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मुस्कान के उस पार

13 hours ago
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दीपा शर्मा

पटना के पुराने मोहल्लों की अपनी एक अलग दुनिया है। वहाँ घर केवल ईंट और पत्थरों से नहीं बने होते, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी स्मृतियों, रिश्तों और अनकही कहानियों से भी बने होते हैं। संकरी गलियाँ, एक-दूसरे से सटी दीवारें और कुछ ही फुट की दूरी पर बनी छतें—जहाँ पड़ोसियों की बातचीत के साथ कभी-कभी दिलों की धड़कनें भी एक-दूसरे तक पहुँच जाती हैं।

शादी के कई वर्षों बाद मैं अपने मायके आई थी। मेरा मायका पटना के ऐसे ही एक पुराने मोहल्ले में था। यहाँ की छह-सात फुट चौड़ी गलियाँ आज भी लगभग वैसी ही थीं। घरों की दीवारें एक-दूसरे से सटी हुई थीं और छतों के बीच मुश्किल से तीन-चार फुट का फासला था।

मेरे पति संकल्प मुझे मायके छोड़कर विदेश दौरे पर चले गए थे। उनके काम के सिलसिले में वर्ष में दो-तीन बार विदेश यात्राएँ होती रहती थीं। इस बार भी उनका कार्यक्रम पहले से निर्धारित था। उस शाम मैं माँ के साथ छत पर बैठी थी। सूरज धीरे-धीरे पश्चिम की ओर ढल रहा था। आसमान में हल्की सुनहरी आभा फैल रही थी। आसपास की छतों पर बच्चे खेल रहे थे और कहीं-कहीं महिलाएँ सूखते कपड़े समेट रही थीं। अचानक मेरी नजर सामने वाली छत पर पड़ी। वही पुरानी छत! वही छोटी-सी रेलिंग! और उसके पीछे बना वह कमरा, जिसकी खिड़की कभी मेरे बचपन की अनगिनत स्मृतियों का हिस्सा हुआ करती थी।

न जाने क्यों मेरे मन में अचानक अविनाश का नाम कौंध गया। अविनाश मुझसे लगभग चार-पाँच वर्ष बड़ा था। वह भी मेरे ही स्कूल में पढ़ता था और पढ़ाई के लिए पटना आकर हमारे पड़ोस के मकान में किराए पर रहता था। मैंने माँ से उसके बारे में पूछा। माँ ने बताया कि मेरी शादी से कुछ दिन पहले ही वह मकान छोड़कर चला गया था। उसके बाद वह कहाँ गया और क्या कर रहा है, इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। माँ का उत्तर सुनकर मैं चुप हो गई।

लेकिन मन अचानक बहुत पीछे लौट गया था। मैं चाय बनाने रसोई में चली गई। पानी चढ़ाया, चायपत्ती डाली और कप निकाले, लेकिन ध्यान कहीं और था। चाय छानते समय आधी कप में गिरी और आधी बाहर छलक गई। मैं स्वयं पर मुस्करा दी। कितना विचित्र होता है स्मृतियों का संसार!

कभी-कभी वर्षों से भुलाया हुआ कोई चेहरा अचानक सामने आ खड़ा होता है और मन वर्तमान की सारी व्यस्तताओं को छोड़कर अतीत की गलियों में भटकने लगता है। चाय लेकर जब मैं वापस छत पर पहुँची, तब माँ पड़ोस वाली आंटी से बातचीत कर रही थीं। दोनों के बीच केवल तीन फुट का फासला था।

मैंने अपनी चाय आंटी को दे दी और स्वयं छत के दूसरे कोने में जाकर खड़ी हो गई। अँधेरा धीरे-धीरे गहराने लगा था। तभी बिजली चली गई। मोहल्ले के बच्चे शोर मचाते हुए घरों से बाहर निकल आए। कुछ छतों पर चढ़ गए और कुछ गलियों में खेलने लगे। मैंने सामने वाली छत की ओर देखा। और अचानक मुझे लगा जैसे समय ने वर्षों पुरानी एक खिड़की खोल दी हो।

