अरुण कुमार गुप्ता: एक भाई की कहानी
Updated: Oct 8
पिताजी के जाने के बाद, आज पहली बार हम दोनों भाईयों में जमकर बहस हुई। फोन पर मैंने उसे खूब खरी-खरी सुना दी।
मैंने पुश्तैनी घर छोड़कर कुछ किलोमीटर दूर इस सोसायटी में रहने का फैसला किया। उन तंग गलियों में रहना मुझे और मेरे बच्चों को कतई नहीं भाता था। मेरी पत्नी और मैंने अच्छी खासी तनख्वाह के बूते एक बढ़िया फ्लैट ले लिया।
सीधे-साधे से हमारे पिताजी ने कोई वसीयत तो की नहीं, पर उस पुश्तैनी घर पर मेरा भी तो बराबर का हक बनता है। मेरा छोटा भाई मना नहीं करता। वह लिखापढ़ी को भी राजी है। लेकिन दिक्कत अब ये है कि वह मेरे हिस्से में कोचिंग सेंटर खोलना चाह रहा है। उसकी टीचर की नौकरी सात महीने पहले छूट चुकी है।
दो महीने पहले ही उसने आस-पास कहीं किराए का कमरा लेकर कोचिंग सेंटर खोला है। फोन पर कह रहा था, "आपके हिस्से में कोचिंग सेंटर खोल लूँ तो मेरा किराया बच जाएगा।"
अब भला ये क्या बात हुई? चीज मेरी बरतेगा वह। ऊपर से मेरी धर्मपत्नी भी उसी की बात को सही ठहराते हुए बोली, "खोलने दो ना उसे कोचिंग सेंटर, छोटा भाई है आपका। मुश्किल में है, कुछ सहारा ही हो जाएगा। आखिर बड़े भाई हो, कुछ तो फ़र्ज बनता है कि नहीं?"
अब मैं क्या बोलता? अखबार मेज पर पटका, थैला उठाया और सब्जी लेने निकल आया। मंडी में घुसते ही, महीने भर से नदारद अपना सब्जी वाला भाई नजर आया। कई सालों से उससे ही सब्जी लेता आ रहा हूँ। फटाफट वहीं जा पहुंचा।
"कहाँ गायब हो गया था रे? महीना हो गया मुझे इधर-उधर से औने-पौने दाम में सब्जी लेते हुए।"
"गाँव गया था साब जी। छोटे भाई की माली हालत खराब हो गई थी। गया और सब ठीक कर आया। घर में ही छोटी सी दुकान करा दी। बापू नहीं है तो क्या हुआ, बड़ा भाई भी तो बाप समान होता है ना, साब जी।"
ये सुनकर लगा जैसे मैं जम सा गया। थैला वहीं छोड़कर ऑटो लिया और उन जानी पहचानी तंग गलियों से होता हुआ अपने पुराने घर जा पहुँचा।
बाहर खेलते हुए भाई के दोनों बच्चे मुझे देखते ही "ताऊ जी, ताऊ जी" कहकर लिपट गए। आवाज सुनकर छोटा भी बाहर निकल आया। मैंने उसे डाँटते हुए बोला, "क्यूँ रे, बहुत बड़ा हो गया है तू। मैंने जरा सा कुछ बोल क्या दिया, तुझ से तो पलट कर फोन भी ना किया गया।"
"अपने जब साफ-साफ मना कर दिया तो फिर फोन क्यों करता?"
"हाँ-हाँ, जैसे तू तो मेरी हर बात मानता है।"
"क्यों नहीं मानता? आप बोल कर तो देखो।"
"ये कुछ पैसे हैं, रख ले, तेरी कोचिंग सेंटर के फर्नीचर की मरम्मत के लिए। यहाँ शिफ्ट करने से पहले सब ठीक करा लियो।"
"मतलब मैं यहाँ अपना..........। आपका ये एहसान मैं.........।" कहते-कहते उसका गला भर आया।
"एहसान नहीं पगले, ये तो मेरा फ़र्ज है जो मैं भूल गया था।" और ये बोलते हुए मेरी आँखें भी भर आईं।
इस पल ने मुझे एहसास दिलाया कि परिवार का मतलब केवल खून का रिश्ता नहीं होता। यह एक जिम्मेदारी है, एक बंधन है जो हमें एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह बनाता है।
हमारी ज़िंदगी में ऐसे पल आते हैं जब हमें अपने परिवार के सदस्यों की मदद करनी होती है। चाहे वह छोटे भाई की कोचिंग सेंटर खोलने की बात हो या किसी और समस्या का समाधान।
हम सभी को यह समझना चाहिए कि जीवन में भावनाएँ महत्वपूर्ण होती हैं। जब हम एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं, तो हम न केवल अपने रिश्तों को मजबूत करते हैं, बल्कि अपने भीतर की मानवता को भी जगाते हैं।
इस कहानी में, मैंने अपने छोटे भाई के लिए जो किया, वह केवल एक मदद नहीं थी। यह एक भावनात्मक बंधन को मजबूत करने का एक तरीका था।
इसलिए, जब भी आप अपने परिवार के सदस्यों की मदद करें, याद रखें कि यह केवल एक कार्य नहीं है। यह एक भावना है, एक बंधन है। हमें एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।
इस तरह, हम न केवल अपने परिवार को मजबूत बनाते हैं, बल्कि अपने समाज को भी।
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