अंतिम यात्रा से पहले
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
सुबह के लगभग चार बजे थे। कड़ाके की ठंड ने पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले रखा था। सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। कहीं-कहीं बिजली के खंभों से झरती पीली रोशनी धुंध की मोटी चादर में खो जाती थी। बंद दुकानों के शटर पर ओस जम गई थी और पेड़ों की पत्तियों से टपकती नमी ठंडी हवा के साथ वातावरण को और सिहरनभरा बना रही थी।
ऐसे मौसम में अधिकांश लोग रजाइयों के भीतर दुबके हुए थे, लेकिन वे अपनी वर्षों पुरानी दिनचर्या के अनुसार प्रातः भ्रमण के लिए निकल पड़े थे। उम्र निन्यानवे वर्ष हो चुकी थी। शरीर पहले जैसा समर्थ नहीं रहा था। कदमों की गति धीमी हो गई थी और साँसों को भी अब लंबी दूरी तय करने में अधिक श्रम करना पड़ता था। फिर भी सुबह की सैर उनके लिए केवल स्वास्थ्य का अभ्यास नहीं, जीवन से जुड़ने का एक माध्यम थी। उन्हें लगता था कि जब तक अपने पैरों पर चल सकते हैं, तब तक स्वयं को असहाय मानने का कोई कारण नहीं।
वे सड़क के किनारे-किनारे सावधानी से आगे बढ़ रहे थे। उनकी एक पुरानी आदत थी—किसी भी काम में अनावश्यक जोखिम नहीं लेना। वह अक्सर कहा करते थे कि सावधानी बरतने में कुछ नहीं जाता, लेकिन असावधानी कभी-कभी जीवन भर का पछतावा दे जाती है। इसीलिए सुनसान सड़क पर भी वे बिल्कुल किनारे चल रहे थे। कुछ दूर जाने के बाद पीछे से किसी वाहन के इंजन की आवाज सुनाई दी। उन्होंने मुड़कर देखा। धुंध को चीरता हुआ एक ऑटो उनकी ओर आ रहा था। इतनी सुबह, इतनी ठंड में! उनके मन में सहज ही विचार आया कि चालक अवश्य किसी मजबूरी में निकला होगा। संभव है, उसे किसी यात्री को स्टेशन पहुँचाना हो या परिवार के लिए रोजी-रोटी कमाने की चिंता उसे घर से बाहर ले आई हो।
उन्होंने ऑटो को रास्ता देने के लिए स्वयं को और किनारे कर लिया। सड़क पर्याप्त चौड़ी थी। सामने से कोई वाहन भी नहीं आ रहा था। उन्हें किसी दुर्घटना की आशंका नहीं थी। लेकिन जीवन की कुछ घटनाएँ इतनी अप्रत्याशित होती हैं कि सारी सावधानियाँ भी उनके सामने असहाय रह जाती हैं। अगले ही क्षण एक तेज झटका लगा। ऑटो पीछे से उनसे टकरा गया। वे संतुलन खोकर सड़क पर गिर पड़े। सिर और शरीर में असहनीय पीड़ा उठी। कुछ क्षणों के लिए उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। ऑटो चालक घबरा गया। उसने वाहन आगे बढ़ाकर वहाँ से निकल जाने का प्रयास किया, लेकिन जैसे नियति ने उसके लिए भी कुछ और ही तय कर रखा था।
ऑटो का इंजन अचानक बंद हो गया। उसने बार-बार वाहन चालू करने की कोशिश की, पर इंजन ने साथ नहीं दिया। उधर सड़क पर गिरे वृद्ध ने किसी तरह अपनी चेतना समेटी। शरीर गंभीर रूप से घायल था। उठना भी कठिन लग रहा था। फिर भी न जाने कहाँ से उनके भीतर अचानक इतनी शक्ति आ गई कि वे लड़खड़ाते हुए खड़े हो गए। उन्होंने आगे बढ़कर चालक की कलाई पकड़ ली। पकड़ इतनी मजबूत थी कि चालक दर्द से कराह उठा। वृद्ध की आँखों में पीड़ा के साथ आक्रोश भी था। जिस व्यक्ति ने उन्हें घायल किया था, वह सहायता करने के बजाय भागने का प्रयास कर रहा था।
कुछ क्षणों के लिए उन्हें लगा कि उसे पकड़कर रखना चाहिए। उसके किए का परिणाम उसे अवश्य भुगतना चाहिए। लेकिन तभी उनकी दृष्टि चालक के चेहरे पर पड़ी। वह एक साधारण-सा युवक था। चेहरे पर भय साफ दिखाई दे रहा था। उसके होंठ काँप रहे थे और आँखों में असहायता उतर आई थी। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द जैसे गले में अटक गए थे।
