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रिश्ता रूह का

  • 1 day ago
  • 2 min read

श्याम मुकर्जी

 

तुम्हारी गर्म सांसें

मेरी पीठ पर

असंख्य सूरज उगा रही हैं

और....

मेरी निगाहें टिकी हैं

क्षितिज पर ढलते हुए

उस एक सूरज पर

संसार में प्याप्त

सारे तेज का एकमात्र निमित्त है

ये ढलता हुआ सूरज

और....

मेरी आत्मा के तेज का

एकमात्र निमित्त हो....तुम

अभी-अभी

तुम्हारी निगाहों ने

मेरी गर्दन चूमी है

अभी-अभी

तुम्हारे धड़कते हुए हृदय ने

मेरी धड़क में अवरोध उत्पन्न किया है

मैं अविश्वासी हूं इस क्षण

बिना स्पर्श के भी

प्रेम....संभव है

सामने

पोखर में खिले हुए

कुमुदिनी के श्वेत पुष्प

मानो,

इस बात के साक्षी बने हैं

कि प्रेम... निश्च्छल है..!

मेरी पीठ पर उगे हुए सूरज

अपने आसमान को खोज रहे हैं

मुझे ज्ञात है

जिस क्षण

तुमसे निगाह टकराई

उनकी खोज समाप्त हो जाएगी

ओ नीलाभ!

क्या...?

तुम्हें...सच में

मेरे ही हिस्से आना था !

या

मैं ही राह से भटकी हुई

कोई पथिक हूँ

जिसे तुमने

अपने खुरदुरे वक्षस्थल में समेट लिया है

मैं प्रेम की सभी विधियों से अनभिज्ञ हूँ

और तुम ठहरे कोई निपुण कलाकार

क्या

प्रेम...सच में

इतना सहज है....!

तुम्हारी उपस्थिति में

मैं स्वयं का भान भूल बैठी हूँ

तुम आच्छादित हुए जाते हो

मुझ पर

उस विशाल अम्बर की तरह

और....

वहीं कहीं बहुत दूर से

बिखरा रहे हो

कुमुदिनी के श्वेत पुष्प

मेरे मन-आंगन में

ये सौंदर्य ही

कितना रमणीक है

अभी तुम्हारी निगाहें

मेरे समक्ष

झुकी हैं

ये समर्पण है....!

या प्रेम की कोई और ही विधि,

इतना तो बता दो

कि इस क्षण मुझे क्या करना चाहिए

तुम्हारी झुकी हुई निगाहें

मुझमें वात्सल्य भाव उत्पन्न करती हैं...

सुनो,

तमाम श्वेत पुष्पों की सुगंध से

महकता हुआ आंचल

तुम्हारी प्रतीक्षा में है

मैं तुम्हारी तरह निपुण तो नहीं

किंतु,

कुछेक जतन तो मैं भी जानती हूँ

तो,

रात के तीसरे पहर में

तुम अपना सर रख कर विश्राम कर लेना यहाँ

क्योंकि अगले पहर

संसार का सूरज तुम्हें इसकी आज्ञा न दे शायद

और फिर

मेरी पीठ में नम पड़ते हुए

तमाम सूरज भी तो

अपने उगने की प्रतीक्षा में रहेंगे...

है ना....!!!

*****

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