उन दिनों मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। बचपन धीरे-धीरे किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा था। मन में अनगिनत जिज्ञासाएँ जन्म ले रही थीं, लेकिन उन्हें समझने और व्यक्त करने की परिपक्वता अभी नहीं आई थी। मैं अक्सर शाम को कपड़े सुखाने या उतारने के लिए छत पर जाया करती थी। अविनाश भी प्रायः उसी समय अपनी छत पर दिखाई देता था।

पहले-पहल मैंने उसकी उपस्थिति पर विशेष ध्यान नहीं दिया। लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि जब भी मैं छत पर आती, वह मेरी ओर देखकर मुस्करा देता। कभी हल्के से हाथ हिला देता। कभी केवल रेलिंग के पास खड़ा होकर मेरी ओर देखता रहता। मैं उसकी ओर सीधे देखने से बचती, लेकिन यह भी सच था कि यदि किसी दिन वह छत पर दिखाई नहीं देता, तो मेरी नजर अनायास उसी ओर चली जाती। शायद किशोर मन की यही सबसे बड़ी विशेषता है।

वह जिन भावनाओं को नाम नहीं दे पाता, उन्हें भी चुपचाप अनुभव करने लगता है। एक शाम अचानक बिजली चली गई थी। चारों ओर हल्का अँधेरा फैलने लगा था। मैं छत पर अकेली खड़ी थी। तभी अविनाश ने पास आकर मेरी ओर एक छोटी-सी पर्ची बढ़ा दी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, वह मुस्कराता हुआ अपनी छत की ओर लौट गया। मैं घबरा गई।

पर्ची को जल्दी से अपने कुरते में छिपा लिया। उस समय मेरे भीतर डर और उत्सुकता दोनों थे। डर इस बात का कि कहीं घर में किसी को पता न चल जाए, और उत्सुकता इस बात की कि आखिर उसने लिखा क्या है। कुछ देर बाद कमरे में अकेले जाकर मैंने पर्ची खोली। उसमें लिखा था—“दीपा, तुम मुस्कराती हो तो बहुत सुंदर लगती हो। तुम्हारी मुस्कान देखकर मुझे खुशी होती है।” मैंने वह पर्ची कई बार पढ़ी। उसमें प्रेम का कोई बड़ा वादा नहीं था। न साथ जीने-मरने की कसमें थीं और न भविष्य के सुनहरे सपने। केवल मेरी मुस्कान की प्रशंसा थी। लेकिन उस उम्र में इतने-से शब्द भी मन में एक अनजानी हलचल पैदा करने के लिए पर्याप्त थे। मैंने पर्ची संभालकर रख ली।

उसके बाद जब भी छत पर जाती, अविनाश की मुस्कान मुझे पहले से कुछ अलग लगती। कभी-कभी मैं भी अनायास मुस्करा देती। लेकिन हमारी यह कहानी शब्दों से अधिक मौन में आगे बढ़ रही थी।

कुछ समय बाद मेरी बड़ी बहन की शादी तय हो गई। घर में उत्सव का वातावरण था। रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हो गया था। गीत-संगीत, हँसी-मजाक और विवाह की तैयारियों के बीच दिन कब बीत जाते, पता ही नहीं चलता था। मेहंदी की रस्म वाले दिन मैंने भी अपने दोनों हाथों में सुंदर मेहंदी लगवाई। शाम को मेहंदी सुखाने के लिए छत पर चली गई। अविनाश अपनी छत पर खड़ा था। मुझे देखते ही उसने हमेशा की तरह मुस्कराकर हाथ हिलाया। न जाने उस दिन मुझे क्या सूझा कि मैंने भी अपने दोनों मेहंदी लगे हाथ हवा में उठा दिए। मेरी इस हरकत पर उसके चेहरे की मुस्कान और गहरी हो गई।

उसने इशारे से मुझे रेलिंग के पास बुलाया। मैं कुछ संकोच के साथ आगे बढ़ी। छतों के बीच बहुत कम दूरी थी। अविनाश ने अचानक मेरे मेहंदी लगे हाथों को अपने हाथों में लेकर चूम लिया। मैं घबराकर पीछे हट गई। मेरे गाल गर्म हो उठे थे। उस क्षण मैं समझ नहीं पाई कि मुझे नाराज होना चाहिए, शर्माना चाहिए या वहाँ से भाग जाना चाहिए। मैं जल्दी से नीचे उतर आई। लेकिन उस शाम की स्मृति मेरे मन में कहीं गहरे उतर गई। उसके बाद भी अविनाश कभी-कभी किसी बहाने छोटी-छोटी पर्चियाँ भेज देता। अधिकांश पर्चियों में लगभग एक ही भाव होता—“दीपा, यूँ ही मुस्कराती रहना।”

