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दो अदृश्य रत्न

23 hours ago
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डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव

सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था। नदी के ऊपर हल्का-सा कोहरा तैर रहा था। घाट की सीढ़ियों पर कहीं मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं, कहीं श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे। नाविक अपनी नावों की रस्सियाँ खोल रहे थे और फूल बेचने वाली बूढ़ी औरतें छोटी-छोटी टोकरियाँ सजाने में लगी थीं। उसी घाट की सबसे अंतिम सीढ़ी पर प्रतिदिन एक वृद्ध साधु आकर बैठता था। सफेद दाढ़ी, शांत चेहरा, साधारण गेरुए वस्त्र और हाथ में लकड़ी की एक पुरानी छड़ी। उसके पास न कोई झोली थी, न चमत्कार दिखाने का सामान और न ही शिष्यों की भीड़। फिर भी उसमें कुछ ऐसा था जो उसे दूसरों से अलग बनाता था।

वह कुछ देर शांत भाव से नदी को देखता और फिर अचानक ऊँची आवाज में पुकारता—“जो सच्चे मन से चाहोगे, वह पाओगे!”

कुछ क्षण रुककर फिर कहता—“जो चाहोगे, वह पाओगे!”

लोग आते-जाते उसकी आवाज सुनते। कुछ बिना ध्यान दिए आगे निकल जाते। कुछ मुस्करा देते और कुछ उसका मजाक भी उड़ाते।

एक दिन दो व्यापारी वहाँ से गुजर रहे थे। एक ने हँसते हुए कहा—“बाबा! अगर जो चाहें वही मिल सकता है, तो हमें राजा बना दीजिए।”

दूसरे ने ठहाका लगाया। साधु ने उनकी ओर देखा और मुस्कराकर कहा—“राजा बनने की इच्छा करना आसान है पुत्र, लेकिन राजा बनने की कीमत चुकाने की इच्छा भी होनी चाहिए।”

दोनों व्यापारी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे और फिर हँसते हुए आगे बढ़ गए। साधु फिर नदी की ओर देखने लगा। उसे किसी को अपनी बात मनवाने की जल्दी नहीं थी। वह जानता था कि जीवन की कुछ बातें केवल उसी व्यक्ति को समझ में आती हैं जो उन्हें समझने के लिए तैयार हो।

उसी नगर में माधव नाम का एक युवक रहता था। उसके पिता की एक छोटी-सी दुकान थी, जिससे परिवार का खर्च किसी तरह चलता था। माधव ने बचपन से अभाव देखे थे। कई बार उसने अपनी माँ को घर का खर्च पूरा करने के लिए अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ दबाते देखा था। माधव महत्वाकांक्षी था। वह जीवन भर अभावों में नहीं रहना चाहता था। नगर के मुख्य बाजार में हीरों और जवाहरात की कुछ बड़ी दुकानें थीं। जब भी माधव वहाँ से गुजरता, शीशे के भीतर चमकते हीरों को देर तक देखता रहता।

एक दिन उसने अपने मित्र से कहा था—“देखना, एक दिन मेरी भी ऐसी ही दुकान होगी।”

मित्र हँस पड़ा। “दुकान? ऐसी?” “हाँ।” “माधव, सपने भी अपनी हैसियत देखकर देखने चाहिए।”

यह वाक्य माधव के मन में तीर की तरह चुभ गया। उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उस रात देर तक सो नहीं सका। उसके भीतर एक ही प्रश्न घूमता रहा—क्या मनुष्य को उतना ही सपना देखना चाहिए, जितनी आज उसकी हैसियत है? यदि ऐसा है, तो फिर कोई गरीब कभी अमीर कैसे बनेगा? कोई साधारण व्यक्ति असाधारण कैसे बनेगा?

अगली सुबह माधव किसी काम से नदी के पार जा रहा था। जैसे ही वह घाट पर पहुँचा, उसे वही आवाज सुनाई दी—“जो सच्चे मन से चाहोगे, वह पाओगे!” माधव के कदम अचानक रुक गए।

साधु फिर बोला—“जो चाहोगे, वह पाओगे!”

