top of page

दहेज की दीवार

14 hours ago
12 min read

डॉ. शन्नो तिवारी

“नवीन, तुम्हारे लिए बहुत अच्छा रिश्ता आया है।” पिता के मुंह से विवाह का नाम सुनते ही नवीन के भीतर जैसे कोई पुराना घाव फिर हरा हो गया। सामने रखी चाय ठंडी होती रही और वह दोनों हाथों से सिर थामकर बैठ गया। कुछ क्षण पहले तक सामान्य दिखने वाला उसका चेहरा अचानक पीड़ा से भर उठा। आंखों में तैरती नमी को छिपाने के लिए उसने अपना मुख दूसरी ओर फेर लिया, पर दो बूंदें चुपचाप गालों पर उतर आईं।

मां बेचैन होकर उसके पास आईं। “क्या हुआ बेटा? विवाह की बात सुनते ही तुम्हारा मन क्यों खराब हो जाता है?” पिता भी सामने बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता कम और अधीरता अधिक थी। वे कई महीनों से नवीन का विवाह करना चाहते थे, लेकिन प्रत्येक प्रस्ताव पर नवीन किसी न किसी बहाने से बात टाल देता था। आज पिता ने निश्चय कर लिया था कि वे उससे स्पष्ट उत्तर लेकर ही रहेंगे।

“देखो बेटा,” उन्होंने कहा, “अब तुम्हारी उम्र भी निकलती जा रही है। इस बार बहुत बड़े घर से रिश्ता आया है। लड़की सुशिक्षित है, सुंदर है और उसके पिता संपन्न व्यापारी हैं। तुम्हें और क्या चाहिए?” नवीन मौन रहा।

पिता ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“वे लोग स्वयं यह रिश्ता करना चाहते हैं। कह रहे थे कि विवाह धूमधाम से करेंगे। तुम्हें कार देंगे और कारोबार शुरू करने के लिए भी अच्छी रकम मिल सकती है। यदि यह संबंध हो गया तो पूरे परिवार की स्थिति बदल जाएगी।”

‘कार’, ‘रकम’ और ‘परिवार की स्थिति’—इन शब्दों ने नवीन के हृदय पर हथौड़े की तरह प्रहार किया। उसे लगा, विवाह की चर्चा नहीं हो रही; उसकी बोली लगाई जा रही है।

उसने धीरे से पूछा—“आपने उन्हें कुछ मांग बताई है?” पिता थोड़ा असहज हुए।

“हमने मांग कब की? उन्होंने स्वयं कहा है कि अपनी बेटी को खाली हाथ नहीं भेजेंगे। आजकल सभी लोग देते हैं। इसमें बुरा क्या है?” नवीन ने पिता की ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। उसके भीतर अतीत का एक बंद दरवाजा खुल चुका था।

नवीन परिवार का सबसे बड़ा पुत्र था। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, दो छोटे भाई, तीन बहनें और विधवा बुआ के बच्चों सहित लगभग बारह सदस्य थे। परिवार की आर्थिक स्थिति साधारण थी और आय का मुख्य साधन पिता की सरकारी नौकरी थी। नवीन पढ़ाई में अत्यंत प्रतिभाशाली था। इंटरमीडिएट की परीक्षा में उसने जिले में उच्च स्थान प्राप्त किया और उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान की प्रवेश परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। जिस दिन प्रवेश-पत्र आया था, नवीन देर तक उसे हाथ में लिए अपने भविष्य के सपने देखता रहा। उसे मशीनों और तकनीक में विशेष रुचि थी। वह इंजीनियर बनना चाहता था। उसके अध्यापकों को विश्वास था कि एक दिन वह परिवार का ही नहीं, पूरे नगर का नाम रोशन करेगा।

लेकिन उसी वर्ष पिता की सेवानिवृत्ति का समय आ गया। पेंशन सीमित थी और घर की जिम्मेदारियां बहुत बड़ी। छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई, दादा-दादी की दवाइयां और तीन बहनों के विवाह की चिंता—सब पिता के सामने खड़े थे। एक रात पिता ने नवीन से कहा—“बेटा, यदि तुम चार वर्ष के लिए बाहर पढ़ने चले गए तो यह घर कैसे चलेगा? फीस, छात्रावास और किताबों का खर्च अलग। तुम समझदार हो, परिवार की परिस्थिति को समझो।”