मुझे उसकी बातें अच्छी लगती थीं, लेकिन मैंने कभी उत्तर नहीं दिया। न उससे अपने मन की बात कही और न ही उसके मन की बात जानने का साहस किया। शायद हम दोनों ही उस उम्र में थे जहाँ भावनाएँ तो जन्म ले चुकी थीं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का साहस अभी नहीं आया था। समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा।

बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने कॉलेज में प्रवेश लिया। मैं आगे पढ़ना चाहती थी। अपने लिए कुछ करना चाहती थी और जीवन को थोड़ा और समझना चाहती थी। लेकिन इसी बीच दीदी ने अपनी ससुराल की ओर से मेरे लिए एक अच्छा विवाह प्रस्ताव भेज दिया। घर में सभी प्रसन्न थे। लड़का पढ़ा-लिखा था, अच्छी नौकरी करता था और परिवार भी सम्मानित था। माँ-पापा को लगा कि इतना अच्छा रिश्ता फिर मिले या न मिले।

मेरी आगे पढ़ने की इच्छा को यह कहकर शांत कर दिया गया कि विवाह के बाद भी पढ़ाई जारी रखी जा सकती है। धीरे-धीरे विवाह की तैयारियाँ शुरू हो गईं। एक दिन मोहल्ले का एक छोटा बच्चा मेरे पास एक पर्ची लेकर आया। लिखावट पहचानने में मुझे तनिक भी देर नहीं लगी। वह अविनाश की पर्ची थी। उसमें मेरी शादी की बधाई दी गई थी। साथ ही यह कामना भी थी कि मैं ससुराल में हमेशा मुस्कराती रहूँ। अंत में उसने लिखा था कि शायद उसे मेरी शादी के मेहंदी लगे हाथ देखने का अवसर नहीं मिलेगा और इस बात का उसे अफसोस रहेगा।

पर्ची पढ़ते हुए मेरे भीतर एक अजीब-सी उदासी उतर आई। वह क्या कहना चाहता था? क्या वह मुझे सचमुच चाहता था? और यदि चाहता था, तो उसने कभी स्पष्ट रूप से कहा क्यों नहीं? लेकिन अब इन प्रश्नों का कोई अर्थ नहीं रह गया था। मेरी शादी तय हो चुकी थी। कुछ ही दिनों बाद मैं विवाह करके इंदौर चली गई। और अविनाश?

वह मेरे जीवन की एक ऐसी स्मृति बन गया जिसे मैंने कभी मिटाने का प्रयास नहीं किया, लेकिन जिसे अपने वर्तमान पर हावी भी नहीं होने दिया।

मेरे पति संकल्प एक अच्छे और जिम्मेदार व्यक्ति हैं। वह अपने काम के प्रति अत्यंत समर्पित रहते हैं। उनका अधिकांश समय कार्यालय, यात्राओं और व्यावसायिक जिम्मेदारियों में बीतता है। खाली समय में क्रिकेट उनका सबसे प्रिय साथी होता है। कभी टीवी पर मैच देखते रहते हैं तो कभी स्वयं बल्ला उठाकर अपने क्रिकेट क्लब चले जाते हैं। हमारे वैवाहिक जीवन में कोई बड़ी समस्या नहीं थी। संकल्प अपने ढंग से मेरा ध्यान रखते थे और मैं भी उनकी व्यस्तताओं को समझती थी।

लेकिन जीवन में कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो किसी शिकायत या अभाव से नहीं जुड़ी होतीं। वे बस हमारे भीतर सुरक्षित रहती हैं। अविनाश की स्मृति भी मेरे लिए कुछ ऐसी ही थी। वर्षों तक मैंने उसके बारे में न किसी से पूछा और न ही उसे खोजने का प्रयास किया। फिर भी कभी-कभी किसी अनजान क्षण में उसकी लिखी पर्ची के शब्द याद आ जाते—यूँ ही मुस्कराती रहना।

