top of page

छोटी बह्र में एक ग़ज़ल !!

1 day ago
1 min read

मधु मधुमन

 

होने को तो हो सकता है

पत्थर दिल भी रो सकता है

दिल पर आख़िर कब तक कोई

बोझ ग़मों का ढो सकता है

इक दिन तो थक ही जाएगा

कोई कितना रो सकता है

आँखों में जब सावन हो तो

कोई कैसे सो सकता है

ये तो कभी सोचा भी नहीं था

फूल भी शूल चुभो सकता है

ख़ुश्क ज़मीं पर कैसे कोई

ख़्वाब सुनहरे बो सकता है

अश्के-नदामत से क्या कोई

पाप भी अपने धो सकता है

शाइर को ये सहूलत है वो

शे’र में दर्द पिरो सकता है

उसको ही मिलता है रब जो

“मधुमन” ‘मैं ‘ को खो सकता है

*****

Comments


bottom of page