अगली सुबह नवीन ने इंजीनियरिंग का प्रवेश-पत्र संदूक में रख दिया और नौकरी की तलाश में निकल पड़ा। कुछ ही महीनों में उसे एक निजी कंपनी में लेखा सहायक का काम मिल गया। वेतन बहुत अधिक नहीं था, लेकिन घर का चूल्हा चलता रहा। उसने अपनी इच्छाओं को एक-एक करके जिम्मेदारियों की तहों के नीचे दबा दिया।

जब मित्र महाविद्यालय की बातें करते, वह छोटे भाई की फीस भरता। जब कोई अपने भविष्य की योजना बनाता, वह बहनों के विवाह के लिए बचत करता। पांच वर्षों में परिवार की स्थिति कुछ सुधर गई, लेकिन नवीन के भीतर का युवा जैसे समय से पहले बूढ़ा हो गया था। उसने अपने सपनों का त्याग कभी परिवार पर एहसान की तरह नहीं जताया। उसे दुख था, शिकायत नहीं। लेकिन विवाह को भी परिवार की आर्थिक योजना बना देना उसे स्वीकार नहीं था। इस विरोध के पीछे एक पुरानी घटना थी, जिसने उसकी आत्मा पर गहरा निशान छोड़ दिया था।

लगभग डेढ़ वर्ष पहले पिता ने नवीन का संबंध एक मध्यमवर्गीय परिवार की युवती संध्या से तय किया था। संध्या स्नातक थी और पास के एक विद्यालय में पढ़ाती थी। उसका परिवार संपन्न नहीं था, पर शिक्षित और संस्कारी था। पहली मुलाकात में ही नवीन ने संध्या की सादगी और स्पष्टता को पसंद किया था। संध्या ने भी नवीन के संघर्षशील स्वभाव और पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति उसके समर्पण का सम्मान किया। दोनों परिवारों की सहमति से संबंध निश्चित हो गया।

संध्या के पिता ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार विवाह करने की बात कही थी। आरंभ में नवीन के पिता ने कहा— “हमें कुछ नहीं चाहिए। बस लड़की अच्छी होनी चाहिए।” लेकिन जैसे-जैसे विवाह की तिथि निकट आई, रिश्तेदारों और परिचितों ने पिता के मन में अपेक्षाएं जगानी शुरू कर दीं।

किसी ने कहा—“इतने बड़े परिवार का लड़का है, कम से कम एक कार तो मिलनी चाहिए।”

दूसरे ने समझाया—“नवीन की नौकरी अच्छी है। यदि अभी अवसर छोड़ दिया तो बाद में पछताओगे।”

पिता की सोच बदलने लगी। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से संध्या के परिवार के सामने कार और बड़ी नकद राशि की इच्छा रख दी। संध्या के पिता ने हाथ जोड़कर कहा—“समधीजी, मैं अपनी बेटी को आवश्यक सामान और कुछ आभूषण अवश्य दूंगा, लेकिन इतनी बड़ी रकम और कार की व्यवस्था मेरे लिए संभव नहीं है।” बात नवीन तक पहुंचने से पहले ही पिता ने संबंध तोड़ दिया।

उन्होंने घर आकर केवल इतना कहा—“वे लोग विवाह के योग्य नहीं हैं। अपनी बेटी को ठीक से विदा तक नहीं कर सकते।” जब नवीन को वास्तविक कारण पता चला, तब बहुत देर हो चुकी थी। उसने पिता से विरोध किया, पर उन्होंने परिवार की मजबूरियों का तर्क दे दिया। “तुम्हारी तीन बहनें हैं,” पिता ने कहा था। “यदि तुम्हारे विवाह में कुछ पैसा आ जाए तो उनकी शादियां आसानी से हो जाएंगी। इसमें गलत क्या है?”