वृद्ध को लगा मानो उसकी आँखें उनसे विनती कर रही हों—बाबूजी, मुझे छोड़ दीजिए। घर में मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। यदि मैं वापस नहीं पहुँचा तो उनका क्या होगा? यह बात चालक ने कही थी या वृद्ध ने उसके भयभीत चेहरे में पढ़ ली थी, कहना कठिन था। लेकिन उस एक क्षण में उनके भीतर कुछ बदल गया। कलाई पर उनकी पकड़ ढीली पड़ने लगी। उन्होंने युवक को फिर देखा। उनके सामने अब केवल दुर्घटना का जिम्मेदार चालक नहीं था। एक भयभीत मनुष्य भी था, जिसके पीछे संभवतः एक परिवार, कुछ जिम्मेदारियाँ और अनेक चिंताएँ थीं।
उन्होंने धीरे-धीरे उसकी कलाई छोड़ दी। चालक ने अविश्वास से उनकी ओर देखा। फिर बिना कुछ कहे ऑटो की ओर भागा। इस बार इंजन चालू हो गया। कुछ ही क्षणों में ऑटो धुंध के भीतर ओझल हो गया। वृद्ध सड़क के किनारे खड़े उसे जाते देखते रहे। उनके चेहरे पर न क्रोध बचा था, न शिकायत। लेकिन शरीर अब उनका साथ छोड़ने लगा था। आँखों के सामने सब कुछ घूमने लगा। पैरों की शक्ति समाप्त हो गई और वे धीरे-धीरे धरती पर गिर पड़े। कुछ ही क्षणों में उनकी चेतना लुप्त हो गई।
बेहोशी की गहराइयों में उतरते हुए उन्हें लगा जैसे वे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गए हों। चारों ओर एक अद्भुत शांति थी। न सड़क का शोर था, न ठंडी हवा का स्पर्श और न ही घायल शरीर की असहनीय पीड़ा। उनके सामने एक दिव्य प्रकाश फैलने लगा। धीरे-धीरे उस प्रकाश के बीच एक परिचित आकृति उभर आई।
मोरपंख से सुशोभित मुकुट, पीतांबर, हाथों में बाँसुरी और अधरों पर वही मोहक मुस्कान।
भगवान श्रीकृष्ण!
वृद्ध की आँखें विस्मय से फैल गईं। जीवन भर जिनका नाम जपा था, जिनके चरणों में अपने सुख-दुख अर्पित किए थे, आज वही उनके सामने खड़े थे। कुछ क्षण वे उन्हें निहारते रहे। फिर उनके चेहरे पर भी हल्की मुस्कान उभर आई। उन्हें लगा जैसे वर्षों पुराना कोई आत्मीय मित्र सामने आ खड़ा हुआ हो। लेकिन अगले ही क्षण उन्हें कुछ याद आया। उनकी मुस्कान में एक शिकायत घुल गई।
उन्होंने श्रीकृष्ण की ओर देखते हुए पूछा, “प्रभु! यह कैसा न्याय है? आपने तो मुझे दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया था। फिर आज मुझे इस प्रकार क्यों बुला लिया?”
श्रीकृष्ण शांत खड़े रहे।
उनके अधरों की मुस्कान तनिक भी नहीं बदली।
वृद्ध ने फिर प्रश्न किया, “क्या आपकी कृपा भी समय आने पर समाप्त हो जाती है?”
भगवान श्रीकृष्ण ने स्नेहभरी दृष्टि से उनकी ओर देखा।
“वत्स, तुम्हें निन्यानवे वर्षों का जीवन मिला। इतने लंबे समय तक तुमने इस संसार को देखा, समझा और अनुभव किया। सुख भी पाए, दुख भी सहे। कितने ही लोग तुम्हारे जीवन में आए और कितने ही तुम्हारी आँखों के सामने विदा हो गए। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हें जीवन ने कम अवसर दिए?”
वृद्ध कुछ क्षण मौन रहे।
उन्हें अपना बचपन याद आया।
माता-पिता का स्नेह, युवावस्था के सपने, परिवार की जिम्मेदारियाँ, बच्चों की किलकारियाँ और फिर धीरे-धीरे बीतते वर्षों की लंबी यात्रा। कितने चेहरे थे जो अब केवल स्मृतियों में रह गए थे! कितनी इच्छाएँ पूरी हुई थीं और कितनी अधूरी रह गई थीं! फिर भी उनके मन में एक प्रश्न शेष था।
“लेकिन प्रभु, आपने तो मुझे सौ वर्ष जीने का वरदान दिया था!”
श्रीकृष्ण मुस्कराए।
“वत्स, मैंने तुम्हें दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया था। तुमने स्वयं उसे सौ वर्षों की निश्चित अवधि मान लिया।”
वृद्ध चौंक पड़े।
उन्होंने अपने मन में वर्षों से सँजोए उस विश्वास को टटोला।
क्या सचमुच उन्होंने आशीर्वाद को अपनी इच्छा के अनुसार समझ लिया था?