आज न जाने क्यों वह वाक्य सीधे माधव के भीतर उतर गया। वह साधु के पास गया और प्रणाम करके बैठ गया। “महाराज, क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?”

“पूछो पुत्र।”

“आप रोज कहते हैं कि मनुष्य जो चाहे, वह पा सकता है। क्या आप सचमुच इस बात पर विश्वास करते हैं?” साधु ने उसकी आँखों में देखा। “तुम नहीं करते?” माधव थोड़ा असहज हो गया। “करना चाहता हूँ, लेकिन जीवन कुछ और ही दिखाता है।” “क्या दिखाता है?” “यही कि जिसके पास धन है, उसे अवसर मिलता है। जिसके पास पहचान है, वह आगे बढ़ जाता है। मेरे जैसे साधारण आदमी के लिए बड़े सपने देखना शायद केवल मन को बहलाना है।”

साधु मुस्कराया। “तो तुम यहाँ मुझसे प्रश्न पूछने क्यों आए हो?” माधव चुप हो गया।

साधु ने कहा—“क्योंकि तुम्हारे भीतर अभी भी विश्वास जीवित है। तुम्हारा मन हार मानना चाहता है, लेकिन तुम्हारा सपना हार मानने को तैयार नहीं है।” माधव पहली बार मुस्कराया।

“महाराज, मैं बहुत बड़ा हीरा व्यापारी बनना चाहता हूँ।” साधु ने सहज भाव से कहा—“तो बन जाओ।”

माधव को लगा जैसे साधु उसका मजाक उड़ा रहा है। “इतना आसान होता तो हर कोई बड़ा व्यापारी बन जाता।” “मैंने कब कहा कि आसान है?” साधु का स्वर गंभीर हो गया। “मैंने केवल इतना कहा कि संभव है।”

कुछ क्षण मौन रहने के बाद साधु ने माधव का दाहिना हाथ अपने हाथ में लिया। उसकी हथेली को बंद करते हुए कहा—“आज मैं तुम्हें संसार का सबसे मूल्यवान हीरा देता हूँ।” माधव की धड़कन तेज हो गई। उसने तुरंत मुट्ठी खोली। हथेली खाली थी। वह हैरानी से साधु की ओर देखने लगा। “महाराज… यहाँ तो कुछ भी नहीं है।”

साधु हँसा। “ध्यान से देखो।” माधव ने फिर अपनी हथेली देखी। “कुछ नहीं है।”

“वही तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है, पुत्र। जो दिखाई नहीं देता, मनुष्य अक्सर उसका मूल्य नहीं समझता।”

माधव अब पूरी तरह साधु की बातों में डूब चुका था। “यह हीरा कौन-सा है?”

साधु ने कहा—“समय।” माधव चुप रहा। साधु ने नदी की ओर संकेत किया।

“इस बहती नदी को देख रहे हो?” “हाँ।” “क्या तुम इसमें बह चुका पानी वापस ला सकते हो?” “नहीं।”

“समय भी इसी नदी की तरह है। जो क्षण चला गया, वह फिर कभी लौटकर नहीं आता।” साधु ने माधव की हथेली फिर बंद कर दी। “धन खो जाए तो वापस कमाया जा सकता है। मकान टूट जाए तो फिर बनाया जा सकता है। व्यापार नष्ट हो जाए तो फिर खड़ा किया जा सकता है। लेकिन जीवन का बीता हुआ एक क्षण संसार की सारी संपत्ति देकर भी वापस नहीं खरीदा जा सकता।” माधव के चेहरे की गंभीरता बढ़ती जा रही थी।

“इसलिए याद रखना—जिस दिन तुमने समय का मूल्य समझ लिया, उसी दिन तुम्हारे सपने ने वास्तविकता की ओर पहला कदम बढ़ा दिया।”

अब साधु ने माधव का बायाँ हाथ पकड़ा। “और अब तुम्हें संसार का सबसे मूल्यवान मोती देता हूँ।”

इस बार माधव ने अपनी हथेली खोलकर देखने की कोशिश नहीं की। उसने सीधे पूछा—“इसका नाम क्या है?” साधु मुस्कराया। “धैर्य।” “लेकिन महाराज, सफलता के लिए मेहनत अधिक जरूरी नहीं है?”

