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सोच की उड़ान

17 hours ago
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डॉ. कृष्णकांत श्रीवास्तव

सर्दियों की एक हल्की धूप वाली सुबह थी। रेलवे स्टेशन यात्रियों की चहल-पहल से भरा हुआ था। कहीं कुलियों की आवाजें गूँज रही थीं, कहीं चाय और नाश्ते वाले यात्रियों को पुकार रहे थे, तो कहीं अपने प्रियजनों को विदा करने आए लोगों की आँखों में स्नेह और चिंता साथ-साथ दिखाई दे रही थी।

उसी भीड़ में लगभग पच्चीस वर्ष का एक युवक भी खड़ा था। उसके कंधे पर एक पुराना बैग था और हाथ में कपड़े की छोटी-सी गठरी। उसके चेहरे पर थकान कम और भविष्य की चिंता अधिक दिखाई दे रही थी।

उसका नाम रघुवीर था। रघुवीर एक अत्यंत गरीब परिवार से था। पिता लंबे समय से अस्वस्थ रहते थे और नियमित काम करने की स्थिति में नहीं थे। माँ घर के छोटे-मोटे काम और सिलाई करके परिवार को संभालने की कोशिश करती थीं। उसके दो छोटे भाई अभी पढ़ रहे थे। घर की स्थिति ऐसी थी कि कई बार दो समय का भोजन जुटाना भी कठिन हो जाता था।

रघुवीर ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद काफी समय तक आसपास नौकरी तलाशने का प्रयास किया, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी। किसी को अनुभव चाहिए था, किसी को सिफारिश और कहीं इतनी कम मजदूरी मिलती थी कि उससे परिवार का कोई भला नहीं होने वाला था।

इसी बीच उसे पता चला कि दूसरे शहर के एक बड़े कारखाने में नए कर्मचारियों की भर्ती होने वाली है। उसके भीतर उम्मीद की एक छोटी-सी किरण जागी और उसने वहाँ जाने का निश्चय कर लिया।

घर से निकलते समय उसकी माँ ने उसके बैग में कुछ कपड़ों के साथ एक छोटा टिफिन भी रख दिया था। घर में उस दिन सब्जी नहीं बनी थी, इसलिए टिफिन में केवल चार सूखी रोटियाँ थीं।

रघुवीर यह बात अच्छी तरह समझता था। माँ ने स्वयं शायद उस दिन ठीक से भोजन भी नहीं किया था, लेकिन बेटे को यात्रा में भूखा न रहना पड़े, इसलिए उसके लिए रोटियाँ बचाकर रख दी थीं।

स्टेशन पर पहुँचकर रघुवीर ने ट्रेन पकड़ी और खिड़की के पास की सीट पर बैठ गया। ट्रेन धीरे-धीरे शहर की सीमा से बाहर निकलने लगी। मकान पीछे छूटते गए और खेत दिखाई देने लगे। बाहर का दृश्य बदल रहा था, लेकिन उसके मन में बार-बार एक ही प्रश्न घूम रहा था—क्या उसे इस बार नौकरी मिल जाएगी?

यदि नौकरी नहीं मिली तो घर वापस लौटने का साहस वह कैसे जुटाएगा?

उसकी जेब में बहुत थोड़े पैसे थे और उन पैसों में ही यात्रा, रहने और वापस लौटने की संभावना सब कुछ शामिल था। कुछ समय बाद उसने स्वयं को समझाया कि भविष्य की चिंता करने से बेहतर है कि वह अपने प्रयास पर ध्यान दे। कम-से-कम वह अपने जीवन को बदलने की कोशिश तो कर रहा था। दोपहर होते-होते उसे भूख लगने लगी। डिब्बे में बैठे दूसरे यात्रियों ने भी अपने-अपने भोजन के डिब्बे निकाल लिए थे। किसी के पास पूरी-सब्जी थी, किसी के पास पराठे, किसी के पास मिठाई और अचार। खाने की सुगंध पूरे डिब्बे में फैल गई थी।