माँ की आवाज से मेरा ध्यान टूटा। उन्होंने बताया कि अगले दिन पड़ोस के प्रदीप अंकल की बेटी मोहिनी की मेहंदी की रस्म है। मोहिनी मेरे ही स्कूल में पढ़ती थी और मुझसे दो कक्षाएँ छोटी थी। उसने विशेष रूप से मुझे बुलाया था। अगली शाम मैं माँ के साथ उसके घर पहुँची। चारों ओर उत्सव का वातावरण था। महिलाएँ गीत गा रही थीं। लड़कियाँ नाच रही थीं। मेहंदी लगाने वाली महिलाओं के आसपास भीड़ लगी थी। मैंने भी अपने दोनों हाथों में कुहनियों तक मेहंदी लगवाई। कुछ देर तक संगीत और हँसी-मजाक में शामिल रही, लेकिन तेज आवाज में बजता संगीत मुझे थकाने लगा। इसी बीच बिजली चली गई।

हालाँकि वहाँ जनरेटर चल पड़ा था, फिर भी मैंने घर लौटना उचित समझा। घर आकर मैं सीधे छत पर चली गई। हवा में हल्की ठंडक थी। मैंने अपने मेहंदी लगे हाथों को देखा। और अचानक वर्षों पुराना वह दृश्य मेरी आँखों के सामने जीवित हो उठा। दीदी की शादी। मेहंदी की रस्म। सामने वाली छत। और अविनाश की मुस्कान। न जाने किस भाव में डूबकर मैंने अपने दोनों हाथ हवा में उठा दिए।

मानो सामने वाली छत पर आज भी कोई खड़ा हो और मेरी ओर देखकर मुस्करा रहा हो। तभी पड़ोस वाली आंटी ने मुझे देख लिया। वह समझीं कि मैं उन्हें अपने मेहंदी लगे हाथ दिखा रही हूँ। उन्होंने मुझे रेलिंग के पास बुलाया और मेहंदी की प्रशंसा करने लगीं। मेहंदी का रंग गहरा चढ़ा था। आंटी ने मुस्कराते हुए कहा कि इतना गहरा रंग तो पति के गहरे प्रेम का संकेत माना जाता है। मैं शरमा गई। लेकिन मन के किसी कोने में एक पुरानी मुस्कान फिर से जाग उठी थी।

उस रात मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी। अचानक सोशल मीडिया पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट दिखाई दी। नाम पढ़ते ही मैं चौंक गई। अविनाश। कुछ क्षण तक मैं स्क्रीन को देखती रही। क्या यह वही अविनाश था? प्रोफाइल खोली तो संदेह समाप्त हो गया। चेहरे पर उम्र की परिपक्वता आ गई थी, लेकिन मुस्कान वही थी। मैंने बिना देर किए उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। कुछ ही देर बाद उसका संदेश आया। उसने मेरा हाल पूछा और फिर अपनी पुरानी आदत के अनुसार मेरी मुस्कान के बारे में जानना चाहा।

उसने संकल्प का नाम भी लिया। मैं आश्चर्यचकित रह गई। अविनाश मेरे पति को कैसे जानता था? बातचीत आगे बढ़ी तो एक अप्रत्याशित संयोग सामने आया। अविनाश अब दुबई के एक स्कूल में शिक्षक था। संकल्प अपने काम के सिलसिले में उसी स्कूल में कंप्यूटर और वाई-फाई सिस्टम लगाने गए थे। बातों-बातों में दोनों के बीच परिचय हुआ और संकल्प को जब पता चला कि अविनाश पटना का रहने वाला है, तो बातचीत मेरे मायके तक पहुँच गई। इसी दौरान अविनाश को पता चला कि मैं संकल्प की पत्नी हूँ। संकल्प ने ही उसे मेरा संपर्क नंबर दिया था।

