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कवि का दुख

  • Jan 6
  • 1 min read

प्रियंवदा पाण्डेय

 

मेरा यह लघुतम जीवन

जो किसी के किसी काम का नहीं

जिसे पाकर मैंने पाए हैं

अनगिनत दु:ख और किन्चित सुख भी।

दु:खों की श्रृंखला की पहली कड़ी

कौन सी थी ठीक से याद नहीं

यह भी नहीं कि किसका

विस्तार कितना था

और गहराई में अधिक कौन था

यह याद है

जो भी आया उसने चमकाया मुझे

नींबूमँजे बर्तनों की तरह।

धोया मुझे श्वेताभ तरल से वह

अकसर कटाक्ष के बाण पर

सवार होकर आता था

और छेद जाता था

मेरे स्नेहिल हृदय का मुख।

मैंने हरदम ढकेला इसे अदम्य साहस

और धैर्य धना हि साधव:

सूक्ति के बलपर।

जब मैंने पार पा लिया इनसे

एक हद तक

तब यह दुख है कि मैं कविकर्म

क्यों करती हूँ

क्यों रचती हूँ शब्द-शब्द से नया संसार

जब समझी जाती हूँ ठीक विपरीत

फर्क नहीं पड़ता 

प्रतिशतभर भी किसी को?

बहता नहीं कोई हृदय तरल होकर

आँखों से न बदलता है कोई निजाम

मनुष्यत्व के विरूद्ध अपना निर्णय

न आयोजित होती है कोई सभा

इनके सापेक्ष थकहारकर

कहती हूँ अनुभूतियों चली जाओ

दूर बहुत दूर समा जाओ

किसी महासागर के गर्भ में--

मैं मुक्त हो सकूँ अनुभूति के विषय

सुख-दुख से।

*****

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