नवीन ने आहत स्वर में पूछा—“एक बेटी के पिता से पैसा लेकर अपनी बेटियों का विवाह करना आपको उचित लगता है?” पिता क्रोधित हो गए। “तुम अभी दुनिया नहीं समझते। समाज ऐसे ही चलता है।”

उधर संध्या की मां रिश्ता टूटने की खबर से बुरी तरह टूट गई थीं। उन्होंने विवाह की तैयारियों में अपनी छोटी-सी बचत लगा दी थी। रिश्तेदारों के प्रश्न और समाज के तानों ने उनकी पीड़ा बढ़ा दी। वे एक दिन नवीन के घर भी आई थीं। आंखों में आंसू लिए उन्होंने उसके माता-पिता से कहा था—“हमारी सामर्थ्य कम है, लेकिन हमारी बेटी में कोई कमी नहीं। यदि आप चाहें तो विवाह साधारण ढंग से कर दीजिए। हम जीवनभर आपके आभारी रहेंगे।”

लेकिन पिता नहीं पिघले। मां ने भी पति के निर्णय का विरोध नहीं किया।

घर से जाते समय संध्या की मां ने नवीन को देखा था। उनकी आंखों में शिकायत से अधिक ममता थी। उन्होंने कांपते हाथ से उसके सिर को छुआ और कहा—“तुम्हारा कोई दोष नहीं है, बेटा। ईश्वर तुम्हें सुखी रखे और अच्छी जीवनसंगिनी दे।” ये शब्द नवीन के हृदय में गहरे उतर गए थे।

कुछ सप्ताह बाद समाचार मिला कि पहले से मानसिक तनाव से जूझ रही संध्या की मां उस आघात और सामाजिक अपमान को सह नहीं पाईं और उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया। किसी जीवन के अंत को केवल एक घटना का परिणाम नहीं कहा जा सकता, लेकिन नवीन जानता था कि टूटे संबंध और उससे उपजी अपमानजनक परिस्थितियां उनके अंतिम आघातों में अवश्य शामिल थीं। वह स्वयं को क्षमा नहीं कर सका।

उसे लगता था कि यदि उसने समय रहते साहस दिखाया होता, पिता का खुलकर विरोध किया होता और संध्या के पक्ष में खड़ा हुआ होता, तो शायद परिस्थितियां कुछ और होतीं। उस दिन के बाद विवाह शब्द सुनते ही उसे संध्या की मां का आंसुओं से भरा चेहरा और उनका अंतिम आशीर्वाद याद आ जाता।

आज पिता फिर एक संपन्न परिवार का प्रस्ताव लेकर उसके सामने बैठे थे। “बेटा, कुछ तो बोलो,” मां ने कहा। “इतना अच्छा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता।” पिता ने समझाने का प्रयास किया—“लड़की के पिता स्वयं सब कुछ देना चाहते हैं। उनके धन से तुम्हारा कारोबार भी शुरू हो सकता है। तुम्हारी बहनों के विवाह की चिंता भी कम हो जाएगी। मैं बूढ़ा हो रहा हूं। पता नहीं नाती-पोतों का मुख देख पाऊंगा या नहीं।”

नवीन ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। अब उसकी आंखों में आंसुओं के स्थान पर कठोर दृढ़ता थी।

“पिताजी, क्या विवाह का उद्देश्य केवल धन पाना और बच्चे पैदा करना है?”

पिता ने नाराज होकर कहा—“यह कैसी भाषा है? परिवार बसाना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है।”

“परिवार किसी दूसरे परिवार को अपमानित करके नहीं बसाया जाता,” नवीन ने उत्तर दिया। “जिस घर की नींव दहेज पर रखी जाए, वहां सुख कैसे टिकेगा?” मां ने कहा— “तुम हर बार पुरानी बातें क्यों ले बैठते हो? जो हो गया, उसे भूल जाओ।” नवीन का स्वर भर्रा गया।

“जिस घटना में एक परिवार उजड़ गया, उसे मैं कैसे भूल जाऊं? संध्या की मां ने जाते समय भी मुझे आशीर्वाद दिया था। हम उनके विश्वास और उनकी विवशता—दोनों का सम्मान नहीं कर सके।”

पिता ने कठोर स्वर में कहा—“उनकी मृत्यु के लिए हमें दोष मत दो। हमने केवल रिश्ता तोड़ा था।”

