बेचारे पतिदेव
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श्री प्रसाद चौरसिया
सोचा था—आज तो रविवार है। न जल्दी उठना, न ऑफिस की भागदौड़। आराम से बिस्तर में पड़े-पड़े “बेड टी” का आनंद लूंगा… लेकिन आदत भी अजीब चीज़ है। आँख खुली तो घड़ी में छह बजे थे। मीता गहरी नींद में थी। मन हुआ उसे पास खींच लूँ… फिर सोचा—रोज़ तो बेचारी सबसे पहले उठ जाती है। आज सोने देता हूँ। थोड़ी देर बाद फिर नींद आ गई। जब दोबारा आँख खुली तो घड़ी आठ बजा चुकी थी। मीता अब भी करवट बदले सोई थी।
मैंने हिलाया—“मीता… उठो यार… चाय पिला दो…”
वो हल्के से कुनमुनाई। “आज नहीं उठ पाऊँगी… पूरे बदन में बहुत दर्द है… सिर भी फटा जा रहा है… आप तो आराम से सो रहे थे, मैं सारी रात नहीं सो पाई…”
मैं घबरा गया।
“अरे! दवाई ली?”
“हाँ… बस थोड़ी देर आराम कर लूँ… प्लीज़ आज चाय आप बना लो…”
मन तो बिल्कुल नहीं था। सोचा था—आज छुट्टी का मज़ा लूंगा। पर मीता की हालत देखकर चुपचाप उठ गया। चाय चढ़ाई… फ्रेश हुआ… दो कप लेकर कमरे में पहुँचा। मीता मुश्किल से उठकर बैठी।
“अब कैसी हो?”
“वैसी ही…”
थोड़ी देर बाद फिर आवाज़ आई—
“सुनिए…”
“हाँ?”
“आज सुमित्रा नहीं आएगी… आप थोड़ी सफ़ाई कर लीजिए न…”
मैंने माथा पकड़ा।
रविवार + छुट्टी + बाई गायब + बीमार पत्नी = मजदूरी पक्की।
लेकिन मीता की आवाज़ में सचमुच तकलीफ थी।
तुम फिक्र मत करो… मैं कर लूंगा सब।”
उस दिन पहली बार एहसास हुआ कि माँ ने बचपन में जो झाड़ू-पोंछा, बर्तन, सब्ज़ी काटना सिखाया था—वो आज काम आने वाला है। झाड़ू लगाया। सिंक के बर्तन साफ़ किए। ब्रेड-बटर बनाया।
फिर आवाज़ आई—“मेरे कपड़े बाथरूम में रख दो… नहा लूँ तो शायद अच्छा लगे…”
मैंने सहारा देकर बाथरूम तक पहुँचाया। खुद अखबार लेकर बैठा ही था कि फिर आवाज़—
“जरा सहारा देना…”
डॉक्टर ले चलने की बात की—मना कर दिया।
“कुछ देर में ठीक हो जाऊँगी…”
दोपहर के खाने की बारी आई। मूड बिल्कुल नहीं था। फ्रिज खोला—मटर, गोभी, गाजर। सोचा पुलाव बना लूँ। पर मीता बोली—
“पुलाव नहीं… मैं रोटी बना लूँगी…”
मैं झुंझला गया—“तुमसे उठा नहीं जा रहा, रोटी कैसे बनाओगी?”
आख़िरकार आलू-गोभी-मटर की सब्ज़ी और पराँठे बनाए। दही में तड़का लगाया—क्योंकि मीता को पसंद है। खाना खिलाया। बर्तन भी धो दिए। दोपहर दो बज गए। मैं थककर सो गया। शाम को दोस्त विजय का फोन आया—
“चल पार्टी करते हैं!”
“नहीं यार, मीता की तबीयत खराब है…”
वो आने को तैयार। मैंने मीता की तरफ देखा—उसने इशारे से मना कर दिया। सच कहूँ तो मुझे भी राहत मिली। शाम की चाय बनाई। फिर रात के खाने की तैयारी की सोच रहा था कि मीता बोली—
“दवाई खत्म हो गई… ले आओ… और कल की सब्ज़ी भी…”
मैं बाजार निकल गया। दवाई की दुकान पर विजय और ज्योति मिल गए।
“क्या हुआ भाभी को?”
“आज उठ ही नहीं पाई…”
वो दोनों साथ चल पड़े। घर पहुँचे—तो अंधेरा। जबकि मैं सारी लाइटें जला कर गया था। दिल धक-धक करने लगा। दरवाज़ा खोला—
“मीता… मीता…”
और फिर…
मैं ठिठक गया।
मेरे सामने वही रूप खड़ा था, जिससे मैं पहली बार प्यार में पड़ा था। हल्की गुलाबी साड़ी। खुले घुंघराले बाल। माथे पर बड़ी सी बिंदी। चेहरे पर शरारती मुस्कान। विजय और ज्योति पीछे खड़े थे—रहस्यमय मुस्कान लिए।
मीता खिलखिलाई—“क्यों विजय भाई? हार गए न शर्त? आपके दोस्त से आज मजदूरी करवा ही ली… मजदूर दिवस पर!”
मैं स्तब्ध। विजय ने राज खोला—“यार अमित, हमने शर्त लगाई थी कि आज भाभी तुझसे घर का सारा काम करवा दें तो मानेंगे। जबसे शादी हुई है तू पूरा आलसी हो गया है!”
“सुमित्रा को छुट्टी दी गई थी। प्लान पूरा था। और तू… पूरे दिन परफेक्ट मजदूर बना रहा!”
तीनों हँस पड़े। मैं पहले तो झेंपा… फिर खुद भी हँस पड़ा।
सच में…
आज पहली बार समझ आया— घर का काम “काम” नहीं, जिम्मेदारी है। और मीता रोज़ ये सब बिना शिकायत करती है। खाना बाहर से आया था। हम चारों ने साथ बैठकर खाया। जाते-जाते विजय बोला—“और हाँ… रात के बर्तन मत भूलना!”
मैं हँस पड़ा। दरवाज़ा बंद किया। मीता की तरफ बढ़ा।
“क्यों मेमसाब… मजदूरी तो करवा ली आपने… अब मजदूरी आप देंगी या मैं खुद ले लूँ?”
मीता शरमाकर मेरी बाँहों में सिमट गई।
उस रात मुझे समझ आया—पति बेचारा नहीं होता…
बस कभी-कभी उसे याद दिलाना पड़ता है कि घर सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं, साझेदारी है।
और हाँ—
मजदूर दिवस की असली बधाई उसी को मिलनी चाहिए, जो रोज़ बिना वेतन, बिना छुट्टी, बिना शिकायत घर को “घर” बनाए रखता है।
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