श्रद्धा से प्रकट हुए महादेव
डॉ. कृष्णा कांत श्रीवास्तव
पांडव उन दिनों अपने अज्ञातवास के दौरान वन-वन भटक रहे थे। राजमहलों का वैभव, सुख-सुविधाएँ और सेवकों की उपस्थिति अब उनके जीवन का हिस्सा नहीं थीं। कभी घने जंगलों में तो कभी निर्जन स्थानों पर उन्हें रात्रि बितानी पड़ती थी। भोजन और विश्राम की व्यवस्था भी परिस्थितियों के अनुसार करनी पड़ती थी।
इन कठिन परिस्थितियों में भी पांडव अपने धार्मिक नियमों और आचरण के प्रति पूरी तरह निष्ठावान थे।
अर्जुन भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने संकल्प ले रखा था कि प्रतिदिन भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना करने के बाद ही भोजन ग्रहण करेंगे। उनके लिए यह नियम केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग था।
दूसरी ओर, पाँचों भाइयों ने यह नियम बना रखा था कि वे यथासंभव एक साथ बैठकर भोजन करेंगे। इस प्रकार अर्जुन की पूजा संपन्न होने तक अन्य भाइयों को भी भोजन के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। एक दिन पांडव घने वन से गुजर रहे थे। लंबी यात्रा के कारण सभी थक चुके थे। दोपहर का समय बीत रहा था और सूर्य की तपिश भी बढ़ने लगी थी। विशेष रूप से भीम को बहुत तेज भूख लगी थी।
वन में एक उपयुक्त स्थान देखकर पांडवों ने विश्राम करने का निर्णय लिया। भोजन की व्यवस्था भी हो गई, लेकिन अर्जुन के सामने एक समस्या उत्पन्न हो गई। आसपास कहीं भगवान शिव का मंदिर नहीं था। न कोई स्थापित शिवलिंग दिखाई दे रहा था और न ही कोई ऐसा स्थान मिल रहा था जहाँ वे अपने दैनिक नियम के अनुसार पूजा कर सकें। अर्जुन शिवलिंग की खोज में इधर-उधर घूमने लगे।
उधर भोजन तैयार था और भीम की भूख लगातार बढ़ती जा रही थी। वह बार-बार अर्जुन की ओर देखते और मन ही मन सोचते कि यदि शीघ्र ही शिवलिंग नहीं मिला, तो आज भोजन के लिए न जाने कितनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। भीम जानते थे कि अर्जुन अपने नियम से विचलित होने वाले नहीं हैं।
काफी खोजने के बाद भी जब कोई शिवलिंग नहीं मिला, तो भीम ने समस्या का समाधान अपने ढंग से निकालने का निश्चय किया। उनकी दृष्टि पास ही पड़े ताड़ के वृक्ष के एक मोटे तने पर पड़ी। उसका आकार कुछ ऐसा था कि उसे भूमि में सीधा स्थापित करने पर वह शिवलिंग जैसा दिखाई दे सकता था।
भीम के मन में एक विचार कौंधा। उन्होंने वृक्ष के उस तने को उठाया और भूमि में गाड़ दिया। फिर आसपास से कुछ फूल और पत्तियाँ एकत्र करके उस पर चढ़ा दीं। अपनी इस व्यवस्था से संतुष्ट होकर उन्होंने अर्जुन को पुकारा और बताया कि पूजा के लिए शिवलिंग मिल गया है। अर्जुन प्रसन्नतापूर्वक वहाँ पहुँचे।
उनकी दृष्टि उस आकृति पर पड़ी तो उनका हृदय भगवान शिव के प्रति श्रद्धा से भर उठा। उन्होंने मन ही मन महादेव को प्रणाम किया और पूर्ण एकाग्रता के साथ पूजा आरंभ कर दी। उन्होंने पुष्प अर्पित किए, जल चढ़ाया और भगवान शिव का स्मरण करते हुए अपनी आराधना पूरी की। उस समय उनके मन में न किसी प्रकार का संदेह था और न ही उस आकृति की वास्तविकता जानने की जिज्ञासा। उनके लिए वह भगवान शिव का ही स्वरूप था।
पूजा संपन्न होने के बाद सभी पांडवों ने एक साथ बैठकर भोजन किया। भीम की भूख शांत हुई तो उन्हें अपनी युक्ति याद आ गई। वह मन ही मन मुस्कराने लगे। कुछ देर बाद उनकी मुस्कराहट हँसी में बदल गई। युधिष्ठिर ने जब भीम को इस प्रकार हँसते देखा तो इसका कारण जानना चाहा।
भीम ने हँसते हुए बताया कि अर्जुन ने जिस आकृति को शिवलिंग समझकर पूजा की थी, वह वास्तव में ताड़ के वृक्ष का एक साधारण तना था। उन्होंने ही उसे भूमि में गाड़कर फूल-पत्तियों से सजा दिया था, ताकि अर्जुन शीघ्र पूजा कर लें और सभी को भोजन मिल सके।
भीम को विश्वास था कि यह रहस्य जानकर अर्जुन भी अपनी भूल पर हँस पड़ेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अर्जुन के चेहरे पर तनिक भी विचलन नहीं आया। उनकी दृष्टि में वह आकृति अब भी भगवान शिव का ही स्वरूप थी। भीम ने जब उन्हें वास्तविकता समझाने का प्रयास किया, तब भी अर्जुन की श्रद्धा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उनका विश्वास था कि जिस स्वरूप में उन्होंने भगवान शिव का आवाहन करके पूर्ण भक्ति से पूजा की है, वह उनके लिए शिवस्वरूप ही है। भीम को अर्जुन का यह विश्वास कुछ विचित्र लगा।
