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अंजाने रिश्ते

  • Feb 22
  • 1 min read

डॉ मंजु सैनी

 

एक अनजाना सा रिश्ता

मन का मीत बना और

फिर बिछुड़ गया

एक नश्तर बन मेरे जीवन में

साथ निभाने की जो बातें हुईं

छोड़ गया यूँ ही क्षण भर में

आज नश्तर से चुभते हैं

नासूर बन छोड़ गए चिह्न

जीवंत हूँ तो टीसता हैं वो दर्द

नजर अंदाज करती हूँ फिर भी

खामोश रह जाती हूं सोचकर

शायद यही किस्मत में लिखा है

बस गया था सांसों में मानो

रह नही पाऊँगी उस बिन

पर चल रही हैं जिंदगी यूं ही

अकेले सफर में चलते चलते ही

रह गया हैं मात्र यादो का कारवां

शायद कभी होगा मेरी यादों को

उसका सही मुकाम मुक्ति यदों से

न रहूँ कभी मैं प्रतीक्षारत

उस अंजाने से रिश्ते से मुक्त

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