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मुफ़्त के गुब्बारे

  • 2 days ago
  • 4 min read

अजीत कुमार

"माँ... मुझे सौ रुपये चाहिए।"

सुबह-सुबह समीर ने अपनी माँ का हाथ पकड़कर उन्हें झकझोरते हुए कहा।

"क्यों?"

माँ ने उनींदी आँखें मलते हुए पूछा।

"होली आने वाली है। अभी पिचकारियाँ सस्ती मिल रही हैं। होली वाले दिन तो दुकानदार दाम बढ़ा देते हैं। अगर आज ले आया, तो अच्छे पैसे बच जाएँगे।"

माँ पलंग पर उठकर बैठ गईं। उन्होंने अलमारी से सौ रुपये का एक नोट निकाला और समीर की हथेली पर रखते हुए बोलीं, "ठीक है, लेकिन याद रखना, अगर आज ये पैसे खर्च कर दिए, तो होली वाले दिन पिचकारी के लिए मुझसे एक रुपया भी मत माँगना।"

समीर ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

"ठीक है माँ, मैं अभी पिचकारी लेकर आता हूँ।"

इतना कहकर वह खुशी-खुशी घर से बाहर निकल पड़ा।

गली के मोड़ पर उसके तीनों मित्र—सूरज, सुरेश और रमन—पहले से उसका इंतज़ार कर रहे थे।

समीर को हाथ में नोट लिए आते देखकर सूरज की आँखें चमक उठीं।

"लगता है, पैसे मिल गए!" उसने उत्साह से कहा।

फिर लंबी साँस भरते हुए बोला,

"हमारी माएँ तो ऐसी कंजूस हैं कि एक पैसा भी नहीं दिया।"

रमन हँस पड़ा।

"कोई बात नहीं। इस बार समीर के पैसों से ही हमारी होली यादगार बनेगी।"

समीर ने नोट हवा में लहराते हुए कहा, "ये पैसे माँ ने पिचकारी खरीदने के लिए दिए हैं। मैं सीधा बाज़ार जा रहा हूँ।"

सूरज ने होंठ सिकोड़ लिए।

"अरे, पिचकारी भी कोई खरीदने की चीज़ है?"

रमन तुरंत बोला, "पिचकारी से तो छोटे-छोटे बच्चे खेलते हैं। हम अब पूरे बारह साल के हो चुके हैं।"

सुरेश भी उनकी बात में शामिल हो गया।

"याद है पिछली होली? हमने गुब्बारे खरीदे थे। उनमें पानी भरकर स्कूल से लौटती लड़कियों पर फेंके थे। कितना मज़ा आया था!" तीनों दोस्त ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

समीर कुछ झिझकते हुए बोला, "लेकिन माँ ने खास तौर पर पिचकारी लाने को कहा है। अगर उन्हें पता चल गया कि मैंने गुब्बारे खरीदे हैं, तो वे बहुत नाराज़ होंगी।"

सुरेश ने उसकी पीठ थपथपाई।

"अरे, उन्हें कैसे पता चलेगा? गुब्बारे तो हम चारों आपस में बाँट लेंगे। जो बच जाएँगे, उन्हें पार्क की झाड़ियों में छिपा देंगे। अगले दिन निकाल लेंगे। एक ही पैकेट से कई दिन तक होली मनाएँगे।"

समीर का मन अभी भी पिचकारी खरीदने का था, लेकिन दोस्तों की बातों में आकर वह मना न कर सका। चारों बाज़ार की ओर चल पड़े। पहली दुकान पर पहुँचकर समीर ने कहा, "भैया, रंग-बिरंगे गुब्बारों का एक बड़ा पैकेट देना।"

दुकानदार ने अफसोस जताते हुए सिर हिलाया।

"बेटा, तुम थोड़ी देर से आए हो। सारे पैकेट अभी-अभी बिक गए।"

फिर उसने सामने वाली सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, "उस सड़क के पार हमारी दूसरी दुकान है। वहाँ तुम्हें हर रंग और हर आकार के गुब्बारे मिल जाएँगे।"

चारों दोस्त बिना देर किए वहाँ की ओर चल पड़े। सड़क पार करते समय अचानक समीर का कंधा एक आदमी से टकरा गया। उस आदमी के कंधे पर एक बड़ा-सा बोरा लटका हुआ था। टक्कर लगते ही बोरा नीचे गिर पड़ा और उसमें भरे सैकड़ों गुब्बारों के पैकेट सड़क पर बिखर गए। आदमी घबराकर जल्दी-जल्दी पैकेट समेटने लगा। चारों मित्र भी उसकी मदद करने लगे।

जब सारे पैकेट वापस बोरे में भर गए, तो सुरेश ने उत्सुकता से पूछा, "अंकल, आपके पास तो इतने सारे गुब्बारे हैं! क्या आपके घर में बहुत सारे बच्चे हैं?"