“बहुत जरूरी है। लेकिन मेहनत का परिणाम हमेशा तुरंत नहीं मिलता।”

साधु ने पास पड़ी मिट्टी से एक छोटा-सा बीज उठाया।

“मान लो तुमने इसे आज मिट्टी में बोया और कल सुबह खोदकर देखने लगे कि पौधा निकला या नहीं। फिर अगले दिन दोबारा खोदा। क्या यह कभी वृक्ष बन पाएगा?” “नहीं।”

“क्यों?” “क्योंकि उसे बढ़ने के लिए समय चाहिए।” “और तुम्हें?” माधव समझ गया।

साधु ने कहा—“जीवन की सबसे बड़ी सफलताएँ बीज की तरह होती हैं। मेहनत उन्हें बोती है, समय उन्हें सींचता है और धैर्य उन्हें मिट्टी के भीतर जीवित रखता है।”

फिर साधु ने माधव की दोनों हथेलियाँ अपने हाथों में लेते हुए कहा—“एक हाथ में समय, दूसरे में धैर्य। अब तुम्हारे पास वह पूँजी है जिससे तुम अपनी इच्छा पूरी कर सकते हो।”

अगले दिन माधव नगर के सबसे बड़े जौहरी से मिलने पहुँचा। “मुझे काम चाहिए।”

मालिक ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। “हीरों के बारे में क्या जानते हो?” “कुछ नहीं।”

“व्यापार जानते हो?” “नहीं।” “तो तुम्हें नौकरी क्यों दूँ?”

माधव ने कहा—“क्योंकि जो नहीं जानता, उसे सीख सकता हूँ। और जो काम देंगे, उसे पूरी ईमानदारी से करूँगा।” मालिक को उसका उत्तर अच्छा लगा। उसे बहुत छोटी नौकरी मिल गई।

पहले दिन उसका काम दुकान साफ करना, ग्राहकों को पानी देना और छोटे-मोटे सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना था। कुछ दिनों बाद उसका वही मित्र दुकान पर आया जिसने कभी कहा था कि सपने हैसियत देखकर देखने चाहिए। माधव को पानी का गिलास उठाए देखकर वह मुस्कराया।

“तो यह है तुम्हारा हीरों का व्यापार?” माधव को बुरा लगा। लेकिन उसने उत्तर नहीं दिया।

उसे साधु का मोती याद आया—धैर्य।

माधव ने दुकान को केवल नौकरी का स्थान नहीं, विद्यालय बना लिया। जब दूसरे कर्मचारी खाली समय में बातें करते, वह हीरों के बारे में पढ़ता। वह सीखता कि हीरे की गुणवत्ता कैसे पहचानी जाती है। कट, रंग, शुद्धता और वजन उसके मूल्य को कैसे प्रभावित करते हैं। कौन-सा पत्थर असली है और कौन-सा नकली। रात को घर लौटकर दिन भर सीखी बातों को लिखता। कई वर्ष बीत गए।

अब मालिक महत्वपूर्ण ग्राहकों के सामने माधव को बैठाने लगा था। एक दिन मालिक ने एक कीमती हीरा उसके सामने रखा। “बताओ, इसकी कीमत क्या होनी चाहिए?” माधव ने ध्यान से देखा और अपना अनुमान बताया। मालिक कुछ देर उसे देखता रहा।

“तुमने यह सब कहाँ सीखा?”