“मैं यह नहीं कह रहा कि उनकी मृत्यु का पूरा दोष आपका है,” नवीन ने संयत किंतु दृढ़ आवाज में कहा, “लेकिन हमने उनके दुख में अपना हिस्सा अवश्य जोड़ा। आपने उनकी बेटी के गुण नहीं देखे; केवल यह देखा कि उसके पिता कितने रुपये दे सकते हैं। मैं उस अन्याय से स्वयं को अलग नहीं कर पाया, क्योंकि उस समय मैं मौन रहा।” कमरे में सन्नाटा छा गया। नवीन ने पिता की आंखों में देखते हुए कहा—“आज मैं फिर मौन नहीं रहूंगा।”

“तुम कहना क्या चाहते हो?” पिता ने पूछा। नवीन ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया—“यदि मैं विवाह करूंगा तो बिना दहेज के करूंगा। और सबसे पहले संध्या से मिलकर उससे तथा उसके परिवार से क्षमा मांगूंगा। यदि वह अपनी स्वतंत्र इच्छा से मुझे स्वीकार करे, तभी उससे विवाह का प्रस्ताव रखूंगा। यदि वह मना कर दे तो उसके निर्णय का सम्मान करूंगा। मैं उसे अपने अपराधबोध का उपचार नहीं बनाऊंगा।” पिता स्तब्ध रह गए।

“जिस लड़की से हमने रिश्ता तोड़ दिया, उसके घर फिर जाओगे? समाज क्या कहेगा?”

“समाज ने मेरे सपनों का बोझ नहीं उठाया, मेरी जिम्मेदारियां नहीं निभाईं और उस मां के आंसू नहीं देखे। अब समाज मेरे जीवन का निर्णय भी नहीं करेगा।” मां ने डरते हुए पूछा— “और यदि संध्या ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया?” “तो उसका पूरा अधिकार है। क्षमा मांगना मेरा कर्तव्य है, क्षमा करना उसकी बाध्यता नहीं।”

नवीन का उत्तर सुनकर पिता-पुत्र के बीच वर्षों से छिपा वैचारिक अंतर अचानक स्पष्ट हो गया। एक ओर पिता थे, जिनके लिए बेटे का विवाह परिवार की आर्थिक कठिनाइयों का समाधान था; दूसरी ओर नवीन था, जो अब किसी बेटी के परिवार को अपनी समस्याओं की कीमत नहीं बनाना चाहता था। वह उठकर कमरे से बाहर चला गया।

पिता देर तक बंद दरवाजे को देखते रहे। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि परिवार का भार उठाते-उठाते उनका बेटा इतना बड़ा हो गया था कि सही और गलत का निर्णय स्वयं कर सके। उसके सपने उन्होंने पहले ही रोक दिए थे; अब यदि उसके विवेक को भी दबाया, तो संभव है पुत्र घर में रहकर भी उनसे बहुत दूर चला जाए।

अगले दिन नवीन अकेला संध्या के घर पहुंचा। कभी विवाह की तैयारियों से जीवंत रहने वाला वह घर अब शांत और उदास था। दरवाजा संध्या के पिता ने खोला। नवीन को देखते ही उनका चेहरा कठोर हो गया।

“अब यहां क्यों आए हो?” नवीन ने सिर झुका लिया। “आपसे और संध्या से क्षमा मांगने।” “क्षमा मांगने से मेरी पत्नी वापस आ जाएगी?” यह प्रश्न नवीन के हृदय में तीर की तरह लगा। उसने धीमे स्वर में कहा—“नहीं। और न ही मेरे पास अपने मौन के लिए कोई सफाई है। मैं समय रहते आपके साथ खड़ा नहीं हो सका। मैं अपराधी भले न रहा होऊं, लेकिन कायर अवश्य था।”

संध्या अंदर से यह संवाद सुन रही थी। वह बाहर आई तो नवीन उसे पहचानकर भी कुछ क्षण देखता रह गया। चेहरे पर पहले जैसी सहजता थी, पर आंखों में गहरी उदासी उतर आई थी। संध्या ने शांत स्वर में पूछा—“क्या केवल क्षमा मांगने आए हो?”

नवीन ने कहा—“सबसे पहले उसी के लिए आया हूं। इसके बाद एक प्रस्ताव रखना चाहता हूं, लेकिन तुम्हें उसे स्वीकार करने का कोई दायित्व नहीं है।” “कैसा प्रस्ताव?”

