मन का मौसम
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
बहुत समय पहले हिमालय की शांत और मनोहारी घाटियों के बीच राजसमंद नाम का एक सुंदर नगर बसा था। चारों ओर देवदार के ऊँचे वृक्ष, कल-कल बहती नदियाँ और बर्फ से ढकी पर्वत-चोटियाँ उस नगर की शोभा बढ़ाती थीं। वहां के लोग सरल, परिश्रमी और संतोषी थे।
उसी नगर में नंदाराम नामक एक प्रतिष्ठित सेठ अपने परिवार के साथ रहता था। उसके पास धन-दौलत, अनाज से भरे भंडार और दूर-दूर तक फैला व्यापार था। नगर में उसका बहुत सम्मान था, किंतु उसे अपनी संपत्ति से अधिक गर्व अपने इकलौते पुत्र रघुवीर के संस्कारों पर था।
रघुवीर शिक्षित, विनम्र और परिश्रमी युवक था। वह निर्धनों की सहायता करता, बुजुर्गों का आदर करता और पिता के व्यापार में पूरी निष्ठा से हाथ बंटाता था। जब वह विवाह योग्य हुआ, तब नंदाराम ने निश्चय किया कि वह अपने पुत्र के लिए केवल रूपवती अथवा धनवान कन्या नहीं, बल्कि बुद्धिमती, सकारात्मक विचारों वाली और परिवार को प्रेम से बांधकर रखने वाली जीवनसंगिनी चुनेगा।
सेठ अक्सर कहा करता था, “सुंदरता समय के साथ बदल सकती है और धन आज है तो कल नहीं भी रह सकता। लेकिन विवेक, मधुर स्वभाव और संतुलित सोच जीवन की हर कठिनाई में साथ देते हैं।”
उसने योग्य कन्या की खोज आरंभ की। इसके लिए उसने एक साधारण-सा दिखाई देने वाला, किंतु गहरा प्रश्न तैयार किया। जब भी वह किसी कन्या से मिलता, पूछता—“बेटी! बताओ, सर्दी, गर्मी और वर्षा—इन तीनों में सबसे अच्छा मौसम कौन-सा है?”
सबसे पहले वह एक संपन्न परिवार की कन्या को देखने गया। कन्या बहुत सुंदर और सुशिक्षित थी। सेठ ने अपना प्रश्न उसके सामने रखा। कन्या ने उत्साह से उत्तर दिया, “गर्मी का मौसम सबसे अच्छा होता है। दिन बड़े होते हैं और यात्रा करना सरल होता है। हिमालय की ठंडी वादियों में घूमने, झरनों के पास बैठने और खुले आकाश के नीचे समय बिताने में बड़ा आनंद आता है।”
उत्तर अच्छा था, लेकिन सेठ को उसमें केवल व्यक्तिगत पसंद दिखाई दी। उसने कन्या को आशीर्वाद दिया और घर लौट आया। कुछ दिनों बाद वह दूसरी कन्या से मिलने गया। उसने वहां भी वही प्रश्न पूछा। कन्या ने मुस्कराकर कहा, “मुझे तो सर्दी का मौसम सबसे अच्छा लगता है। इस ऋतु में रंग-बिरंगे ऊनी वस्त्र पहने जाते हैं। घरों में तरह-तरह के पकवान बनते हैं और धूप में बैठने का आनंद ही अलग होता है। सर्दियों में खाया हुआ भोजन भी आसानी से पच जाता है।” सेठ ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उत्तर में व्यावहारिकता थी, फिर भी उसके मन को अपेक्षित संतोष नहीं मिला।
इसके बाद वह तीसरी कन्या को देखने पहुंचा। प्रश्न सुनकर वह प्रसन्न होकर बोली, “वर्षा ऋतु से सुंदर कोई मौसम हो ही नहीं सकता। बादलों की गर्जना, मिट्टी की सौंधी सुगंध, हरियाली से ढकी धरती और पर्वतों से उतरते झरने मन को मोह लेते हैं। वर्षा में भीगने का आनंद तो अवर्णनीय है।”
सेठ ने उसकी प्रकृति-प्रेमी दृष्टि की प्रशंसा की, लेकिन उसे लगा कि वह अभी भी उस उत्तर तक नहीं पहुंचा है जिसकी उसे तलाश थी। कुछ समय बाद वह एक अन्य परिवार में गया। वहां की कन्या से भी उसने वही प्रश्न किया। कन्या ने मुंह बनाते हुए कहा—“मुझे तो कोई भी मौसम अच्छा नहीं लगता। गर्मी में पसीना और बेचैनी होती है। सर्दी में हाथ-पांव सुन्न हो जाते हैं। वर्षा में कीचड़, गंदगी और भीगे हुए कपड़ों की परेशानी रहती है। प्रकृति ने शायद कोई भी ऋतु पूरी तरह सुखद बनाई ही नहीं!”