माधव ने मुस्कराकर कहा—“यहीं, आपकी दुकान पर।”

“मैंने तो तुम्हें कभी नहीं सिखाया।” “लेकिन मैंने सीखना कभी बंद नहीं किया।”

मालिक के चेहरे पर पहली बार उसके लिए सम्मान दिखाई दिया।

कुछ वर्षों बाद माधव ने अपनी बचत से छोटा-सा व्यापार शुरू किया। लेकिन सफलता उसके स्वागत के लिए दरवाजे पर खड़ी नहीं थी। पहले ही वर्ष उसे बड़ा नुकसान हुआ। उसकी लगभग पूरी बचत चली गई।

रात को वह अकेला बैठा था। मन कह रहा था—शायद मित्र सही कहता था। बड़े सपने मेरी हैसियत के नहीं थे। उसी क्षण उसे साधु की आवाज याद आई—“जब समय देने के बाद भी परिणाम न मिले, तब धैर्य के मोती को संभाल लेना।” अगली सुबह माधव फिर काम पर निकल पड़ा।

उसने अपनी असफलता का विश्लेषण किया। अपनी गलतियों को समझा। व्यापार का तरीका बदला और फिर शुरुआत की। इस बार वह पहले से अधिक समझदार था। धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ने लगे।

एक छोटी दुकान बड़ी हुई। फिर दूसरी शाखा खुली। दूसरे नगरों से व्यापारी उससे संपर्क करने लगे। वर्ष गुजरते गए। और एक दिन वही माधव देश के प्रतिष्ठित हीरा व्यापारियों में गिना जाने लगा।

बहुत वर्षों बाद माधव अपने नगर लौटा। उसने सबसे पहले उसी घाट पर जाने का निश्चय किया। सुबह का समय था। नदी आज भी उसी तरह बह रही थी। घंटियाँ बज रही थीं। नावें चल रही थीं। लोग आ-जा रहे थे। लेकिन घाट की अंतिम सीढ़ी खाली थी। माधव ने एक बूढ़े नाविक से पूछा—“यहाँ एक साधु बैठा करते थे। कहते थे—जो चाहोगे, वह पाओगे। कहाँ हैं वे?”

नाविक ने कुछ क्षण सोचा। “बहुत वर्ष हो गए बाबूजी। न जाने कहाँ चले गए।”

माधव धीरे-धीरे उसी सीढ़ी पर बैठ गया। उसने नदी को देखा। फिर अपनी दोनों हथेलियाँ सामने फैला दीं।

आज उसकी उँगलियों में महँगी अंगूठियाँ थीं। उसके पास करोड़ों के हीरे थे। बड़ी दुकानें थीं, प्रतिष्ठा थी। लेकिन उसे अचानक लगा कि उसके जीवन के सबसे कीमती रत्न इनमें से कोई नहीं था। उसने दाहिनी मुट्ठी बंद की। समय। फिर बाईं मुट्ठी बंद की। धैर्य। उसकी आँखें नम हो गईं।

वर्षों पहले एक साधु ने उसकी खाली हथेलियों में कुछ भी रखे बिना उसे संसार की सबसे बड़ी संपत्ति दे दी थी। माधव धीरे से बोला—“महाराज, उस दिन मैं हीरा माँगने आया था… आपने मुझे हीरे बनाने की शक्ति दे दी।”

नदी बहती रही। और उसकी लहरों के बीच जैसे बहुत दूर से वही आवाज सुनाई दी—“जो सच्चे मन से चाहोगे, वह पाओगे…”

जीवन-संदेश : सफलता किसी चमत्कार से नहीं मिलती। उसका निर्माण प्रतिदिन के उन छोटे-छोटे क्षणों में होता है जिन्हें हम अक्सर साधारण समझकर व्यर्थ जाने देते हैं।

समय हमें आगे बढ़ने का अवसर देता है और धैर्य हमें तब तक आगे बढ़ते रहने की शक्ति देता है, जब तक वह अवसर सफलता में परिवर्तित न हो जाए।

कई बार मेहनत का परिणाम देर से मिलता है। कई बार असफलता हमारे विश्वास की परीक्षा लेती है। ऐसे समय में लक्ष्य बदलने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाना चाहिए।

याद रखिए—समय से बड़ा कोई हीरा नहीं, धैर्य से बड़ा कोई मोती नहीं। जिसने दोनों का मूल्य समझ लिया, उसके लिए कोई सपना बहुत बड़ा नहीं।

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