यह जानकर मैं देर तक मुस्कराती रही। कितना विचित्र संयोग था! जिस व्यक्ति से वर्षों पहले केवल कुछ फुट की दूरी पर रहते हुए भी खुलकर बात नहीं कर पाई थी, वह आज हजारों किलोमीटर दूर बैठा मुझसे सहजता से बातचीत कर रहा था। मैंने उसके परिवार के बारे में पूछा। पता चला कि उसने अब तक विवाह नहीं किया था। वह अब विवाह करने का विचार कर रहा था। मैंने कारण जानना चाहा तो उसने बात को हल्के ढंग से टाल दिया। लेकिन उसके अगले शब्दों ने मुझे कुछ क्षण के लिए मौन कर दिया। वह एक बार फिर मेरी मुस्कान देखना चाहता था। शायद यही उसकी वर्षों पुरानी एक छोटी-सी अधूरी इच्छा थी।

बातचीत के दौरान मैंने उसे बताया कि आज पड़ोस में मोहिनी की मेहंदी की रस्म थी। यह सुनते ही उसे जैसे कुछ याद आ गया। उसने अनुमान लगाया कि मैंने भी अपने हाथों में मेहंदी लगवाई होगी। मेरे स्वीकार करने पर उसने वीडियो कॉल करने का अनुरोध किया। वह मेरे मेहंदी लगे हाथ देखना चाहता था। मेरी शादी के समय वह उन्हें नहीं देख सका था। मैं कुछ क्षण चुप रही। फिर वीडियो कॉल स्वीकार कर ली। स्क्रीन पर अविनाश का चेहरा उभरा। मैंने अपने दोनों हाथ कैमरे के सामने कर दिए।

मेहंदी का गहरा रंग और सुंदर आकृतियाँ देखकर उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान फैल गई। कुछ देर तक वह मेरे हाथों को देखता रहा। फिर उसने मेरी मुस्कान देखने की इच्छा व्यक्त की। मैं हँस पड़ी। वर्षों बीत गए थे। हम दोनों का जीवन बदल गया था। लेकिन उसकी एक आदत आज भी नहीं बदली थी। मेरी मुस्कान उसके लिए अब भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण थी।

मैंने हँसते हुए उससे पूछा कि आखिर वह बार-बार मेरी मुस्कान की ही बात क्यों करता है। उसका उत्तर बहुत सरल था। उसके अनुसार मुस्कान एक ऐसी भाषा है जिसे संसार का हर व्यक्ति समझ सकता है। इसके लिए न किसी अनुवाद की आवश्यकता होती है और न किसी विशेष परिचय की।

वह चाहता था कि पूरी दुनिया मुस्कराती रहे। और उस दुनिया में दीपा भी। उसकी बात सुनकर मैं फिर हँस पड़ी। वह भी मुस्करा दिया। शायद वर्षों से मन में सँजोई उसकी एक छोटी-सी इच्छा पूरी हो गई थी। और शायद मेरी भी।

उस रात हमारी बातचीत बहुत देर तक चली। मैंने उसे विवाह करने की सलाह दी और उसकी शादी में बुलाने की बात भी कही। उसने हँसते हुए आश्वासन दिया कि अब मेरा पता मिल गया है, इसलिए निमंत्रण अवश्य भेजेगा। फिर उसने चुटकी ली कि विवाह के बाद मैं बोलना तो सीख गई हूँ, क्योंकि स्कूल के दिनों में मैंने उससे कभी ठीक से बातचीत तक नहीं की थी।

उसकी बात सुनकर मुझे भी अपने बचपन की झिझक याद आ गई। कितनी बातें थीं जो हम कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। कितने प्रश्न थे जो पूछना चाहते थे, लेकिन पूछ नहीं सके। और कितने उत्तर थे जो शायद कभी दिए ही नहीं जा सकते थे। फिर भी मुझे उस रात किसी अधूरेपन का बोझ महसूस नहीं हो रहा था। इसके विपरीत, मन में एक अजीब-सी शांति थी।

अविनाश अपने जीवन में आगे बढ़ चुका था और मैं अपने जीवन में। हमारे बीच अब कोई दावा नहीं था, कोई अपेक्षा नहीं थी और न ही अतीत को फिर से जीने की इच्छा। बस एक पुरानी स्मृति थी, जो वर्षों बाद अचानक मुस्कराकर सामने आ गई थी। तभी बिजली फिर चली गई। इंटरनेट का संपर्क टूट गया। स्क्रीन पर अविनाश का चेहरा गायब हो गया। मैं कुछ देर तक खाली स्क्रीन देखती रही। फिर लैपटॉप बंद कर दिया।