“मैं आज भी तुम्हारा सम्मान करता हूं। यदि तुम्हारे मन में मेरे लिए घृणा न हो और तुम अपनी इच्छा से चाहो, तो मैं बिना दहेज और बिना किसी दिखावे के तुमसे विवाह करना चाहता हूं।” संध्या ने उसकी ओर सीधी दृष्टि से देखा। “क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो या अपनी अंतरात्मा का बोझ हल्का करना चाहते हो?”

यह प्रश्न नवीन को भीतर तक छू गया। उसने उत्तर देने में जल्दबाजी नहीं की।

“शायद मेरे भीतर अपराधबोध भी है,” उसने ईमानदारी से कहा, “लेकिन मैं तुम्हें किसी प्रायश्चित का साधन नहीं बनाना चाहता। तुम्हारी सादगी, शिक्षा और आत्मसम्मान ने मुझे पहली मुलाकात से प्रभावित किया था। उस समय मैं तुम्हारे लिए खड़ा नहीं हो सका—यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। आज प्रस्ताव रख सकता हूं, निर्णय केवल तुम्हारा होगा।”

संध्या ने पूछा—“और तुम्हारा परिवार? क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे?”

“यदि स्वीकार करेंगे तो सम्मान के साथ। यदि नहीं करेंगे तो भी मैं अपने निर्णय से पीछे नहीं हटूंगा। लेकिन मैं चाहता हूं कि बात विद्रोह से नहीं, सत्य से सुलझे। मैं उन्हें बदलने का एक अवसर अवश्य दूंगा।” संध्या ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया। “मुझे समय चाहिए।” “जितना चाहो।”

नवीन ने संध्या के पिता की ओर मुड़कर कहा—“मैं आपसे क्षमा की याचना कर सकता हूं, पर क्षमा की मांग नहीं। आपने जो खोया है, उसकी भरपाई संभव नहीं। इतना वचन दे सकता हूं कि भविष्य में अपने परिवार में दहेज को कभी स्थान नहीं दूंगा।” वह हाथ जोड़कर वापस लौट आया।

घर पहुंचा तो पिता बैठक में उसका इंतजार कर रहे थे। “गए थे उस घर?” “जी।” “क्या कहा उन्होंने?”

“उन्होंने हमारी बात स्वीकार नहीं की, केवल सुन ली। संध्या ने निर्णय के लिए समय मांगा है।”

पिता ने व्यंग्य से कहा—“अब हम उसके उत्तर की प्रतीक्षा करेंगे?”

नवीन ने शांत स्वर में कहा—“हां। विवाह दो व्यक्तियों का निर्णय है, किसी परिवार की खरीद-बिक्री नहीं।”

पिता क्रोधित होने ही वाले थे कि सबसे छोटी बेटी सीमा कमरे में आ गई। वह अब तक चुपचाप सारी बातें सुन रही थी। उसने पिता से पूछा—“पिताजी, यदि कोई मेरे विवाह के समय आपसे कार और लाखों रुपये मांगे और पैसे न मिलने पर रिश्ता तोड़ दे तो आपको कैसा लगेगा?” पिता के होंठ खुले रह गए, पर उत्तर नहीं निकला।

सीमा ने फिर पूछा—“भैया के विवाह में मिले दहेज से आप मेरी शादी करेंगे। फिर मेरे ससुराल वाले अपने बेटे के विवाह में मिले दहेज से अपनी बेटी की शादी करेंगे। यह सिलसिला कहां समाप्त होगा?” कमरे में गहरा मौन छा गया। पिता ने पहली बार विवाह और दहेज को पुत्री के पिता की दृष्टि से देखा। उन्हें संध्या की मां के जुड़े हुए हाथ याद आए, जिन्हें उन्होंने उस समय विवशता समझकर उपेक्षित कर दिया था। वह दृश्य अब अपनी बेटी सीमा के चेहरे पर उभर आया। उस रात पिता देर तक सो नहीं सके। सुबह उन्होंने नवीन को अपने पास बुलाया।

