ध्यानपरायणता
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मुकेश ‘नादान’
एक दिन गिरीश घोष और नरेंद्रनाथ एक वृक्ष के नीचे ध्यान करने बैठे, किंतु मच्छरों के उपद्रव के कारण गिरीश बाबू के लिए अपना चित्त स्थिर करना असंभव हो गया। काफी प्रवास करने के बावजूद विफल होकर उन्होंने अपनी आँखें खोल दीं। तब नरेंद्र की ओर देखने पर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने देखा कि नरेंद्र सुमेरू की भाँति निश्चल है, यद्यपि उसके शरीर पर इतने मच्छर बैठे थे कि लगता था कि उसका सारा शरीर मानो काले कंबल से ढका हो। यह देखकर गिरीश बाबू उन्हें बार-बार पुकारने लगे, किंतु कोई उत्तर नहीं पाया। अंत में उद्विग्न होकर जब उन्होंने नरेंद्र का आसन पकड़कर खींचा तब नरेंद्र की चेतना शून्य देह धरती पर गिर गई और बहुत देर बाद उन्हें होश आया।
यहाँ काशीपुर की एक अप्रिय घटना का उल्लेख करते हैं-घटना के महत्त्व के विवेचन के लिए नहीं, बल्कि उसके माध्यम से नरेंद्रनाथ के प्रति श्रीरामकृष्ण का जो विश्वास व्यक्त हुआ था, उसी को कहने के लिए। गृहस्थ भक्तगण आवश्यकता के अनुरूप धन देते और युवकवृंद उसे खर्च करते। खर्चे का हिसाब रखना उचित होगा, यह सोचकर रामबाबू, कालीपद बाबू और सुरेंद्रबाबू ने छोटे गोपाल को इस कार्य का भार दिया।
गोपाल के घर की स्थिति अच्छी नहीं थी। इसी से सुरेंद्र ने कहा, गोपाल के घर की व्यवस्था हम करेंगे, ताकि गोपाल काशीपुर में पूरे मनोयोग से श्रीरामकृष्ण की सेवा कर सके। रामबाबू आदि बीच-बीच में जमा-खर्च देखा करते। एक बार खर्च बहुत अधिक हुआ है, ऐसा सोचकर उन लोगों ने गोल-माल करने का आरोप लगा दिया।
स्थिति यहाँ तक पहुंच गई कि वाध्य होकर नरेंद्र ने श्रीरामकृष्ण से इसकी चर्चा की। तब श्रीरामकृष्ण ने नरेंद्र से कहा, "तू अपने कंधे पर लेकर मुझे जहाँ ले जाएगा, मैं वही रहूँगा।"
राम बाबू आदि के रुपए नहीं लिये जाएँगे, तो खर्च कैसे चलेगा-रामकृष्ण विभिन्न पंक्तियों की बात सोचने लगे। समाचार पाकर लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी रुपए लाकर रख गए, किंतु श्रीरामकृष्ण ने उन रुपयों को नहीं लिया। इसके बाद सोच-विचारकर गिरीश बाबू को बुलवाया। गिरीशचंद्र ने सब सुनकर यवेष्ट सामर्थ्य नहीं रहने पर भी श्रेष्ठ भक्त की भाँति कहा कि वे वासगत जमीन बेचकर भी काशीपुर का व्यय वहन करने को तैयार हैं।
उसी समय युवक भक्तों ने बहुत हिसाबी गृहस्थों के श्रीरामकृष्ण के कमरे में प्रवेश पर रोक लगा दी। अतः सुरेंद्र, राम आदि सभी रामकृष्ण के दर्शन से वंचित हो गए। अंत में श्रीरामकृष्ण की मध्यस्थता से इस विवाद का समाधान हुआ।
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