ल चरने गई है क्या…?
अब उन शब्दों का एक-एक अक्षर उसे भीतर तक चुभ रहा था। वह कितना गलत समझी थी उसे।
महेश चाहता तो बीमारी का पता चलते ही टूट सकता था। अपने भाग्य को कोस सकता था। इलाज के पीछे बची-खुची सारी जमा पूँजी खर्च करके परिवार को असुरक्षित छोड़ सकता था। या फिर अपनी मृत्यु की चिंता में बचे हुए दिन भय और निराशा में गुजार सकता था। लेकिन उसने अपने हिस्से के बचे हुए समय को भी परिवार के भविष्य के नाम कर दिया था। उसने चुपचाप अपनी पत्नी के लिए घर बनाया था—ईंटों का नहीं, रिश्तों का। उसने बच्चों के लिए सुरक्षा छोड़ी थी—बैंक खाते की नहीं, दादा-दादी के स्नेह की। और उसने अपने माता-पिता को जीवन के अंतिम वर्षों में सबसे बड़ा सहारा दिया था—अपनी बहू और पोते-पोतियों का साथ।
महेश चला गया था, लेकिन जाने से पहले उसने बिखर सकने वाले परिवार को इतनी मजबूती से एक-दूसरे से जोड़ दिया था कि उसके जाने के बाद भी वे अकेले नहीं थे। समय बीतता गया। रेवती ने गाँव नहीं छोड़ा। वही घर, जो कभी उसे बंधन लगता था, अब उसका सबसे सुरक्षित आश्रय बन गया। सास-ससुर उसके लिए वास्तव में माता-पिता बन गए। बच्चों की पढ़ाई चलती रही। खेतों से परिवार की जरूरतें पूरी होती रहीं और रेवती ने भी धीरे-धीरे घर तथा खेती की जिम्मेदारियों में स्वयं को जोड़ लिया। कभी-कभी शाम को वह आँगन में बैठकर बच्चों को दादा-दादी के साथ हँसते देखती तो उसकी आँखें नम हो जातीं। उसे लगता, महेश कहीं आसपास ही है। शायद यही दृश्य देखने के लिए उसने अपने जीवन के अंतिम महीनों में इतनी बड़ी योजना बनाई थी। उस समय रेवती को एक बात बहुत गहराई से समझ में आई—प्रेम हमेशा मीठे शब्दों में व्यक्त नहीं होता। कभी-कभी वह कठोर निर्णय का रूप लेकर हमारे सामने आता है और उसका अर्थ हमें बहुत देर बाद समझ में आता है।
महेश का गाँव लौटना पीछे की ओर उठाया गया कदम नहीं था। वह अपने परिवार के भविष्य की ओर उठाया गया उसका अंतिम और सबसे समझदार कदम था।
जीवन-संदेश : हम अक्सर किसी व्यक्ति के निर्णय को केवल उतना ही समझते हैं, जितना हमें दिखाई देता है। उसके पीछे छिपी चिंता, विवशता, दूरदर्शिता और प्रेम से हम अनजान रहते हैं। इसलिए किसी अपने के निर्णय पर तुरंत कठोर निष्कर्ष निकालने से पहले उसके मन को समझने का प्रयास करना चाहिए।
सच्चा प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं है। कभी-कभी प्रेम का सबसे बड़ा रूप यह होता है कि मनुष्य अपने न रहने की स्थिति में भी अपनों के लिए सुरक्षित भविष्य की व्यवस्था कर जाए। महेश अपने परिवार के साथ अधिक समय नहीं रह सका, लेकिन जाने से पहले वह इतना कर गया कि उसके बाद भी उसके अपने अकेले न रहें। और शायद प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषा भी यही है— स्वयं चले जाना, लेकिन अपनों के लिए पीछे एक ऐसा सहारा छोड़ जाना जो उन्हें कभी बिखरने न दे।
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