लड़की हूँ,
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आँचल सक्सैना
वो गुलशन जो, खाद-धूप को,
पाकर भी, गुलज़ार नहीं हूँ
मैं वो सपना, जो आँखों में,
आकर भी साकार नहीं हूँ
जो देखा, जो जाना,
जो महसूस किया, लफ़्ज़ों में ढाला
मैने अपनी, बात कही बस,
मैं कोई, फ़नकार नहीं हूँ
हुस्न, मौसिकी, रंग, नज़ारे,
सब कुछ ही संसार हैं उसका
जो लड़का संसार है मेरा,
उसका मैं संसार नहीं हूँ
बीच हमारे, सात समंदर,
कैसे होगा, मिलना मुमकिन
वो भी तो इस पार नहीं है,
मैं भी तो उस पार नहीं हूँ
गिरना और बदल जाना,
या बेबुनियादी बातें करना
ये सब मेरी फितरत कब हैं,
लड़की हूँ, सरकार नहीं हूँ
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