नींव का पत्थर
साची सेठ
नींव का पत्थर हूँ, दिखाई नहीं देता
इमारत की बुलंदी का मज़ा भरपूर लेता।
गहराई विचारों की, व्यक्तित्व की,
लम्हों की तो कभी अपनत्व की,
कहते सब हैं, समझते कम हैं,
गुजरते तो सब हैं पर कहते कम हैं।
अब कालिख की बात न किया करें, ज़नाब!
आंखों का सुरमा, चेहरे पर लग जाये
तो ज़िन्दगी की कालिख बन जाये।
उम्मीद मन की, आंखों में रहा करती है,
इश्क की ख़लिश, ख्वाबों में हुआ करती है।
मेरे दिल की है, आप परेशान हैं,
अश्क मेरे हैं, और आंखे आपकी हैं
और तो और,
जुल्फें मेरी, फूल आप लगाते हैं,
दुखी, दर्द में मैं, और हलकान आप होते हैं
नींव की बात, इश्क पर आ गई
पत्थर से उठी, ज़ुल्फ़ों पे छा गई।
आप हैं कि अब नहीं समझे बात को
याद करते हैं पुरानी मुलाकात को।
समझिये ज़नाब!
पुरानी बात को दिल से न लगाइये,
यदि समझे हों कुछ, हमको भी समझाइए।
नहीं समझे? तो क्या करें
आंखों का सुरमा है, सम्भल जाइये
नींव का पत्थर है, उखाड़ कर
ऊपर न लगाइये, ऊपर न लगाइये।
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