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बेशकीमती दौलत

  • 1 day ago
  • 3 min read

डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव

“अजी सुनते हो… आज आपसे एक बात पूछूँ?”

साँझ की सुनहरी चादर धीरे-धीरे कमरे में उतर रही थी। खिड़की से आती धूप की आख़िरी किरणें 80 वर्षीया वृद्धा के झुर्रियों भरे, शांत चेहरे पर ठहर-सी गई थीं - मानो बीते वर्षों की कहानी पढ़ रही हों। सामने 84 वर्षीय उनके जीवनसाथी, काँपते कदमों और छड़ी के सहारे चलते हुए, मुस्कुराते हुए उनके पास आकर बैठ गए।

“कहो भाग्यवान… आज आवाज़ में इतना संकोच क्यों है?” उन्होंने स्नेह से पूछा।

वृद्धा ने काँपते हाथों से एक पुराना, पीला पड़ चुका कागज़ उनकी ओर बढ़ाया। कागज़ जैसे समय की तहों से निकलकर आया था। उसकी आवाज़ भी उसी कागज़ की तरह थरथरा रही थी -

“आपको याद है… शादी से पहले आपने अपनी माताजी को एक खत लिखा था? उसमें आपने लिखा था कि आप मुझसे शादी नहीं करना चाहते… क्योंकि आपको मेरा चेहरा पसंद नहीं था।”

वृद्ध के चेहरे पर आश्चर्य की लहर दौड़ गई।

“वो खत? अरे… वो तो जैसे किसी और जन्म की बात है! तुम्हें कहाँ मिला?”

वृद्धा की आँखें भर आईं -

“कल पुराने बक्से को साफ करते समय मिला। मुझे तो कभी पता ही नहीं था कि यह शादी आपकी इच्छा के विरुद्ध हुई थी… अगर तब जानती, तो शायद खुद ही पीछे हट जाती।”

कमरे में अचानक गहरा सन्नाटा छा गया। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक अब साफ सुनाई दे रही थी - जैसे हर सेकंड उन साठ वर्षों की परतें खोल रहा हो। वृद्ध ने धीरे से मुस्कुराते हुए अपना सिर पत्नी की गोद में रख दिया।

“अरे पगली,” उन्होंने बेहद कोमल स्वर में कहा, “जब वो खत लिखा था, तब मैं सिर्फ 12 साल का था।”

पत्नी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा - आँखों में आँसू भी थे और हल्की मुस्कान भी।

“मुझे लगा था,” वे हँसते हुए बोले, “कि तू शादी करके आएगी तो मेरे कमरे में मेरे साथ सोएगी… मेरे बिस्तर पर, मेरे तकिए पर। मेरे खिलौनों से खेलेगी और मेरी गुल्लक के पैसे चुरा लेगी। मुझे डर था कि मेरा बचपन कोई मुझसे छीन लेगा।”

उन्होंने एक गहरी साँस ली, जैसे दिल के सबसे कोमल हिस्से से शब्द निकाल रहे हों -

“पर मैं कहाँ जानता था कि तू मेरे जीवन में आकर सिर्फ कमरे में नहीं, मेरे दिल में घर बना लेगी। मैं कहाँ जानता था कि कपड़े के खिलौनों से कहीं ज्यादा प्यारे खिलौने - हमारे बच्चे - तू मुझे देगी। मैं कहाँ जानता था कि मेरी चिल्लर से भरी गुल्लक के बदले तू मुझे प्यार की ऐसी अनमोल दौलत देगी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता… और जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है।”

वृद्धा की आँखों से आँसू मोतियों की तरह ढलक पड़े, मगर इस बार उनमें पीड़ा नहीं, गहरा संतोष था। धीमे से मुस्कुराते हुए बोली -

“भगवान का लाख-लाख शुक्र है… मैं तो सोच रही थी कि शायद आपको उस पड़ोस वाली से प्रेम था।”

वृद्ध ठहाका लगाकर हँस पड़े -

“अरे रहने दो! कहाँ वो… और कहाँ मेरी ये रानी।”

दोनों की भीगी पलकों ने एक-दूसरे को देखा - जैसे साठ वर्षों का साथ उन नजरों में सिमट आया हो। कितनी तकरारें, कितनी नोकझोंक, कितनी अधूरी इच्छाएँ और अनगिनत साझा हँसी - सब आज एक गहरी शांति में बदल चुका था। जीवन की साँझ थी, अंतिम पड़ाव शायद दूर नहीं था… मगर साथ था, और वही सबसे बड़ी राहत थी।

पति-पत्नी का रिश्ता खून से नहीं, दिल से बनता है।

यह रिश्ता सिर्फ प्रेम का नहीं, धैर्य और त्याग का भी होता है।

यह रिश्ता केवल जवानी की चंचल हँसी का नहीं, बुढ़ापे में एक-दूसरे की लाठी बनने का होता है।

याद रखिए—

“उम्र भर का पसीना उसकी गोद में सूख जाएगा,

हमसफ़र क्या होता है - ये बुढ़ापे में समझ आएगा।”

इसलिए यदि आपका जीवनसाथी आज आपके पास है, तो उसका सम्मान कीजिए, उसकी भावनाओं को समझिए, और इस अनमोल रिश्ते को सहेजकर रखिए। क्योंकि सच्चा प्रेम वही है, जो समय की हर आँधी में अडिग खड़ा रहे - और अंत में यही सिद्ध करे कि दुनिया की सबसे बेशकीमती दौलत, प्यार है।

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