उन्हें लगा कि अर्जुन अपनी भूल स्वीकार करने के बजाय व्यर्थ का आग्रह कर रहे हैं। तब युधिष्ठिर ने इस विवाद को समाप्त करने के लिए सभी को उसी स्थान पर चलने का सुझाव दिया। पाँचों भाई उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भीम ने ताड़ का तना स्थापित किया था। भीम आत्मविश्वास से आगे बढ़े। उन्हें लगा कि अभी वह उस तने को भूमि से निकालकर सबके सामने रख देंगे और अर्जुन को भी अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ेगी। उन्होंने तने को दोनों हाथों से पकड़कर खींचा। लेकिन वह तनिक भी नहीं हिला। भीम को आश्चर्य हुआ।
उन्होंने सोचा कि संभवतः तना भूमि में कुछ अधिक गहराई तक धँस गया है। इस बार उन्होंने और अधिक बल लगाया। फिर भी वह अपनी जगह से नहीं हिला। अब भीम ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। उनकी भुजाओं की मांसपेशियाँ तन गईं। शरीर पसीने से भीग गया। उन्होंने बार-बार उसे हिलाने, खींचने और उखाड़ने का प्रयास किया, लेकिन सारे प्रयत्न निष्फल रहे।
जिस वृक्ष के तने को उन्होंने कुछ समय पहले सहजता से उठाकर भूमि में गाड़ दिया था, उसे अब अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी हिला नहीं पा रहे थे। यह देखकर सभी पांडव आश्चर्यचकित रह गए। भीम स्वयं भी स्तब्ध थे।
उनकी शक्ति का लोहा बड़े-बड़े योद्धा मानते थे। अनेक बलशाली राक्षसों और शत्रुओं को पराजित करने वाले भीम के लिए एक साधारण वृक्ष का तना उखाड़ना कोई कठिन कार्य नहीं होना चाहिए था। लेकिन आज उनका सारा बल निष्फल हो रहा था। धीरे-धीरे उनके मन का उपहास समाप्त होने लगा। उन्हें अनुभव हुआ कि इस घटना में कोई ऐसा रहस्य अवश्य है जो उनकी सामान्य समझ से परे है।
उन्होंने तने को छोड़ दिया और मौन खड़े हो गए। तभी धर्मराज युधिष्ठिर ने उन्हें समझाया कि संभव है, आरंभ में वह वास्तव में ताड़ के वृक्ष का साधारण तना ही रहा हो, लेकिन अर्जुन ने जिस निष्कपट श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ उसमें भगवान शिव का आवाहन करके पूजा की, उसके बाद उसे केवल लकड़ी का टुकड़ा समझना उचित नहीं है। भक्त के लिए ईश्वर का स्वरूप केवल पत्थर, धातु अथवा लकड़ी की बाहरी आकृति तक सीमित नहीं होता। उसकी श्रद्धा उस प्रतीक को आराधना का पवित्र आधार बना देती है।
अर्जुन ने उस आकृति में किसी वृक्ष को नहीं, अपने आराध्य महादेव को देखा था। उनका मन पूरी तरह भगवान शिव में एकाग्र था। युधिष्ठिर की बात सुनकर भीम के भीतर का अभिमान शांत हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि वह जिस आकृति को अपनी चतुराई का परिणाम समझकर अर्जुन की भक्ति का उपहास कर रहे थे, उसी के सामने उनका अपार शारीरिक बल निष्फल हो गया। भीम ने विनम्रतापूर्वक मस्तक झुका दिया। अर्जुन अब भी उसी श्रद्धा से शिवस्वरूप के सामने खड़े थे। उनके लिए कुछ भी नहीं बदला था। जिसे उन्होंने आरंभ में महादेव मानकर प्रणाम किया था, उसके प्रति उनका विश्वास अब भी उतना ही अटल था।
उस दिन भीम को एक गहरा जीवन-संदेश मिला। शारीरिक शक्ति मनुष्य को सामर्थ्यवान बना सकती है, लेकिन श्रद्धा और विनम्रता उसे अपने सामर्थ्य की सीमाओं का बोध कराती हैं।
जिस वृक्ष के तने को भीम ने केवल भोजन शीघ्र प्राप्त करने का साधन बनाया था, वही अर्जुन की निष्कपट आराधना के कारण उनके लिए भगवान शिव का पवित्र प्रतीक बन गया। और इस प्रकार एक साधारण-सी घटना ने पांडवों को श्रद्धा, विश्वास और अहंकार के संबंध में एक अमूल्य शिक्षा प्रदान की।
जीवन-संदेश : ईश्वर की आराधना का वास्तविक आधार केवल बाहरी साधन, भव्य मंदिर या बहुमूल्य पूजा-सामग्री नहीं है। श्रद्धा, निष्कपट भाव और समर्पण भी उपासना के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।
इस कथा में अर्जुन की भक्ति हमें सिखाती है कि जब मनुष्य पूर्ण एकाग्रता और विश्वास के साथ अपने आराध्य का स्मरण करता है, तब साधारण प्रतीक भी उसके लिए पवित्र बन जाता है। वहीं भीम का अनुभव यह संदेश देता है कि अपनी शक्ति, बुद्धि अथवा सामर्थ्य के कारण किसी दूसरे की आस्था का उपहास नहीं करना चाहिए।
भक्ति में दिखावे से अधिक भाव का महत्त्व है और शक्ति की वास्तविक शोभा विनम्रता में है। जिस हृदय में श्रद्धा और समर्पण का प्रकाश होता है, वहाँ साधारण वस्तु भी ईश्वर-स्मरण का माध्यम बन सकती है।
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