नरेंद्र का प्रश्न
मुकेश ‘नादान’
एक दिन अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक किसी कारणवश क्लास में अनुपस्थित थे, अतः कॉलेज में प्राचार्य विलियम हेस्टी छात्रों को वर्डसवर्थ की कविता पढ़ा रहे थे। पाठ्य कविता थी-'एक्स्कर्शन'। उस कविता में कवि बता रहा है कि किस प्रकार प्रकृति के सौंदर्य का ध्यान करते-करते उनका मन एक अतींद्रिय लोक में चला जाता था। छात्रगण अनुभूत तत्त्व की धारणा नहीं कर पा रहे हैं-यह देखकर हेस्टी महोदय ने समझाकर कहा, "मन की पवित्रता और विशेष तत्त्व के प्रति एकाग्रता के फलस्वरूप इस प्रकार की अनुभूति होती है। निश्चय ही यह दुर्लभ है, विशेषकर आधुनिक काल में। मैंने ऐसे मात्र एक व्यक्ति को देखा है, जो मन की इस अत्यंत मंगलमय अवस्था में पहुँच पाए हैं। वे हैं दक्षिणेश्वर के श्रीरामकृष्ण परमहंस। तुम लोग वहाँ जाकर स्वयं देख आने पर इसे समझ सकोगे।"
उस दिन दूसरे लड़कों की भाँति नरेंद्र ने भी वह बात सुनी, किंतु उस समय परमपुरुष से मिलने का मंगलमय मुहूर्त नहीं आया था। नरेंद्र के मन में यह बात एक शुभ और आकांक्षणीय स्मृतिरेखा खींचकर अतीत के वक्ष में विलीन हो गई।
इसी बीच नरेंद्र का आध्यात्मिक प्रयास तीव्रतर रूप धारण करता गया। वे और कुछ अन्य आग्रहशील धर्मप्राण व्यक्ति उन दिनों महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर से ध्यानाभ्यास करना सीखते थे। ध्यान समाप्त होने पर महर्षि जानना चाहते थे कि किसे कैसी अनुभूति होती है। नरेंद्र को ऐसी अनुभूति हुआ करती जैसे एक ज्योतिबिंदु घूमते-घूमते क्रमशः दोनों भौंहों के मध्य में स्थिर हो जाता है। इसके बाद उस बिंदु से विविध वर्णों की असंख्य उज्ज्वल किरणें चारों ओर फैल जाती हैं। धीरे-धीरे उनकी चेतना एक असीम की ओर प्रसारित होती है, किंतु ठीक इसी स्थिति में ध्यान भंग हो जाता है और आलोक से उद्रमासित विविध वर्ण विलुप्त हो जाते हैं।
इस युवक की योगशक्ति का परिचय पाकर महर्षि उन्हें ध्यान के लिए उत्साह प्रदान किया करते तथा दूसरों से उनकी प्रशंसा भी करते। श्रद्धापूर्ण हृदय से नरेंद्र बीच-बीच में महर्षि के घर जाते तथा अपने घर में नियमित ध्यान किया करते, किंतु प्राणों की पिपासा मिटती नहीं थी। अभाव-जनित यह असंतोष जब असहनीय हो गया तब वे एक दिन आवेग से भरकर महर्षि के पास चले कि आज मूल प्रश्न पूछकर उसका समाधान प्राप्त करना ही होगा।
उन दिनों महर्षि गंगा के किनारे नौका में रहा करते थे। आत्म-विस्मृत नरेंद्रनाथ ने आकर आतुर कंठ से पूछा, "महाशय, क्या आपने भगवान् को देखा है?" आग्रहयुक्त युवक के इस गूढ़ प्रश्न से महर्षि का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने आँखें उठाकर नरेंद्र को देखा, किंतु तुंत उत्तर नहीं दिया। थोड़ी देर तक नरेंद्र की आँखों में अपनी आँखें डालकर कहा, "बच्चा, तुम्हारी आँखें ठीक योगियों की भाँति हैं।"
अपने समाधान में विफल नरेंद्र फिर कोलाहलयुक्त महानगरी के एक कोने में स्थित अपने घर लौट आए। महर्षि के इस उत्तर से उनकी जिज्ञासा नहीं मिटी। इसके बाद दूसरे किसी धर्मगुरु के समक्ष भी उन्होंने यही एक प्रश्न रखा- क्या आपने भगवान् को देखा है?" किंतु सभी मौन रहे। किसी के पास भी नरेंद्र के प्रश्न का उत्तर नहीं था।
******



Comments