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चरित्र की दृढ़ता

  • 20 hours ago
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मुकेश ‘नादान’

बाल्यकाल के मित्रगण यौवन का आगमन होने पर भी सभी क्षेत्रों में परिष्कृत नैतिक पथ पर चलें, यह जरूरी नहीं है। कोई-कोई भोग में मग्न होकर दूसरे को भी अपने दल में खींचना चाहता है। यह संसार की दैनिक घटना है। नरेंद्रनाथ के द्वारा ही कहा गया है कि इन व्यक्तिगत मित्रों से उन्होंने पूरी तरह मुक्ति नहीं पाई। एक संध्या को उनके कुछ मित्रों ने गाड़ी ठीक कर उन लोगों को कलकत्ते के समीप स्थित एक उद्यान-भवन में ले जाना चाहा।

इस सांध्य भमण के स्वरूप के संबंध में नरेंद्रनाथ को कोई ज्ञान नहीं था वे सहमत हो गए तथा उपयुक्त समय में सबके साथ आनंदपूर्वक गाड़ी से आकर उद्यान-भवन के फाटक पर उतरे।

भीतर प्रवेश कर उन्होंने देखा कि वहाँ एक सांध्य उत्सव का आयोजन हुआ है। आनंद-भोग करने के लिए ही उन सबका वहाँ आगमन हुआ था, अतएव खूब गाना-बजाना हुआ। नरेंद्र ने भी उसमें योगदान दिया। थोड़ी देर बाद उनके थकान अनुभव करने पर मित्रों ने एक बगल का घर दिखाकर कहा कि वे वहाँ जाकर विश्राम कर सकते हैं।

वे उस कमरे में अकेले सोए थे, तभी मित्रों द्वारा प्रेरित एक युवती उस कमरे में उपस्थित हुई। इसके पीछे कोई षडयंत्र है, इसे नहीं समझ पाकर नरेंद्रनाथ ने इस आगमन को सरल भाव से ग्रहण किया और युवती इसी घर की कोई होगी, ऐसा सोचकर उसके साथ बातचीत करने लगे। वह युवती भी अपने दुख-विपदा से ग्रस्त जीवन की कई घटनाएँ सुनाने लगी।

इस प्रकार नरेंद्रनाथ के समग्र मन और सहानुभूति पर उसने अधिकार कर लिया है, सोचकर क्रमशः उसने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया तथा उस घर में आने का मंतव्य भी स्पष्ट कह दिया। इस प्रकार उपस्थित विपत्ति का परिचय पाकर नरेंद्र झट उठ खड़े हुए और बाहर जाने के लिए डग बढ़ाकर बोले, "क्षमा कीजिएगा, मुझे अभी जाना होगा। आपके प्रति मेरी आंतरिक सहानुभूति है और आपका कल्याण हो, यही मैं चाहता हूँ। आप यदि समझ लें कि इस प्रकार जीवन व्यतीत करना पाप है, तो एक न एक दिन आप इससे निश्चय ही मुक्ति पा जाएँगी।"

नरेंद्रनाथ चले गए। वह युवती भी हतबुद्धि होकर उन मित्रों के निकट लौटकर बोली, "एक साधू को लुभाने के लिए भेजकर आप लोगों ने खूब मजाक किया।" यह घटना एक ओर जिस प्रकार नरेंद्रनाथ के चरित्र की दृढ़ता दिखाती है, दूसरी ओर प्रमाणित करती है कि उनका मनोबल कितना दृढ़ था।

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