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मूर्ति उपासना

21 hours ago
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मुकेश ‘नादान’

एक दिन नरेंद्र ने बाजार में सीता-राम की मि‌ट्टी की एक युगल मूर्ति लाकर सौड़ी वाले ऊपर घर में स्थापित की और उस घर का दरवाजा बंद कर मुहल्ले के हरि नामक एक साथी ब्राह्मण लड़के के साथ आँखें मूंदकर भीतर ध्यान करने बैठ गए। ध्यान में लीन नरेंद्र को समय का ध्यान ही नहीं रहा। इधर बहुत देर से बालक को नहीं देख पाने के कारण घर के सभी लोग व्याकुल हो उठे। चारों ओर हंगामा मचा हुआ था। उसी समय किसी के मन में आया, छत के ऊपर एक बार क्यों न देखा जाए? वहाँ जाकर देखा तो सीड़ी घर का दरवाजा बंद है। बहुत धक्कर देने पर भी दरवाजा नहीं खुला तो अंत में उसे तोड़ना पड़ा।

ब्राह्मण का बालक तो खुले रास्ते से साँस रोके हुए भाग गया, किंतु नरेंद्र तब भी धीर, स्थिर, मुदित अवस्था में बैठे रहे। अंत में उनके शरीर को झकझोरकर उनकी चेतना लौटाई गई।

अभी कुछ दिन ही हुए थे कि एक विचित्र घटना ने नरेंद्र के अपरिपक्व मन को अत्यधिक आंदोलित कर दिया। अस्तबल के सर्वज्ञानी सईस के समीप बैठकर वे खूब गपशप करते तथा उससे कई अपूर्व कहानियाँ सुना करते थे। किसी कारण से सईस का दांपत्य जीवन सुखमय नहीं हुआ, इसी से वह विवाह के संबंध में कई विरोधी बातें भी कहा करता था।

एक दिन सीताराम की पूजा करने के बाद नरेंद्र अस्तबल जाकर सईस के साथ बातचीत कर रहे थे। उसी समय सईस ने बहुत जोर देकर कहा, "विवाह करना बहुत बुरा है।" इस संबंध में उसने अनेक तर्क भी दिए। यह सुनकर नरेंद्र के मन में आया कि सईस के इस ज्ञान और उपदेश में मान लेने योग्य बहुत कुछ सच्चाई है। उन्होंने भी मन-ही-मन निर्णय कर लिया कि वे विवाह कभी भी नहीं करेंगे। किंतु उनके प्रिय सीता-राम की मूर्ति का क्या होगा? इतने दिनों तक तो उन्होंने इन अति पवित्र युगल मूर्तियों की श्रद्धा के साथ पूजा की है और उन दोनों के विमल चरित्र के प्रति भक्ति एवं श्रद्धा करना सीखा है। अब एक आदर्शगत अव्यक्त आंदोलन ने उनके बालमन को मथ दिया था। निश्चय ही उस समय इसके पूर्ण तात्त्पर्य की उन्होंने हृदयंगम नहीं किया था। कम-से-कम साधारण बुद्धि से प्रतीत होता है कि उस समय उनके लिए यह संभव नहीं था। तथापि सईस की बात और युगल मूर्ति में एक सिद्धांतहीन असामंजस्य देखकर समस्या से जर्जर उनका हृदय विदीर्ण हो गया और उन्हें रुलाई आ गई।

पुत्र की आँखों में आँसू देखकर माँ के द्वारा कारण पूछने पर नरेंद्र पहले चुप रहे, फिर फफकने लगे। माँ के ट्वारा पुत्र की गोद में लेकर सांत्वना देने पर अंत में नरेंद्र ने अपने मन की व्यथा-कथा कह सुनाई। बुद्धिमती माँ ने सुनकर हँसते हुए कहा, "विले, इससे क्या होता है? तू शिव की पूजा कर।"

बात मन को भा गई। शाम के धुंधलके में वरिश्वर (नरेंद्रनाथ, छत पर गए और हाथ में सीता-राम की मूर्ति लेकर छत के किनारे खड़े हो गए। निश्चय ही उनके लिए वह एक दुखमय घड़ी थी। सीता-राम की मूर्ति को विसर्जित करने से निश्चय ही उनका हृदय दुख से उद्वेलित हो उठा था। संभवतः एक गंभीर दीर्घ विश्वास अनजाने रास्ते से निकलकर शून्य में विलीन हो गया था। दूसरे ही क्षण वह युगल मूर्ति नीचे के कठोर रास्ते पर गिरकर चूर-चूर हो गई थी।

दूसरे दिन उन्होंने बाजार से एक शिव की मूर्ति लाकर उसे सीता-राम के आसन पर बैठाया और फिर आँखें मूदकर उस मूर्ति के सामने ध्यानमग्न हो गए।

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