आदमी के चेहरे पर एक पल के लिए अजीब-सी उदासी उतर आई।

उसने धीमे स्वर में कहा, "नहीं बेटा... मेरा तो एक भी बच्चा नहीं है।"

रमन ने हैरानी से पूछा, "तो क्या आप गुब्बारे बेचते हैं?"

आदमी मुस्कराया, पर उसकी मुस्कान में कुछ रहस्य छिपा था।

"नहीं... बेचता भी नहीं। मैंने ये सारे गुब्बारे शहर की अलग-अलग दुकानों से खरीदे हैं।"

चारों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर विस्मय से देखा।

इतने सारे गुब्बारे... और वह भी खरीदकर?

आदमी ने उनकी उत्सुकता भाँप ली। "मेरा घर यहीं पास में है। अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हें मुफ़्त में गुब्बारों के कई पैकेट दे सकता हूँ।"

"मुफ़्त में?"

चारों के मुँह से एक साथ निकला। भला मुफ़्त की चीज़ छोड़ने वाला कौन होता है! वे तुरंत उस आदमी के पीछे-पीछे चल पड़े। कुछ ही मिनटों बाद वह एक पुराने मकान के सामने रुका। उसने जेब से चाबी निकाली, जंग लगे ताले को खोला और दरवाज़ा धीरे-धीरे खोल दिया। कमरे का दृश्य देखते ही चारों मित्रों की आँखें विस्मय से फैल गईं। पूरा कमरा छत तक गुब्बारों के पैकेटों से भरा हुआ था। लाल, नीले, पीले, हरे, सुनहरे—हर रंग के हजारों पैकेट दीवारों की तरह लगे हुए थे।

ऐसा लग रहा था मानो किसी खिलौने की दुकान का पूरा गोदाम उसी छोटे-से कमरे में समा गया हो। चारों मित्र अवाक् खड़े रह गए। उनके मन में एक ही प्रश्न कौंध रहा था— आख़िर यह आदमी इतने सारे गुब्बारे क्यों इकट्ठा करता है?

उस आदमी की आँखें अचानक नम हो गईं। गला भर्रा गया। कुछ क्षण तक वह मौन खड़ा रहा, फिर धीमे स्वर में बोला—

"पिछली होली पर मेरी नन्ही-सी बिटिया भी ऐसे ही पानी से भरे एक गुब्बारे का शिकार हो गई थी। किसी शरारती लड़के ने तेज़ी से फेंका हुआ गुब्बारा सीधे उसके सिर पर आकर लगा। वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी। मैं उसे तुरंत अस्पताल ले गया। डॉक्टरों ने अपनी ओर से हर संभव कोशिश की, लेकिन... वे मेरी बच्ची को बचा नहीं सके।"

उसने काँपते हाथों से आँसू पोंछे और आगे कहा—

"उस दिन मेरी दुनिया हमेशा के लिए उजड़ गई। तब से हर होली मेरे लिए रंगों का नहीं, अपनी बेटी की यादों का त्योहार बन गई है। इसलिए जैसे ही होली नज़दीक आती है, मैं शहर की लगभग हर दुकान से पानी वाले गुब्बारों के सारे पैकेट खरीद लेता हूँ। लोग समझते हैं कि मैं कोई व्यापारी हूँ, लेकिन सच तो यह है कि मैं केवल इतना चाहता हूँ कि किसी और पिता को अपनी बेटी को इस तरह खोने का असहनीय दुःख न सहना पड़े। अगर इन गुब्बारों के बाज़ार से गायब हो जाने से किसी एक मासूम की भी जान बच जाए, तो मुझे लगेगा कि मेरी बेटी की स्मृति व्यर्थ नहीं गई।"

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