कमरे की खिड़की से बाहर देखा तो सामने वाली छत अँधेरे में डूबी हुई थी। वही छत जहाँ कभी एक किशोर लड़का मेरी प्रतीक्षा किया करता था। वही छत जहाँ से कभी छोटी-छोटी पर्चियाँ मेरे हाथों तक पहुँची थीं। और वही छत जहाँ एक दिन उसने मेरे मेहंदी लगे हाथों को चूम लिया था। आज उस छत पर कोई नहीं था। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगा कि वहाँ कुछ खो गया है। कुछ स्मृतियाँ अनुपस्थिति में भी हमारे भीतर जीवित रहती हैं। वे लौटकर हमारा वर्तमान बदलने नहीं आतीं।

वे केवल यह याद दिलाने आती हैं कि जीवन के किसी मोड़ पर किसी ने हमें बहुत स्नेह से देखा था। मैंने अपने मेहंदी लगे हाथों को एक बार फिर देखा। फिर अनायास मुस्करा दी। आज मुझे समझ में आ रहा था कि अविनाश ने कभी मुझसे कुछ माँगा ही नहीं था। न कोई वादा। न कोई अधिकार। न कोई संबंध। उसकी इच्छा केवल इतनी थी कि मैं मुस्कराती रहूँ।

शायद वह मुझे कितना चाहता था, यह मैं आज भी पूरी तरह नहीं जानती। लेकिन इतना अवश्य समझ गई थी कि मेरी मुस्कान उसके जीवन की एक प्रिय स्मृति रही थी। मैंने मोबाइल उठाकर संकल्प का संदेश देखा। उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच मेरा हाल पूछा था और बताया था कि अगले दिन उनकी एक महत्त्वपूर्ण बैठक है। मैंने उन्हें उत्तर दिया और कुछ देर उनसे बातचीत की। फिर खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई।

बाहर बिजली लौट आई थी। एक-एक करके मोहल्ले के घरों में रोशनी जलने लगी। सामने वाली छत भी उजाले में नहा गई। मैंने महसूस किया कि जीवन में कुछ रिश्ते साथ चलते हैं, कुछ पीछे छूट जाते हैं और कुछ केवल स्मृतियों में अपना स्थान बना लेते हैं। हर संबंध को किसी मंजिल तक पहुँचना आवश्यक नहीं होता। कुछ संबंध केवल इसलिए हमारे जीवन में आते हैं कि वे हमें स्वयं के किसी सुंदर पक्ष से परिचित करा सकें।

अविनाश ने मुझे मेरी मुस्कान से परिचित कराया था। और आज इतने वर्षों बाद उसने मुझे फिर याद दिलाया था कि जीवन चाहे जितना बदल जाए, मुस्कराने की वजहें कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए। मैंने खिड़की बंद की और कमरे की ओर लौट आई। मन में कोई शिकायत नहीं थी। कोई पछतावा भी नहीं। बस एक मधुर स्मृति थी। और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।

जीवन-संदेश : जीवन में हर चाहत का पूरा होना आवश्यक नहीं है और हर स्नेह का किसी निश्चित संबंध में बदलना भी जरूरी नहीं होता। कुछ भावनाएँ अपनी निष्कपटता के कारण ही सुंदर होती हैं।

समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं, लोग अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ जाते हैं और जीवन नई जिम्मेदारियों से भर जाता है। लेकिन किसी की कही हुई एक स्नेहपूर्ण बात, किसी की सहज मुस्कान या कोई छोटी-सी स्मृति वर्षों बाद भी हमारे मन को प्रसन्न कर सकती है।

अतीत की सुंदर स्मृतियों का सम्मान करते हुए वर्तमान के रिश्तों को सहेजना ही जीवन की परिपक्वता है। मुस्कान केवल चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि हृदय की वह भाषा है जो बिना शब्दों के भी स्नेह व्यक्त कर देती है। इसलिए जीवन की व्यस्तताओं, कठिनाइयों और बदलती परिस्थितियों के बीच अपनी मुस्कान को जीवित रखिए। क्योंकि कभी-कभी हमारी एक छोटी-सी मुस्कान किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन की सबसे सुंदर स्मृति बन जाती है।

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