रघुवीर ने भी अपना छोटा-सा टिफिन खोला। उसमें वही चार सूखी रोटियाँ रखी थीं।

उसने एक रोटी का छोटा टुकड़ा तोड़ा और टिफिन के एक खाली हिस्से में इस प्रकार लगाया मानो वहाँ कोई सब्जी रखी हो। इसके बाद उसने उसे बड़े स्वाद से खा लिया। फिर दूसरा टुकड़ा तोड़ा। वह भी उसी प्रकार खाली टिफिन में लगाया और मुँह में डाल लिया। वह हर निवाले के साथ ऐसा ही कर रहा था।

उसकी यह विचित्र आदत आसपास बैठे यात्रियों का ध्यान आकर्षित करने लगी। उन्हें स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि उसके टिफिन में रोटियों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था, फिर भी वह प्रत्येक टुकड़े को किसी काल्पनिक व्यंजन में डुबोने का अभिनय कर रहा था।

कुछ यात्रियों को यह मनोरंजक लगा, तो कुछ के मन में उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न हुई।

अंततः एक यात्री ने उसकी इस आदत के बारे में जानना चाहा।

रघुवीर ने संकोच करते हुए बताया कि उसके पास सब्जी नहीं है, इसलिए वह मन में कल्पना कर रहा है कि टिफिन में अचार रखा हुआ है। प्रत्येक निवाले को खाते समय वह स्वयं को यही विश्वास दिलाता है कि वह अचार के साथ रोटी खा रहा है। इस कल्पना के कारण सूखी रोटी भी उसे कुछ स्वादिष्ट लगने लगती है।

उसकी बात सुनकर आसपास बैठे लोगों के चेहरों पर हल्की मुस्कान आ गई।

उसी डिब्बे में बैठे एक अधेड़ व्यक्ति ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी थी। वह व्यक्ति उम्र और अनुभव दोनों में परिपक्व दिखाई देता था। उसने रघुवीर के व्यवहार में केवल एक गरीब युवक की विवशता नहीं देखी, बल्कि उसकी कल्पना करने की क्षमता भी देखी।

उस व्यक्ति ने बहुत सहज ढंग से एक ऐसी बात कही जिसने रघुवीर की पूरी सोच को बदल दिया।

उसने संकेत किया कि जब रघुवीर अपनी कल्पना में ही अचार रख सकता है, तो वह केवल अचार तक ही क्यों सीमित रहे। वह चाहे तो मटर-पनीर, शाही सब्जी या अपनी पसंद का कोई भी स्वादिष्ट भोजन सोच सकता था। बात साधारण थी, लेकिन उसके भीतर एक गहरा संदेश छिपा हुआ था। जब सोचना ही है, तो छोटा क्यों सोचा जाए?

रघुवीर के हाथ में रोटी का टुकड़ा कुछ क्षण के लिए ठहर गया। वह विचार उसके मन में उतरता चला गया।

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद उसकी समस्या केवल गरीबी नहीं है। उसकी सोच भी परिस्थितियों से इतनी प्रभावित हो चुकी है कि उसने अपने भविष्य की सीमाएँ स्वयं तय कर ली हैं।

वह नौकरी की तलाश में जा रहा था और उसकी पूरी इच्छा केवल इतनी थी कि किसी प्रकार उसे मजदूरी या छोटी नौकरी मिल जाए। लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा था कि वह किसी काम को अच्छी तरह सीख सकता है, उसमें विशेषज्ञ बन सकता है, अपनी स्थिति सुधार सकता है या भविष्य में अपना कोई काम भी शुरू कर सकता है।

उसका सपना केवल वर्तमान आवश्यकता तक सीमित था। ट्रेन आगे बढ़ती रही और बाहर तेजी से पीछे छूटते खेतों को देखते हुए रघुवीर का मन वर्षों आगे की यात्रा करने लगा। उसके भीतर पहली बार अनेक नए प्रश्न जन्म ले रहे थे। यदि कोई दूसरा व्यक्ति मशीनों को चला सकता है, तो वह क्यों नहीं सीख सकता?

