हिंदी की मनोव्यथा
डॉ. शन्नो तिवारी
अनजानी हूँ अपना लोगे, तुम मुझको आज
तुमने ही तो चाहा था, सुननी मेरी आवाज़
साथी हम हैं भेद कहाँ है, वक्ता और श्रोता का
ईश्वर की इच्छा पर चलते, भेद है अपने मन का
यही भावना भरे हृदय से, सुना रही सुर आज
अनजानी हूँ....
सुख दुःख के इस जगत में, हम सब हैं केवल भोगी
यह जग संन्यास नहीं, ना तुम योगी न हम योगी
लील गयी संस्कृति परतंत्रता, इसका है अति अवसाद
अनजानी हूँ....
कैसे मैं तुमसे कहूँ, अब छोड़ो भाषाई विवाद
यदि एक देश एक भाषा पर सचमुच तुमको है नाज़
तो कलह कपट कटुता त्यागो, जानोगे सुख का राज़
अनजानी हूँ ...
स्वतंत्र भारत के नौनिहाल, नहीं परिचय के हो तुम मोहताज़
तुमको तो लाना है भारत में फिर से राम राज
वसुधैव कुटुम्बकम् का सपना करना है साकार आज
अनजानी हूँ...
तमिल तेलुगु मलयालम कन्नड़, दक्षिण में मेरे भाई चार
गौरवान्वित हो उठती हूँ कितना विस्तृत मेरा परिवार!
प्रार्थना यही करती हूँ, भाई ना माने मुझे भार
अनजानी हूँ...
इठलाती बलखाती इसी बीच कोकणी आई,
बोली जय हिंद जय हिंदी मेरी माई,
मैं फूली फली सदा, पा कर तेरा ही प्रसाद
अनजानी हूँ...
असमी उड़िया उर्दू मराठी गुजराती पंजाबी बंगाली
यह सब मेरी प्यारी बहने हैं, इनकी छवि छटा निराली,
इन सबमे मेरा ही अंश है, क्यों करते तुम नज़रंदाज़.
अंजानी हूँ....
जर्मन, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, फारसी, जापानी
पालन हारी संस्कृत मेरी जननी, पर मैं अब तक हूँ अनजानी
क्या अब मैं चाही जाऊँगी, पूरी होगी मन की मुराद
अंजानी हूँ....
अतिथि बनी मैं, जब भी हिन्दी पखवाड़ा है आया,
ऊंचे ऊंचे भाषण और कविताओ का युग छाया,
बीत गए वे हिंदी के शुभ दिन, मेरी खुशियों के मादक दिन
विचलित हो उठती हूँ, इन क्षणिक सुखों को करके याद
अंजानी हूँ....
याद आया चौदह सितंबर, जब जन्मदिन मेरा मनाया
आह्लादित हो तुम सबने मेरा मनहर गुणगान कराया
बस एक दिवस के लिए ही मानो, भारत में हिंदी युग छाया.
बस अल्प दिवस के लिए ही, तुमने क्यों रखा सर पर मेरे ताज।
अनजानी हूँ...
दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा, माह
इन सीमाओं में मत बांधो मेरा सौभाग्य
मैं बिंदी हूँ भारत माँ के माथे की,
हिन्दी की बिंदी से, माँ को है, अति अनुराग।।
अनजानी हूँ...
पूजता है दस जनवरी को,
मुझे यह पूरा संसार,
मनाते हैं मेरा जन्मदिन,
साल में दो बार, आती हूँ सबको याद।।
अनजानी हूँ...
अश्रूपूरित नयनों से, करती एक फरियाद
याद रखना तुम मुझे, इन पन्द्रह दिनों के भी बाद।
तीस सितंबर के बाद, मत हो जाना तुम हमसे नाराज।
अनजानी हूँ...
संपन्न करो तुम काम काज, लेकर हिन्दी का साज बाज
राज भाषा का मान रख, पहनो हिन्दी का ताज।
अनुरोध ये छोटा सा मेरा, मत ठुकरा देना आज।
होती है माँ सुखी तभी, जब बच्चे हों सुखी आबाद।
अंजानी हूँ..



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