श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “मनुष्य को जीवन मिलता है, लेकिन वह उस पर अपना पूर्ण अधिकार समझ बैठता है। उसे लगता है कि आने वाला प्रत्येक दिन उसी का है। वह भूल जाता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण एक अवसर है, कोई स्थायी अधिकार नहीं।” वृद्ध के चेहरे पर विचारों की छाया उतर आई।
उन्हें लगा जैसे उनके सामने जीवन का कोई ऐसा सत्य खुल रहा हो जिसे वे इतने वर्षों में भी पूरी तरह नहीं समझ सके थे। फिर भी उनकी सहज आत्मीयता लौट आई।
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “प्रभु, आप बड़े छलिया हैं! जीवन भर मुझे आशा देते रहे और अब कह रहे हैं कि मैंने ही आपके आशीर्वाद का अर्थ गलत समझ लिया।” श्रीकृष्ण हँस पड़े। उस हँसी में न उपहास था, न कठोरता। केवल असीम स्नेह था।
“वत्स, तुम्हें जीवन से प्रेम था। इसीलिए तुम एक दिन और जीना चाहते हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा कि जीवन से प्रेम करने का अर्थ केवल अधिक दिनों तक जीवित रहना नहीं होता?” वृद्ध ने प्रश्नभरी दृष्टि से उनकी ओर देखा।
श्रीकृष्ण बोले, “जीवन का महत्त्व इस बात में भी है कि तुमने उसे किस भाव से जिया। तुमने क्या पाया, यह एक प्रश्न है; लेकिन तुमने क्या दिया, यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।”
वृद्ध के मन में अचानक उस ऑटो चालक का चेहरा उभर आया। उसकी भयभीत आँखें। उसकी काँपती कलाई। और उसे छोड़ देने का वह अंतिम क्षण। उन्हें लगा जैसे भगवान श्रीकृष्ण उनके मन की बात जान गए हों।
“आज तुमने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी एक मनुष्य को क्षमा किया,” श्रीकृष्ण ने कहा। “तुम्हारे पास उसे पकड़कर रखने का कारण था। तुम उससे क्रोधित भी थे। लेकिन उसके चेहरे में तुम्हें उसकी असहायता दिखाई दी और तुम्हारा हृदय करुणा से भर उठा।” वृद्ध की आँखें नम हो गईं।
“प्रभु, मैं उसे क्षमा करने के बारे में सोच भी नहीं रहा था। बस उसके चेहरे को देखकर मेरी पकड़ ढीली पड़ गई।”
“करुणा कई बार इसी प्रकार जन्म लेती है, वत्स। वह लंबे विचार-विमर्श की प्रतीक्षा नहीं करती। किसी दूसरे का दुख जब अपने हृदय तक पहुँच जाता है, तो मनुष्य का व्यवहार स्वयं बदलने लगता है।” वृद्ध ने सिर झुका लिया।
अब उन्हें अपनी आयु का अधूरा रह गया एक वर्ष उतना महत्त्वपूर्ण नहीं लग रहा था।
फिर भी उन्होंने धीरे से पूछा, “तो क्या मेरी यात्रा यहीं समाप्त हो गई, प्रभु?”
श्रीकृष्ण ने उनकी ओर हाथ बढ़ाया।
“जिसे तुम अंत समझ रहे हो, उसे आज अपने भय और मोह से मुक्त होने का क्षण मानो।”
वृद्ध ने भगवान का हाथ थाम लिया।
उन्हें लगा जैसे उनके भीतर वर्षों से संचित भय, शिकायतें और अधूरी इच्छाएँ धीरे-धीरे शांत हो रही हों। अब उन्हें किसी से कुछ नहीं माँगना था। न एक वर्ष और। न कोई नया वरदान। न किसी से अपने जीवन का हिसाब। उनके हृदय में केवल कृतज्ञता रह गई थी। उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों में मस्तक झुका दिया। उधर धरती पर भोर की पहली आभा फैलने लगी थी। सड़क पर पड़े वृद्ध का शरीर निश्चल हो चुका था।
ठंडी हवा अब भी बह रही थी। धुंध अब भी वातावरण में तैर रही थी। दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी सुनाई देने लगी थी। लेकिन उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी। मानो अंतिम क्षणों में उन्हें किसी ऐसी शांति का अनुभव हुआ हो जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं।
कथा की आध्यात्मिक कल्पना में उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त को अभय प्रदान किया। दिव्य प्रकाश फैल गया। मानो आकाश से पुष्प बरस रहे हों। और जीवन भर संसार की राहों पर चलते रहने वाला वह वृद्ध अब अपनी अंतिम यात्रा पर निकल पड़ा। पीछे रह गया उसका नश्वर शरीर। और उसके साथ एक ऐसा प्रश्न, जो हर मनुष्य के जीवन से जुड़ा है—हम कितने वर्ष जिए, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण क्या यह नहीं कि हमने अपने हिस्से के वर्षों को किस भाव से जिया?
जीवन-संदेश : मनुष्य जीवन भर अपने लिए कुछ और समय माँगता रहता है। वह सोचता है कि यदि उसे कुछ वर्ष और मिल जाएँ, तो वह अपने अधूरे कार्य पूरे कर लेगा, कुछ और सुख प्राप्त कर लेगा और अपने प्रियजनों के साथ थोड़ा और समय बिता लेगा।
लेकिन जीवन की अनिश्चितता हमें याद दिलाती है कि हमारे पास वास्तव में केवल वर्तमान क्षण है। जीवन की सार्थकता केवल उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसमें समाहित प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और सद्कर्मों में भी होती है।
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