यदि कोई व्यक्ति छोटा काम शुरू करके धीरे-धीरे बड़ा व्यवसाय बना सकता है, तो यह संभावना उसके जीवन में क्यों नहीं हो सकती? यदि आज उसके पास केवल सूखी रोटियाँ हैं, तो क्या यह आवश्यक है कि पूरी जिंदगी उसकी थाली ऐसी ही बनी रहे? उस दिन तक वह अपने अभावों को अपनी नियति मानता आया था। लेकिन अब उसे लगने लगा कि परिस्थितियाँ शायद वर्तमान को प्रभावित करती हैं, भविष्य को नहीं। भविष्य का निर्माण केवल उपलब्ध साधनों से नहीं, बल्कि सोच और प्रयास से भी होता है। शहर पहुँचने तक रघुवीर पहले जैसा युवक नहीं रह गया था। उसकी जेब में उतने ही कम पैसे थे, कपड़े वही साधारण थे और नौकरी अभी भी निश्चित नहीं थी। उसके बाहरी जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया था, लेकिन भीतर एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुका था।

उसकी सोच की सीमा बढ़ गई थी। कुछ दिनों के प्रयास के बाद उसे एक कारखाने में छोटी-सी नौकरी मिल गई। शुरुआत में उसका काम सामान्य था। उसे मशीनों के पास सामान पहुँचाना, सफाई करना और वरिष्ठ कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करना पड़ता था। वेतन भी बहुत अधिक नहीं था। लेकिन अब रघुवीर उस नौकरी को अपनी मंजिल नहीं मानता था। उसने उसे सीखने का अवसर मान लिया।

वह दूसरे कर्मचारियों की तुलना में मशीनों को अधिक ध्यान से देखता। किस मशीन का कौन-सा हिस्सा क्या काम करता है, खराबी क्यों आती है, मरम्मत कैसे होती है, उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है—इन सब बातों को समझने में उसे रुचि होने लगी। दिन भर के काम के बाद भी वह अनुभवी कर्मचारियों के पास कुछ समय बैठ जाता और उनसे नई बातें सीखता। धीरे-धीरे उसे मशीनों की अच्छी जानकारी होने लगी।

जो काम शुरू में उसके लिए कठिन था, वह कुछ वर्षों में उसके लिए सहज हो गया। कारखाने के अधिकारी भी उसकी लगन और सीखने की प्रवृत्ति से प्रभावित होने लगे। उसे अधिक जिम्मेदारियाँ मिलने लगीं। वेतन बढ़ा।

घर की आर्थिक स्थिति भी धीरे-धीरे सुधरने लगी। अब उसके छोटे भाई नियमित रूप से पढ़ाई कर पा रहे थे और माँ को घर चलाने के लिए पहले जैसी कठिनाई नहीं होती थी। लेकिन रघुवीर यहीं नहीं रुका।

उसके मन में वर्षों पहले रेलगाड़ी में सुनी वह बात जीवित थी—जब सोचने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तो सोच छोटी क्यों हो? उसने अपनी आय का एक हिस्सा बचाना शुरू किया। साथ ही उसने मशीनों की मरम्मत और छोटे औद्योगिक कार्यों के बारे में अधिक जानकारी जुटाई। कुछ वर्षों बाद उसने अपनी बचत से एक पुरानी मशीन खरीदी और नौकरी के अतिरिक्त खाली समय में छोटे ऑर्डर लेने शुरू कर दिए। पहले ग्राहक बहुत कम थे।

कई बार ऐसा भी हुआ कि पूरे सप्ताह कोई काम नहीं मिला। कभी भुगतान देर से मिला और कभी मशीन खराब हो गई। उसे नुकसान भी उठाना पड़ा। कुछ लोगों ने उसके प्रयास का मजाक उड़ाया।

किसी ने कहा कि नौकरी ठीक चल रही है तो व्यापार का जोखिम लेने की क्या आवश्यकता है। किसी ने उसे उसकी आर्थिक स्थिति याद दिलाई। लेकिन रघुवीर अब अपनी वर्तमान स्थिति को अपने भविष्य का प्रमाण मानने के लिए तैयार नहीं था। उसने अपनी गलतियों से सीखा। काम की गुणवत्ता सुधारी। ग्राहकों के साथ विश्वास बनाया।

