सोचा न था
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मधु मधुमन
ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा
मेरा हर ख़्वाब ग़मो-यास में लिपटा होगा
सह्म जाते थे कभी देख के जिन राहों को
क्या ख़बर थी कि कभी उनपे ही चलना होगा
मुख़्लिसी प्यार वफ़ा सब हुए ग़ायब जग से
इससे बढ़कर भी बुरा और भला क्या होगा
ये जो हर बात पे हम अश्क बहा देते हैं
आसमाँ से वो हमें देख के हँसता होगा
बारहा दिल में मेरे इक ये सवाल उठता है
क्या कोई सच में फ़लक पार भी रहता होगा
ज़िंदगी है तो ज़बर ज़ेर भी होंगे इसमें
इस हक़ीक़त को तो स्वीकार ही करना होगा
दिल को देते हैं तसल्ली यही कह कर अक्सर
जो भी होगा वो तेरे वास्ते अच्छा होगा
मकतबे-ज़ीस्त ने हमको ये सिखाया है सबक़
वक़्त जिस हाल में रक्खे हमें रहना होगा
दिल में उट्ठी है मेरे लहर कोई फिर “मधुमन “
शेर शायद कोई आने को मचलता होगा
ग़मो-यास - दुख और निराशा
मुख़्लिसी-सच्ची मित्रता
मकतबे-ज़ीस्त -ज़िन्दगी का स्कूल
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