कन्या का उत्तर सुनकर सेठ चुप हो गया। उसने सोचा, “जिसे हर परिस्थिति में केवल कमी दिखाई देती हो, वह जीवन की कठिनाइयों में आनंद और समाधान कैसे खोज पाएगी?” लगातार कई परिवारों से मिलने के बाद भी उसे अपने पुत्र के लिए मनचाही जीवनसंगिनी नहीं मिली। वह थक गया और कुछ समय के लिए कन्याएं देखना बंद कर दिया।
एक दिन नंदाराम अपने पुराने मित्र गोपालदास के घर गया। दोनों आंगन में बैठकर बीते दिनों की बातें कर रहे थे। तभी एक युवती हाथ में जल और अल्पाहार लेकर वहां आई। उसका नाम सुधा था। वह गोपालदास की भतीजी थी और कुछ दिनों के लिए उनके घर आई हुई थी।
सुधा के वस्त्र अत्यंत साधारण थे, पर उसके व्यवहार में सहजता और मुख पर आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने दोनों बुजुर्गों को प्रणाम किया, जल दिया और पास खड़ी होकर विनम्रता से पूछने लगी कि उन्हें किसी और वस्तु की आवश्यकता तो नहीं है।
नंदाराम उसके शिष्ट व्यवहार से प्रभावित हुआ। बातचीत के दौरान उसने सहज भाव से अपना पुराना प्रश्न पूछ लिया—“बेटी सुधा, क्या तुम बता सकती हो कि सर्दी, गर्मी और वर्षा में सबसे अच्छा मौसम कौन-सा होता है?”
सुधा ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। वह कुछ क्षण सोचती रही और फिर मुस्कराकर बोली—“सेठजी, मेरे विचार से तीनों ही मौसम अच्छे हैं और तीनों कठिन भी हो सकते हैं।”
नंदाराम ने आश्चर्य से पूछा, “यह कैसे?”
सुधा ने कहा, “यदि शरीर स्वस्थ हो, मन प्रसन्न हो और जीवन में परिश्रम करने की इच्छा हो, तो गर्मी की धूप भी ऊर्जा देती है, सर्दी की ठंडक भी आनंद देती है और वर्षा की बूंदें भी संगीत जैसी लगती हैं। लेकिन यदि शरीर रोगी हो, मन शिकायतों से भरा हो और सोच निराशाजनक हो, तो वसंत भी अच्छा नहीं लगता।”
सेठ उसकी ओर एकटक देखने लगा। सुधा ने अपनी बात आगे बढ़ाई—“प्रत्येक ऋतु प्रकृति के लिए आवश्यक है। गर्मी न पड़े तो बादल बनने की प्रक्रिया कैसे चलेगी? वर्षा न हो तो खेत कैसे लहलहाएंगे? सर्दी न आए तो धरती को विश्राम कैसे मिलेगा? समस्या मौसम में नहीं, कई बार उसे देखने वाली हमारी दृष्टि में होती है।”
“लेकिन बेटी,” सेठ ने उसकी परीक्षा लेते हुए पूछा, “यदि किसी मौसम के कारण हमें परेशानी होने लगे, तब क्या करना चाहिए?”