जो कमाता, उसका बड़ा हिस्सा फिर अपने काम में लगा देता। समय के साथ एक मशीन दो हुईं। दो मशीनें पाँच हो गईं। छोटी-सी कार्यशाला धीरे-धीरे एक व्यवस्थित इकाई में बदल गई। वर्षों की निरंतर मेहनत के बाद रघुवीर ने उसी शहर में अपना छोटा कारखाना स्थापित कर लिया जहाँ वह कभी मजदूर की नौकरी की तलाश में आया था। अब उसके यहाँ अनेक लोग काम करते थे। उसकी पहचान केवल एक कर्मचारी के रूप में नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी के रूप में होने लगी थी। एक दिन व्यवसाय के सिलसिले में उसे रेल से दूसरे शहर जाना पड़ा।

संयोग से दोपहर के समय उसकी नजर सामने बैठे एक युवा यात्री पर पड़ी। वह साधारण कपड़ों में था और उसके पास एक छोटा-सा टिफिन था। युवक ने टिफिन खोला। उसमें केवल सूखी रोटियाँ थीं।

यह दृश्य देखकर रघुवीर कुछ क्षण के लिए जैसे समय में बहुत पीछे लौट गया।

उसे अपनी पहली यात्रा याद आ गई। वही रेलगाड़ी। वही भूख। वही सूखी रोटियाँ। और खाली टिफिन में अचार की कल्पना। आज उसके सामने रखा भोजन पर्याप्त था। उसके जीवन में अब उन दिनों जैसी आर्थिक कठिनाई नहीं थी। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके जीवन की वास्तविक यात्रा उस दिन नौकरी मिलने से शुरू नहीं हुई थी। वह यात्रा उस क्षण शुरू हुई थी जब किसी अनजान व्यक्ति की एक साधारण-सी बात ने उसकी सोच का दायरा बदल दिया था।

उसने अपने भोजन का एक हिस्सा सामने बैठे युवक को दिया और मन ही मन उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया जिसे वह वर्षों पहले केवल कुछ घंटों के लिए रेल में मिला था। कभी-कभी जीवन में कोई व्यक्ति हमें धन नहीं देता, कोई सुविधा नहीं देता और हमारे लिए रास्ता भी नहीं बनाता। वह केवल हमारी सोच का एक बंद दरवाजा खोल देता है। और वही एक खुला हुआ दरवाजा आगे चलकर हमारे पूरे जीवन की दिशा बदल देता है। उस दिन रघुवीर ने समझा था कि गरीब होना और गरीब सोच रखना दो अलग बातें हैं।

संसाधनों का अभाव मनुष्य की शुरुआत को कठिन अवश्य बना सकता है, लेकिन यदि मन में संभावनाओं का विस्तार हो, तो वही अभाव आगे बढ़ने की प्रेरणा भी बन सकता है।

जीवन-संदेश : मनुष्य की परिस्थितियाँ हमेशा उसके नियंत्रण में नहीं होतीं। वह किस परिवार में जन्म लेगा, शुरुआत में उसे कितने साधन मिलेंगे और रास्ते में कितनी कठिनाइयाँ आएँगी—इन सबका निर्णय वह स्वयं नहीं कर सकता। लेकिन वह अपने लक्ष्य का आकार अवश्य तय कर सकता है। बड़ा सोचने का अर्थ केवल बड़े सपने देखना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी वर्तमान परिस्थितियों को अंतिम सत्य न मानना। अपनी क्षमता को विकसित करना, सीखते रहना, अवसर तलाशना और अपने जीवन को आज से बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास करना ही बड़ी सोच की वास्तविक पहचान है। छोटा प्रारंभ कभी भी छोटी मंजिल का प्रमाण नहीं होता।

एक बीज आकार में छोटा होता है, लेकिन उसके भीतर विशाल वृक्ष बनने की संभावना छिपी होती है। ठीक उसी प्रकार साधारण परिस्थितियों में रहने वाले मनुष्य के भीतर भी असाधारण भविष्य की संभावना हो सकती है।

इसलिए यदि आज साधन सीमित हैं तो निराश मत होइए। यदि शुरुआत छोटी है तो उसे कमजोरी मत समझिए। और यदि परिस्थितियाँ आपके अनुकूल नहीं हैं, तब भी अपने सपनों की सीमा परिस्थितियों को तय मत करने दीजिए। आज आपकी थाली छोटी हो सकती है, लेकिन आपकी सोच छोटी नहीं होनी चाहिए।

क्योंकि—परिस्थितियाँ जीवन की शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन मंजिल अक्सर हमारी सोच और प्रयास तय करते हैं।

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