कैसे करूँ मैं कन्यादान
डॉ० शन्नो तिवारी
आज विदाई की बेला में,
समझ नहीं आता मुझको,
कैसे निकाल दूँ शरीर से,
अपने ही दिल को?
चाहती हूँ भूलना अतीत,
पर भुला नहीं पाती हूँ,
अनजाने ही अतीत की यादों में खो जाती हूँ।।
घर बाहर का टेंशन गुस्सा,
तुम पर ही तो उतारती थी,
पर मुस्कुराती थी तभी मैं
जब 'मम्मी' कह तुम मुझे बुलाती थी।।
कहते हैं कन्यादान से बड़ा
नहीं है कोई दान
नहीं चाहती मैं पाना
ऐसा पुण्य ऐसा सम्मान।।
राजा जनक सीता के लिए
गिरिजा के लिए रानी मैना, राजा हिमवान
व्याकुल अधीर वो रोए थे
मैं भी हो रही हूँ विचलित–परेशान।।
रह रह कर उठ रहा मन में,
अंतहीन पीड़ा का प्रचंड तूफान,
सुख दुख की इस पराकाष्ठा में,
अब कैसे करूँ मैं विषपान।।
ना राजा हूँ ना रानी हूँ मैं,
धन दौलत से हूँ अंजान,
कैसे कन्या दान करूँ मैं,
मैं हूँ एक साधारण इंसान।।
एक कन्या धन ही है पास मेरे,
मेरी तो ये सोना चांदी मोती हीरे,
उसके बिन जग लगता सूना श्मशान,
कैसे करूँ मैं कन्या दान।।
आँसुओं को रोक लेती हूँ अभी,
भावनाएं दबा लेती हूँ सभी,
समझा रही हूँ मैं तुमको,
याद कर मेरी मत रोना तुम कभी।।
मन से नहीं कर पा रही,
मैं बेटी तुमको विदा,
आशीष मेरी है यही,
तुम रहो सुखी सर्वदा।।
मन की आँखों से मैं,
तुमको ही निहारूँगी,
कब पति संग घर आओगी,
राह तुम्हारी ताकूँगी।।
तुम भी छोड़ो अब करना–
इस घर की ओर चिंता मेरी,
नवजीवन तुम्हारा मंगलमय हो,
प्रभु से है विनती मेरी।
नए घर में जाकर तुमको,
हमसे भी ज्यादा प्यार दुलार मिले,
तुम सम्मान यथोचित करो बड़ों का,
ऐसा सुख सौभाग्य मिले।
बेटी - दामाद की जोड़ी
सुखमय सदा अमर रहे,
सास - ससुर की कृपा
सदा तुम्हारे साथ रहे।



Comments