सुधा ने विनम्रता से उत्तर दिया, “तब शिकायत करने के स्थान पर उसके अनुरूप स्वयं को ढालना चाहिए। गर्मी में छाया, जल और संयम की आवश्यकता होती है। वर्षा में सावधानी तथा स्वच्छता रखनी चाहिए और सर्दी में गर्म वस्त्र तथा उचित आहार का ध्यान रखना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति परिस्थितियों के बदलने की प्रतीक्षा नहीं करता; वह स्वयं को परिस्थितियों के योग्य बनाता है।”
यह उत्तर सुनते ही नंदाराम का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। जिस उत्तर की उसे इतने दिनों से प्रतीक्षा थी, वह आज अनायास मिल गया था। उसने अनुभव किया कि सुधा ने केवल मौसमों का वर्णन नहीं किया, बल्कि जीवन का गहरा सत्य कह दिया था।
उसने गोपालदास से सुधा के परिवार के विषय में जानकारी ली। उसे पता चला कि सुधा साधारण परिवार से थी। उसने बहुत अधिक औपचारिक शिक्षा नहीं पाई थी, किंतु जीवन के अनुभवों ने उसे समझदार बना दिया था। वह घर के कार्यों में कुशल थी, जरूरतमंदों की सहायता करती और कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं खोती थी।
नंदाराम ने घर लौटकर रघुवीर को पूरी घटना सुनाई। रघुवीर ने कहा, “पिताजी, आपने जीवनसंगिनी में जिन गुणों की कल्पना की थी, वे सुधा के विचारों में स्पष्ट दिखाई देते हैं। यदि वह और उसका परिवार सहमत हों, तो मुझे इस संबंध से प्रसन्नता होगी।”
दोनों परिवारों की सहमति से रघुवीर और सुधा का विवाह हो गया। सुधा ने अपनी बुद्धिमत्ता, प्रेम और सकारात्मक दृष्टि से घर को सचमुच स्वर्ग बना दिया।
कुछ ही समय बाद नंदाराम के व्यापार में कठिन दौर आया। लगातार वर्षा के कारण कई मार्ग बंद हो गए और व्यापारिक सामान समय पर नहीं पहुंच सका। परिवार के कुछ लोग घबरा गए, लेकिन सुधा ने धैर्य बनाए रखा। उसने घर के अनावश्यक खर्च कम किए, सुरक्षित रखे अनाज का सुव्यवस्थित उपयोग किया और रघुवीर को स्थानीय व्यापार के नए उपाय सुझाए।
वर्षा समाप्त होते-होते व्यापार फिर पटरी पर आ गया। नंदाराम ने प्रसन्न होकर कहा—“बेटी, उस दिन तुमने कहा था कि स्वस्थ मन के लिए हर मौसम अच्छा होता है। आज तुमने सिद्ध कर दिया कि संतुलित बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए जीवन की प्रत्येक परिस्थिति एक अवसर बन सकती है।”
सुधा ने मुस्कराकर उत्तर दिया—“पिताजी, मौसम सदा एक-सा नहीं रहता। उसी प्रकार सुख और दुख भी स्थायी नहीं होते। जो अनुकूल समय में विनम्र रहता है और प्रतिकूल समय में धैर्य नहीं खोता, वही जीवन का सच्चा आनंद प्राप्त करता है।”
उस दिन नंदाराम को विश्वास हो गया कि उसने अपने पुत्र के लिए केवल एक योग्य पत्नी ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए विवेक और प्रसन्नता का स्रोत चुन लिया था।
जीवन-संदेश : जीवन भी ऋतुओं की तरह निरंतर बदलता रहता है। कभी सफलता की धूप खिलती है, कभी कठिनाइयों की वर्षा होती है और कभी निराशा की ठंड हमें घेर लेती है। परिस्थितियां सदैव हमारे अनुसार नहीं होतीं, किंतु उनके प्रति अपना दृष्टिकोण चुनना हमारे हाथ में होता है।
स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन और सकारात्मक सोच हो, तो हर ऋतु सुंदर और हर परिस्थिति शिक्षाप्रद बन जाती है। आनंद बाहर के मौसम में नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मौसम में बसता है।
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