सम्मान का अर्थ
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
विश्वविद्यालय का विशाल स्वागत-कक्ष रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा था। छत से लटकते झूमरों की सुनहरी चमक, फूलों से सजे मंच और धीमे स्वर में बजते संगीत ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया था। शहर के प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, अधिकारी और उनके परिवार समारोह में शामिल होने आए थे।
प्रज्ञा को स्वागत-कक्ष की एक कुर्सी पर बैठाकर नितिन किसी आवश्यक व्यवस्था के लिए चले गए थे। जाते-जाते उन्होंने केवल इतना कहा था—“तुम यहीं बैठो, मैं अभी लौटता हूं।” लेकिन काफी समय बीत जाने पर भी वे दिखाई नहीं दिए।
प्रज्ञा चुपचाप आसपास का वातावरण देख रही थी। सभागार में घूमती आत्मविश्वास से भरी महिलाएं आधुनिक परिधानों, आकर्षक आभूषणों और सधे हुए व्यक्तित्व में अलग ही चमक रही थीं। कोई विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका थी, कोई बड़ी कंपनी में अधिकारी और कोई सामाजिक संस्था की संचालिका। उन्हें देखकर प्रज्ञा अनायास ही अपने साधारण व्यक्तित्व से उनकी तुलना करने लगी।
आज वर्षों बाद उसने स्वयं को थोड़ा समय देकर तैयार किया था। नीली शिफॉन की साड़ी, मोतियों की हल्की माला और उसी रंग की चूड़ियां उसके सौम्य व्यक्तित्व पर खूब जंच रही थीं। घर से निकलने से पहले जब वह दर्पण के सामने खड़ी हुई थी, तब उसे अपना ही प्रतिबिंब कुछ नया-सा लगा था।