“बेटा, मैं तुम्हारे साथ संध्या के घर चलना चाहता हूं।” नवीन ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा। पिता की आंखें झुकी हुई थीं। “मैंने जीवन की कठिनाइयों को अपने लालच का तर्क बना लिया था। बेटियों के विवाह की चिंता थी, लेकिन उसका समाधान किसी दूसरी बेटी के पिता को लूटना नहीं हो सकता। संध्या के परिवार से क्षमा मुझे मांगनी चाहिए।”

कुछ दिनों बाद नवीन अपने माता-पिता के साथ संध्या के घर पहुंचा। इस बार पिता ने बिना किसी सफाई के अपनी गलती स्वीकार की। “मैंने आपके परिवार और आपकी बेटी का अपमान किया। आर्थिक चिंता ने मेरी दृष्टि इतनी संकुचित कर दी कि मैं मनुष्यता भूल गया। आप हमें क्षमा करें या न करें, लेकिन मैं यह वचन देता हूं कि अपने किसी भी बच्चे के विवाह में न दहेज लूंगा, न दूंगा।”

संध्या के पिता की आंखें भर आईं। घाव पूरी तरह भरे नहीं थे, पर सत्य स्वीकार करने से उनमें जमी कठोरता कुछ पिघली। संध्या ने भी नवीन को समय के साथ परखा। उसने स्पष्ट कहा कि विवाह सहानुभूति, दबाव अथवा प्रायश्चित के कारण नहीं होगा। नवीन ने उसकी प्रत्येक शर्त स्वीकार की। दोनों ने कई बार बात की, अपने विचार साझा किए और भविष्य की जिम्मेदारियों पर खुलकर चर्चा की। अंततः संध्या ने विवाह के लिए सहमति दी।

विवाह अत्यंत सादगी से हुआ। न कोई दहेज लिया गया, न अनावश्यक प्रदर्शन किया गया। नवीन ने विवाह के लिए बचाई राशि का एक भाग अपनी बहनों की शिक्षा के लिए रखा और दूसरा भाग ऐसी संस्था को दिया जो आर्थिक तथा मानसिक संकट से जूझ रही महिलाओं को परामर्श और सहायता देती थी।

विवाह के दिन संध्या की मां का चित्र फूलों से सजाया गया। उसके सामने दीप जलाते समय नवीन की आंखें नम हो गईं। उसे उनका अंतिम आशीर्वाद याद आया—“ईश्वर तुम्हें सुखी रखे और अच्छी जीवनसंगिनी दे।”

आज उसे लगा कि उनका आशीर्वाद फलित हुआ है, लेकिन उससे पहले उसे अपनी कायरता, परिवार के लालच और समाज की कुरीति से लड़ना पड़ा। पिता उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले—“बेटा, उस दिन मुझे लगा था कि तुम्हारे फैसले ने हमारे बीच दूरी बढ़ा दी है। आज समझ आया कि तुम्हारे फैसले ने मुझे मेरी भूल से दूर और तुमसे फिर निकट कर दिया।” नवीन ने पिता का हाथ थाम लिया।

कुछ फैसले घरों को तोड़ते नहीं; वे उन दीवारों को तोड़ते हैं, जो घर के भीतर मनुष्यों को एक-दूसरे से दूर किए रहती हैं।

जीवन-संदेश :

दहेज केवल धन का लेन-देन नहीं, मनुष्य की गरिमा का अपमान है। आर्थिक कठिनाई, सामाजिक परंपरा अथवा बेटियों के विवाह की चिंता किसी को यह अधिकार नहीं देती कि वह दूसरे परिवार की विवशता का लाभ उठाए।

अन्याय के सामने मौन रहना भी पीड़ित की वेदना बढ़ा सकता है। इसलिए सही समय पर सही बात कहने का साहस आवश्यक है। साथ ही, प्रायश्चित का अर्थ किसी दूसरे व्यक्ति पर अपना निर्णय थोपना नहीं; अपनी गलती स्वीकार करना, क्षमा मांगना और सुधार का मार्ग चुनना है। विवाह प्रेम, समानता और स्वतंत्र सहमति का संबंध है—सौदेबाजी का नहीं।

जिस घर की नींव दहेज पर रखी जाती है, वहां संबंध बोझ बन जाते हैं; और जिस घर की नींव सम्मान पर रखी जाए, वहां दो परिवार सचमुच एक हो जाते हैं।

******

Comments


bottom of page